राग-संवेदन
रचनाकार : डा. महेंद्र भटनागर
दर्द समेटे बैठा हूँ! रे, कितना-कितना दुःख समेटे बैठा हूँ! बरसों-बरसों का दुख-दर्द समेटे बैठा हूँ! रातों-रातों जागा, दिन-दिन भर जागा, सारे जीवन जागा! तन पर भूरी-भूरी गर्द लपेटे बैठा हूँ! दलदल-दलदल पाँव धँसे हैं, गर्दन पर, टखनों पर नाग कसे हैं, काले-काले जहरीले नाग कसे हैं! शैया पर आग बिछाए बैठा हूँ! धायँ-धायँ! दहकाए बैठा हूँ!