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09.16.2007

राग-संवेदन

रचनाकार : डा. महेंद्र भटनागर

अनुभूति
डॉ. महेंद्र भटनागर

जीवन-भर
अजीबोगरीब मूर्खताएँ
     करने के सिवा,
समाज का
थोपा हुआ कर्ज
     भरने के सिवा,
क्या किया?
गलतियाँ कीं
खूब गलतियाँ कीं,
चूके
बार-बार चूके!
यों कहें -
जिये;
लेकिन जीने का ढंग
     कहाँ आया?
     (ढोंग कहाँ आया!)
और अब सब-कुछ
भंग-रंग
हो जाने के बाद -
     दंग हूँ,
     बेहद दंग हूँ!
     विवेक अपंग हूँ!
विश्वास किया
लोगों पर,
अंध-विश्वास किया
अपनों पर!
और धूर्त
साफ कर गये सब
     घर-बार,
बरबाद कर गये
जीवन का
     रूप-रंग सिँगार!
छद्म थे, मुखौटे थे,
सत्य के लिबास में
     झूठे थे,
अजब गजब के थे!
ज़िन्दगी गुजर जाने के बाद,
नाटक की
फल-प्राप्ति / समाप्ति के करीब,
सलीब पर लटके हुए
सचाई से रू-ब-रू हुए जब -
अनुभूत हुए
असंख्य विद्युत-झटके
     तीव्र अग्नि-कण!
ऐंठते
दर्द से आहत
     तन-मन!
हैरतअंगेज है, सब!
सब, अद्‍भुत है!
अस्तित्व कहाँ हैं मेरा,
     मेरा बुत है!
अब,
पछतावे का कड़वा रस
पीने के सिवा
     बचा क्या?
जमाने को
न थी, न है
रत्ती-भर
     शर्म-हया!


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