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02.04.2012
 
समाज और संस्कृति के चितेरे : अमृतलाल नागर - (एक अध्ययन)
 डॉ.दीप्ति गुप्ता

अमृतलाल नागर के वर्ण एवं जाति सम्बन्धी विचार
डॉ.दीप्ति गुप्ता


विद्वान लेखक नागर जी के इस विषय में विचार अत्युत्कृष्ट हैं। सर्वप्रथम तो वे व्यक्ति व्यक्ति में ही भेदभाव नहीं मानते। उनके अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, सब पहले इन्सान हैं, इसलिए समान है। उनमें अगर वे अन्तर मानते हैं,तो गुणों के आधार पर और गुण मनुष्य द्वारा आरोपित नहीं वरन् ईश्वर की एक अद्भुत देन है, जिन्हें पाकर व्यक्ति समाज में आदर और यश का भागी होता है। गुण सब में कुछ न कुछ अवश्य होते हैं। लेकिन किसी व्यक्ति में गुण अधिक तो किसी में कम होते हैं। उन्हीं गुणों के अनुसार व्यक्ति के कर्म होते हैं। यथा मनन, चिन्तन करने वाला व्यक्ति अपना अधिकांश समय पठन-पाठन व लेखन में लगाता है, तो अद्भुत शक्ति और शारीरिक क्षमता वाला व्यक्ति अपना बल प्रयोग निर्बलों की रक्षा में करता है। इसी प्रकार लेन-देन, वाणिज्य व्यापार आदि की बुद्धि वाला व्यक्ति तरह-तरह के व्यापार द्वारा धनोपार्जन करता है और श्रम में रुचि रखने वाला, दूसरों की सेवा तथा परिश्रम से जीविकोपार्जन करता है। स्पष्ट है कि जब लेखक के समक्ष वर्ण और जाति के आधार पर समाज में मानव कोटि निर्धारण का प्रश्न आया तो उसके विशाल व गहन चिन्तन ने वर्ण जाति के निर्णायक आधार जन्मको स्वीकार नहीं किया और उसने कर्म को ही एक व्यक्ति के दूसरे व्यक्ति से भिन्न होने का कारण माना। कर्म के आधार पर भी भिन्न व्यक्ति लेखक के अनुसार सीढ़ीनुमा उच्च निम्न तलों पर खड़े छोटे-बड़े व्यक्ति न होकर, एक ही तल पर अर्थात् समतल पर खड़े भिन्न-भिन्न गुणों से, कर्मों से युक्त चार प्रकार के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र व्यक्ति हैं। इन चारों में न कोई उच्च है न निम्न। सभी समान हैं। मात्र गुणों और कर्मो का भेद है। लेखक के ये ही विचार उनके उपन्यासों में परिलक्षित होते हैं। अपने उच्च विचारों को अभिव्यक्त करने के साथ-साथ लेखक ने समाज में व्याप्त वर्ण एवं जाति की संकीर्ण विचारधारा तथा इसके कारण चार वर्गों में बँटे समाज का चित्रण किया है। निःसन्देह हमारे देश से वर्ण एवं जातिगत भेदभाव तभी दूर हो सकता है,जब प्रत्येक व्यक्ति जाति और वर्ण की संकुचित सीमाओं से ऊपर उठकर सर्वप्रथम स्वयं को भारतीय माने। सबके हृदय में उच्च और निम्न तथा जाति आदि से सम्बन्धित छुआछूत का भेदभाव न हो। यही भावना वर्ण और जाति के संकीर्ण विचारों को समाप्त कर सकती है जैसा कि मुनीनाथ मलने भी कहा है ।10


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