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10.12.2007

राग-संवेदन

रचनाकार : डा. महेंद्र भटनागर

दो ध्रुव
डॉ. महेंद्र भटनागर

स्पष्ट विभाजित है
        जन-समुदाय -
समर्थ / असहाय।
हैं एक ओर -
भ्रष्ट राजनीतिक दल
उनके अनुयायी खल,
सुख-सुविध-साधन-सम्पन्न
               प्रसन्न।
धन-स्वर्ण से लबालब
आरामतलब / साहब और मुसाहब!
बँगले हैं / चकले हैं,
तलघर हैं / बंकर हैं,
भोग रहे हैं
जीवन की तरह-तरह की नेमत,
               हैरत है, हैरत!
दूसरी तरफ़ -
जन हैं
भूखे-प्यासे दुर्बल, अभावग्रस्त ... त्रस्त,
अनपढ़,
दलित असंगठित,
खेतों - गाँवों / बाज़ारों - नगरों में
                  श्रमरत,             
शोषित / वंचित / शंकित!


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