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08.10.2008

सञ्जीवनी - सर्ग :  कृष्ण-गोपी प्रेम
रचनाकार
: सीमा सचदेव

ब्रज की याद
सीमा सचदेव

 आज याद कर रहे कृष्ण राधे
तुमने ही सब कारज साधे
बन कर मेरी अद्भुत शक्ति
भर दी मेरे मन में भक्ति
हर स्वास में नाम ही तेरा है
इसमें न कोई बस मेरा है
बस सोच रहे कान्हा मन में
जब रहते थे वृंदावन में
क्या करते थे माखन चोरी
और ग्वालों संग जोरा-ज़ोरी
क्या अद्भुत ही था वह स्वाद
मुझे आता है बार-बार वह याद
अब हूँ मैं मथुरा का नरेश
पर मन में तो इच्छा अब भी शेष
वह दही छाछ माखन चोरी
और माँ जसुदा की वो लोरी
वो गोपियों का माँ को उलाहना
और नंद- बाबा का संभालना
वो खेल जो यमुना के तीरे
करते थे हम धीरे- धीरे
वो मधुवन और वो कुंज गली
जहाँ गोपियाँ थी दही लेके चलीं
वो मटकी उनसे छीन लेना
और सारा दही गिरा देना
वो गोपियों का माँ से लड़ना
माँ का मुझ पर गुस्सा करना
तोड़ के मटकी भाग जाना
और इधर-उधर ही छुप जाना
कभी पेड़ों पे चढ़ना वन में
कभी जल-क्रीड़ा यमुना जल में
कभी हँसना तो कभी हँसाना
कभी रूठना, कभी मनाना
चुपके से निधिवन में जाना
गोपियों के संग रास रचाना
गाय चराने वन को जाना
और मीठी सी मुरली बजाना
मुरली बजा गायों को बुलाना
और उनका झट से आ जाना
बल भैया का माँ को बताना
और माँ का प्यार से गले लगाना
कभी कभी ऐसे छुप जाना
और फिर माँ को बड़ा सताना
दाऊ भैया का ढूँढ के लाना
और मैया का सज़ा सुनाना
वो मुझको रस्सी से बाँधना
और फिर अपने आप ही रोना
रो-रो कर अपना मुख धोना
और फिर देना मुझको खिलौना
वो चोरी से माखन खाते
जो ऊँचें छींके पे रखते
चढ़ते इक दूजे पे ऐसे
बनी हो कोई सीढ़ी जैसे
मधुवन में जा मुरली बजाना
मुरली सुन गोपियों का आना
गोपियों के संग रास रचाना
और फिर इधर-उधर हो जाना
ग्वालों के संग खेलते वन में
कभी नहाते यमुना जल में
कभी छुपते तो कभी छुपाते
इक दूजे को ढूँढ के लाते
झूलते वृक्ष के नीचे झूला
मैं अब तक वो नहीँ हूँ भूला
वो ऊँचे झूला ले जाना
वहाँ से कभी-कभी गिर जाना


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