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06.04.2008

सञ्जीवनी - सर्ग : ब्रजबाला
रचनाकार
: सीमा सचदेव

व्याकुल मन
सीमा सचदेव

सखि व्याकुल आज मेरा मन क्यों ?
क्यों चैन कहीं नहीं पाता है ?
तड़प-तड़प कर हृदय यह,
जैसे बाहर को आता है।

हैं फरक रहे दाहिने अंग क्यों ?
अमंगल संकेत कराते हैं।
यह नेत्र मेरे अश्रु जल से,
क्यों बार-बार भर जाते हैं ?

मेरा रोम-रोम क्यों काँप रहा ?
ज्वाला हृदय में धधक रही।
दर्शन की प्यासी यह आँखें,
क्यों बार-बार यों छलक रहीं ?

कहीं फिर न हों संकट में प्रियतम,
यह बार-बार दिल गाता है।
हे गौरी माँ हो रक्षक तुम,
तू जग-जननी शक्ति माता है।

हे शिव शंकर तुम सदा शिव हो,
कुछ मेरा भी कल्याण करो।
कान्हा का बाल न बाँका हो,
चाहे मेरे ही तुम प्राण हरो।

हे ब्रह्म सुनो सृष्टि करता,
हे भाग्य विधाता दुख हरता।
अपना यह नाम साकार करो,
मेरे प्राण-प्रिय का उद्धार करो।

हे गणपति बाबा जागञानदन,
करती हूँ तेरा अभिनंदन।
देखो यह मेरा करुण रुदन,
जल्दी काटो हमरे बंधन।

हे राम भक्त बजरंग बली,
देखो अब मेरी जान चली।
दे दो तुम ऐसी संजीवन,
हो जाए हमारा मधुर मिलन।

ललिते, तुम भी क्यों खड़ी मौन,
कहो लाई हो संदेस कौन ?
कहो कौन सा देव मनाऊँ मैं?
अपने प्रियतम को बचाऊँ मैं।

मुख मंडल तेरा उदास क्यों?
लग रही है मुझे निरास क्यों?
सखि राधिके न हो तू अधीर,
कर सकते हैं क्या हम अहीर।

सुनती हूँ मैं यह दूर-दूर,
मथुरा से आया है अक्रूर।
कान्हा को ले जाने मथुरा,
बहाना उसका है साफ सुथरा।

जसुदा का सुत नहीं है गिरधर,
कहा रख कर जान हथेली पर।
वासुदेव छोड़ गये थे कान्हा,
ले गये उठा नंद की कन्या।

अब कंस कृशन को बुलाता है,
वह धनुष यज्ञ करवाता है।
वहाँ दुष्ट रिपु ललकारेगा,
धोखे से कृशन को मारेगा।

नहीं, नहीं करती हुई कान बंद,
बोली राधा हो कर उदंड।
कान्हा जो मथुरा जाएगा,
सृष्टि में प्रलय मच जाएगा


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