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09.02.2007

राग-संवेदन

रचनाकार : डा. महेंद्र भटनागर

जीवन्त
डॉ. महेंद्र भटनागर

दर्द समेटे बैठा हूँ!
रे, कितना-कितना
दुःख समेटे बैठा हूँ!
बरसों-बरसों का दुख-दर्द
            समेटे बैठा हूँ!
रातों-रातों जागा,
दिन-दिन भर जागा,
सारे जीवन जागा!
तन पर भूरी-भूरी गर्द
           लपेटे बैठा हूँ!
दलदल-दलदल
           पाँव धँसे हैं,
गर्दन पर, टखनों पर
           नाग कसे हैं,
काले-काले जहरीले
          नाग कसे हैं!
शैया पर
आग बिछाए बैठा हूँ!
धायँ-धायँ!
दहकाए बैठा हूँ!


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