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11.22.2007

राग-संवेदन
रचनाकार
: डा. महेंद्र भटनागर

यथार्थता
डॉ. महेंद्र भटनागर

जीवन जीना -
दूभर - दुर्वह
             भारी है!
मानों
दो - नावों की
             विकट सवारी है!
पैरों के नीचे
विष - दग्ध दुधारी आरी है,
कंठ - सटी
अति तीक्ष्ण कटारी है!
गल - फाँसी है,
हर वक्त
              बदहवासी है!
भगदड़ मारामारी है,
गायब
               पूरनमासी,
पसरी सिर्फ
              घनी अँधियारी है!
जीवन जीना -
              लाचारी है!
            बेहद भारी है!


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