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09.15.2007

राग-संवेदन

रचनाकार : डा. महेंद्र भटनागर

निष्कर्ष
डॉ. महेंद्र भटनागर

उहापोह
(जितना भी)
    
जरूरी है।

विचार-विमर्श
हो परिपक्व जितने भी समय में।
तत्त्व-निर्णय के लिए
अनिवार्य
मीमांसा-समीक्षा / तर्क / विशद विवेचना
प्रत्येक वांछित कोण से।
क्योंकि जीवन में
हुआ जो भी घटित -

    
वह स्थिर सदा को,

एक भी अवसर नहीं उपलब्ध

    
भूल-सुधार को।

सम्भव नहीं
किंचित बदलना

    
कृत-क्रिया को।

सत्य -
कर्ता और निर्णायक
तुम्हीं हो
,
पर नियामक तुम नहीं।
निर्लिप्त हो
परिणाम या फल से।

(विवशता)

सिद्ध है -
जीवन
: परीक्षा है कठिन
पल-पल परीक्षा है कठिन।
वीक्षा करो
हर साँस गिन-गिन
,
जो समक्ष
उसे करो स्वीकार

    
अंगीकार!


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