अन्तरजाल पर साहित्य
प्रेमियों की विश्राम स्थली
मुख्य पृष्ठ
11.22.2007

राग-संवेदन
रचनाकार
: डा. महेंद्र भटनागर

खिलाड़ी
डॉ. महेंद्र भटनागर

दौड़ रहा हूँ
बिना रुके / अविश्रांत
निरन्तर दौड़ रहा हूँ!
             दिन - रात
             रात - दिन
हाँफता हुआ
बद-हवास,
जब -तब
गिर -गिर पड़ता
              उठता,
धड़धड़ दौड़ निकलता!
लगता है -
जीवन - भर
अविराम दौड़ते रहना
मात्र नियति है मेरी!
समयान्तर की सीमाओं को
तोड़ता हुआ
अविरल दौड़ रहा हूँ!
बिना किये होड़ किसी से
निपट अकेला,
देखो -
किस कदर तेज - और तेज
              दौड़ रहा हूँ!         
तैर रहा हूँ
अविरत तैर रहा हूँ
              दिन - रात
              रात - दिन
इधर - उधर
झटकता - पटकता
             हाथ - पैर
             हारे बगैर,
बार - बार
फिचकुरे उगलता
             तैर रहा हूँ!
यह ओलम्पिक का
ठंडे पानी का तालाब नहीं,
खलबल खौलते
गरम पानी का
भाप छोड़ता
              तालाब है!
कि जिसकी छाती पर
उलटा -पुलटा
विरुद्ध - क्रम
देखो,
कैसा तैर रहा हूँ!
अगल - बगल
और - और
तैराक नहीं हैं
केवल मैं हूँ
मत्स्य सरीखा
लहराता तैर रहा हूँ!
लगता है -
अब, खैर नहीं
              कब पैर जकड़ जाएँ
              कब हाथ अकड़ जाएँ।
लेकिन, फिर भी तय है -
तैरता रहूँगा, तैरता रहूँगा!
क्योंकि
ख़ूब देखा है मैंने
लहरों पर लाशों को
उतराते ... बहते!
कूद - कूद कर
लगा रहा हूँ छलाँग
ऊँची - लम्बी
तमाम छलाँग-पर-छलाँग!
                 दिन - रात
                 रात - दिन
कुंदक की     तरह
उछलता हूँ
                बार - बार
घनचक्कर-सा लौट -लौट
फिर - फिर कूद उछलता हूँ!
तोड़ दिये हैं पूर्वाभिलेख
लगता है -
पैमाने छोटे पड़ जाएंगे!
उठा रहा हूँ बोझ
एक-के-बाद-एक
भारी - और अधिक भारी
और ढो रहा हूँ
यहाँ - वहाँ
दूर - दूर तक -
इस कमरे से उस कमरे तक
इस मकान से उस मकान तक
इस गाँव-नगर से उस गाँव-नगर तक
तपते मरुथल से शीतल हिम पर
समतल से पर्वत पर!
लेकिन
मेरी हुँकृति से
थर्राता है आकाश - लोक,
मेरी आकृति से
भय खाता है मृत्यु-लोक!
तय है
हारेगा हर हृदयाघात,
लुंज पक्षाघात
अमर आत्मा के सम्मुख!
जीवन्त रहूँगा
श्रमजीवी मैं,
जीवन-युक्त रहूँगा
उन्मुक्त रहूँगा!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें