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जीवन-भर
अजीबोगरीब मूर्खताएँ
करने
के सिवा,
समाज का
थोपा हुआ कर्ज
भरने
के सिवा,
क्या किया?
गलतियाँ कीं
खूब गलतियाँ कीं,
चूके
बार-बार चूके!
यों कहें -
जिये;
लेकिन जीने का ढंग
कहाँ
आया?
(ढोंग
कहाँ आया!)
और अब सब-कुछ
भंग-रंग
हो जाने के बाद -
दंग
हूँ,
बेहद
दंग हूँ!
विवेक
अपंग हूँ!
विश्वास किया
लोगों पर,
अंध-विश्वास किया
अपनों पर!
और धूर्त
साफ कर गये सब
घर-बार,
बरबाद कर गये
जीवन का
रूप-रंग
सिँगार!
छद्म थे, मुखौटे थे,
सत्य के लिबास में
झूठे
थे,
अजब गजब के थे!
ज़िन्दगी गुजर जाने के बाद,
नाटक की
फल-प्राप्ति / समाप्ति के करीब,
सलीब पर लटके हुए
सचाई से रू-ब-रू हुए जब -
अनुभूत हुए
असंख्य विद्युत-झटके
तीव्र
अग्नि-कण!
ऐंठते
दर्द से आहत
तन-मन!
हैरतअंगेज है, सब!
सब, अद्भुत है!
अस्तित्व कहाँ हैं मेरा,
मेरा
बुत है!
अब,
पछतावे का कड़वा रस
पीने के सिवा
बचा
क्या?
जमाने को
न थी, न है
रत्ती-भर
शर्म-हया!
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