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09.02.2007

राग-संवेदन

रचनाकार : डा. महेंद्र भटनागर

लमहा
डॉ. महेंद्र भटनागर

एक लमहा
सिर्फ एक लमहा
एकाएक छीन लेता है
           ज़िन्दगी!
हाँ, फकत एक लमहा।
हर लमहा
अपना गूढ़ अर्थ रखता है,
अपना एक मुकम्मिल इतिहास
              सिरजता है,
बार - बार बजता है।
इसलिए रूरी है -
हर लमहे को भरपूर जियो,
जब-तक
कर दे न तुम्हारी सत्ता को
           चूर - चूर वह।
हर लमहा
खामोश फिसलता है
एक-सी नपी रफ्तार से
अनगिनत हादसों को
         अंकित करता हुआ,
अपने महत्त्व को घोषित करता हुआ!


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