राग-संवेदन रचनाकार : डा. महेंद्र भटनागर
कैसी चली हवा! हर कोई केवल हित अपना सोचे, औरों का हिस्सा हड़पे, कोई चाहे कितना तड़पे! घर भरने अपना औरों की बोटी-बोटी काटे नोचे! इस संक्रामक सामाजिक बीमारी की क्या कोई नहीं दवा? कैसी चली हवा!