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09.15.2007

राग-संवेदन

रचनाकार : डा. महेंद्र भटनागर

पूर्वाभास
डॉ. महेंद्र भटनागर

बहुत पीछे
छोड़ आये हैं
प्रेम-संबंधों
शत्रुताओं के
अधजले शव!

खामोश है
बरसों, बरसों से
तडपता / चीखता
दम तोडता रव!

इस समय तक -
सूख कर अवशेष
खो चुके होंगे
हवा में!

बह चुके होंगे
अनगिनत
बारिशों में!

जब से छोड़ आया
लौटा नहीं;
फिर, आज यह क्यों
प्रेत छाया
सामने मेरे?

शायद,
हश्र अब होना
यही है -
मेरे समूचे
अस्तित्व का!
हर ज्वालामुखी को
एक दिन
     सुप्त होना है!
           सदा को
                 लुप्त होना है!


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