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02.04.2012
 
समाज और संस्कृति के चितेरे : अमृतलाल नागर - (एक अध्ययन)
 डॉ.दीप्ति गुप्ता

पाठकों से.....
डॉ.दीप्ति गुप्ता


 

हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकार श्री अमृतलाल नागर के उपन्यासों का अध्ययन करने पर उनमें समाज की विशद प्रस्तुति ने मुझे गहराई तक छुआ। परोक्ष और अपरोक्ष रूप से उनके उपन्यासों में समाज सविस्तार अपने विविध पक्षों, विभिन्न अंगों और इकाईयों के साथ पसरा हुआ है। परिवार, वर्ण एवं जाति आदि के सूक्ष्म वर्णन इतने रुचिकर, सहज एवं प्रभावशाली बन पड़े हैं कि पाठक मन स्वतः ही उनमें रमता चला जाता है। महाकालसे मानस का हंसतक - सभी उपन्यासों को पढ़कर, मन में विचार आया कि क्यों न अपने अध्ययन व विचारों को पुस्तकबद्ध किया जाए। इसी विचार के तहत मैंने क्रमबद्ध ढंग से, नागर जी की महाकालसे मानस का हंसतक की यात्रा के बीच सृजित उपन्यासों में चित्रित समाज का  एक विशद अध्ययन इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। उनके उपन्यासों में समाज के जिन अंगो का, पक्षों का उल्लेख है, बारीकी से चित्रण है, उन सबको मैंने यथाशक्ति, यथाक्षमता समेटने का पूर्ण प्रयास किया है; फिर भी कहीं कुछ तथ्य छूट सकते है, इसका अंदेशा तो बना ही रहता है, क्योंकि संसार में कोई भी वस्तु  सम्पूर्ण नहीं है। उस सम्पूर्णताकी खोज में ही यह संसार निरन्तर संसृत हो रहा है। जिस दिन इतिहो आयेगी, उस दिन सब कुछ थम जायेगा। यह हलचल, यह कोलाहल, यह गति - सब थम जायेगा । इसलिए ही नेति नेति अर्थवान है, अपेक्षित है। असम्पूर्णता में सम्पूर्णता की निरन्तर खोज ही हमारी गति, तदनन्तर प्रगति, क्रियाशीलता, सम्वेदनशीलता और जीवन्तता का आधार है। इस दृष्टि के तहत यह पुस्तक भी सम्पूर्ण नहीं, अपितु अधूरी ही है। यह अधूरा अध्ययन ही आगे के अध्ययन की प्रेरणा बनेगा। इस सुखद आशा के साथ मैं अपनी यह पुस्तक अपने पाठकों को सौंप रही हूँ।                           

 

दीप्ति

2/ए, आकाशदूत

कल्याणी नगर

पुणे-411006

 


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