राग-संवेदन रचनाकार : डा. महेंद्र भटनागर
जीवन जीना - दूभर - दुर्वह भारी है! मानों दो - नावों की विकट सवारी है! पैरों के नीचे विष - दग्ध दुधारी आरी है, कंठ - सटी अति तीक्ष्ण कटारी है! गल - फाँसी है, हर वक्त बदहवासी है! भगदड़ मारामारी है, गायब पूरनमासी, पसरी सिर्फ घनी अँधियारी है! जीवन जीना - लाचारी है! बेहद भारी है!