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05.01.2008
सुराही
प्राण शर्मा
1 - 30

सुराही
प्राण शर्मा



फ़र्क़ नहीं पड़ता मन्दिर या मधुशाला हो
चरणामृत हो या अंगूरों की हाला हो
अपने लिए ए मीत बराबर दोनों ही हैं
ईश्वर की प्रतिमा हो अथवा मधुबाला हो

सबको बराबर मदिरा का प्याला आयेगा
इक जैसा ही मदिरा को बाँटा जायेगा
इसको ज्यादा उसको कम मदिरा ए साक़ी
मधुशाला में ऐसा कभी न हो पाएगा

रुष्ट न हो जाये कोई भी मधुबाला से
वंचित कोई भी ना रह जाये हाला से
द्वार खुला रहता है इसका इसीलिए नित
प्यासा कोई लौट न जाये मधुशाला से

जिसका मन मधुशाला जाने से रंजित है
जिसके मन में मदिरा की मस्ती संचित है
मदिरा पीने का अधिकार उसे है केवल
जिसका सारा जीवन साक़ी को अर्पित है

मधुशाला में नकली हाला भी चलती है
मधु तो क्या नकली मधुबाला भी चलती है
मधुशाला में सोच समझकर जाना प्यारे
अब जग में नकली मधुशाला भी चलती है

पूरी बोतल पीने का आगाज़ न कर तू
दोस्त, अभी मदिरा पर इतना नाज़ न कर तू
अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है मेरे प्यारे
छोटे पंखों से ऊँची परवाज़ न कर तू

तेरे लिए मदिरा ए जाहिद होगी गाली
मेरे लिए है मदिरा सबसे चीज़ निराली
तेरे लिए मदिरा ए जाहिद होगा विष पर
मेरे लिए मदिरा है जीवन देने वाली

सावन की मदमस्त घटा है मदिरा प्यारे
चन्दन वन की मस्त हवा है मदिरा प्यारे
जीवन की चिंताओं से क्यों घबराता है
चिंताओं की एक दवा है मदिरा प्यारे

यह न समझना मुझमें सद्‌व्यवहार नहीं है
यह न समझना मुझमें लोकाचार नहीं है
जाहिद, माना मेरा है सम्बंध सुरा से
यह न समझना मुझको जग से प्यार नहीं है
१०
बीवी – बच्चों पर जो घात क्या करता है
पल – पल गुस्से की बरसात किया करता है
दोस्त, समझना उसे कभी मत मधु का प्रेमी
पीकर जो घर में उत्पात किया करता है
११
शांत, अचंचल, संयमी, धीर हुआ करता है
फक्कड़ मन का औ’ दिलगीर हुआ करता है
मस्ती का धन जितना चाहे ले जा उससे
हर मतवाला मस्त फ़कीर हुआ करता है
१२
किस युग ने ठहराया है मधु को प्रतिबंधित
मधु पीने के कारण कौन हुआ है दंडित
ज्ञानी, ध्यानी, पंडित मुझको दिखलायें तो
किस पुस्तक में लिक्खा है मदिरा को वर्जित
१३
व्यर्थ न अपने नैन तरेरो उपदेशक जी
नफ़रत के मत शूल बिखेरो उपदेशक जी
मदिरा जीवन का हिस्सा है अब दुनिया में
सच्चाई से मुख ना फेरो उपदेशक जी
१४
फूलों सा हँसता है, मेघों सा रोता है
बीज सभी की राहों में मद के बोता है
पत्थर जैसा उसका दिल हो नामुमकिन है
मोम सरीखा मतवाले का दिल होता है
१५
अपना नाता जोड़ अभागे मधुशाला से
पीने का आनंद उठा ले मधुबाला से
प्रतिदिन पीकर एक सुरा का प्याला प्यारे
अपना पिंड छुड़ा ले दुक्खों की ज्वाला से
१६
दीवारों पर धब्बए काले तकते-तकते
कोनों में मकड़ी के जाले तकते-तकते
इक निर्धन मद्यप ने दिल पर पत्थर रखकर
रात गुज़ारी खाली प्याले तकते-तकते
१७
पण्डित जी, तुम चाहे मधु को विष बतलाओ
जितना जी चाहे मधु पर प्रतिबंध लगाओ
इसकी मान – प्रतिष्ठा और बढ़ेगी जग में
लोगों की नज़रों से चाहे इसे गिराओ
१८
कभी-कभी साक़ी हमसे कुछ कतराता है
कभी-कभी साक़ी गुस्सा कुछ दिखलाता है
यूँ तो बड़ा है दिलवाला यह माना हमने
कभी-कभी साक़ी कंजूसी कर जाता है
१९
कभी-कभी खुद ही मन-ज्वाला हर लेता हूँ
मधु से अपना प्याला खुद ही भर लेता हूँ
मैं अधिकार समझकर मदिरा के नाते ही
शिकवा और गिला साक़ी से कर लेता हूँ
२०
निशि का तम हो अथवा हो दिन का उजियाला
मेरा ठोर ठिकाना हो या हो मधुशाला
जब भी दौर शुरू होता है मधु पीने का
आनन-फानन पी जाता हूँ पहला प्याला
२१
क्यों न लगाऊँ अपने अधरों से प्याला को
क्यों न पियूँ मस्ती देनेवाली हाला को
मेरे जीवन का सर्वस्व बनी है वह तो
क्यों न बिठाऊँ अपने सिर पर मधुबाला को
२२
दुनिया में ऐसे भी युग आते हैं भाई
अच्छे–अच्छे नाम बदल जाते हैं भाई
पात्र सुरा के बन जाते हैं मधु के प्याले
और सुरालय मधु-घर कहलाते हैं भाई
२३
रूखी-सूखी औ’ कंगाली शाम न बीते
और अमावस जैसी काली शाम न बीते
मदिरा का सम्मान बढ़ाना है गर साक़ी
मतवालों की कोई खाली शाम न बीते
२४
बिन दर्शन के लौट गया तू मधुबाला के
आँगन से ही लौट गया तू मधुशाला के
तुझसे बढ़कर कौन अभागा है दुनिया में
घूँट पिये ही लौट गया तू बिन हाला के
२५
कभी-कभी मस्ती के लमहों को जीने को
जीवन के गहरे से घावों को सीने को
सच्ची-सच्ची बात बता उपदेशक हमको
तेरा चित्त नहीं करता है मधु पीने को
२६
सूरत को ही तक ले पगले मधुबाला की
मिट्टी को ही छू ले पगले मधुशाला की
चित्त नहीं करता गर तेआ मधु पीने को
खुशबू ही कुछ ले ले पगले तू हाला की
२७
दोस्त, तुझे मस्ती पाना है यदि हाला में
सेवा भाव निरखना है यदि मधुशाला में
थोड़ी सी तकलीफ़ उठानी होगी तुझको
चलकर तुझको जाना होगा मधुशाला में
२८
क्या रक्खा है उपदेशों को अपनाने में
इन मकड़ी के जालों में मन उलझाने में
छोड़ सभी ये माथा पच्ची मेरे प्यारे
आ तुझको मैं ले चलता हूँ मयखाने में
२९
गूँज छलक जाते प्यालों की मतवाली है
मयखाने में खुशहाली ही खुशहाली है
साक़ी, तेरा मयखाना है या है जन्नत
हर पीने वाले के चेहरे पर लाली है
३०
जी करता है सदा रहूँ टेरे साक़ी को
यारो, मैं हर वक़्त रहूँ घेरे साक़ी को
इसीलिए आ जाता हूँ मैं मयखाने से
ताकि मिले आराम ज़रा मेरे साक़ी को


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