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09.15.2007

राग-संवेदन

रचनाकार : डा. महेंद्र भटनागर

सार-तत्त्व
डॉ. महेंद्र भटनागर

सकते में क्यों हो,
अरे!
नहीं आ सकते
जब काम
किसी के तुम -
  
   कोई क्यों आये
  
   पास तुम्हारे?
चुप रहो
,
सब सहो!
  
   पड़े रहो
  
   मन मारे,
  
   यहाँ-वहाँ!
कोई सुने
तम्हारे अनुभव
,
कोई सुने
तुम्हारी गाथा
,
  
   नहीं समय है
  
   पास किसी के!
निष्फल -
ऐसा करना
आस किसी से!
अच्छा हो
सूने कमरे की दीवारों पर
शब्दांकित कर दो
,
नाना रंगों से
चित्रांकित कर द
अपना     मन!
शायद
, कोई कभी
पढे / गुने!
या
किसी रिकॉर्डिंग-डेक में
भर दो
अपनी करुण कहानी
बखुद जबानी!
शायद
, कोई कभी
सुने!
लेकिन
निश्चिन्त रहो -
कहीं न फैले दुर्गन्ध
इसलिए तुरन्त
लोग तुम्हें
गड्ढे में गाड / दफन
या
कर सम्पन्न दहन
विधिवत्
कर देंगे खाक / भस्म
  
   जरूर!
विधिवत्
पूरी कर देंगे
आखरी रस्म
  
   जरूर!


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