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ISSN 2292-9754

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07.03.2014


 
अपनी ओर से..........
स्मिता, अमरेन्द्र

देश के विकास के संबंध में सामान्य लोग जिन विचारों पर अकसर बातें करते रहते हैं, उनको नया सवेरा में समेटने की कोशिश की गई है। विकास से जुड़ी संस्थाएँ मसलन राजनीति, प्रशासन, गैर सरकारी संस्थाएँ व मीडिया के बारे में जो प्रतिनिधी धारणाएँ हैं, हमारी कोशिश उन सबों को एक साथ करने की रही है। हम यह दंभ कदापि नहीं भरते हैं कि सारी बातों को किताब में समाहित किया गया है। बहुत से ऐसे विचार हैं, जिनके बारे में हमें जानकारी ही नहीं थी। कुछ जानबूझकर छोड़़ा गया है, ताकि उपन्यास अमार्यदित न हो जाए और फूहड़़पन परोसने का आरोप सुधि पाठकगण न लगाएँ। भ्रष्टाचार पर सीधी और कम चर्चा कुछ हद तक आपको निराश कर सकती है, लेकिन इसके पीछे हमारा ध्येय उन्हें कमतर आँकना नहीं है।

विकास के कुछ सिद्धांत और लोकप्रिय मान्यताओं का किताब में जिक्र किया गया है, लेकिन उन पर ज्ञान का बौछार नहीं किया गया है। हमारा लक्ष्य ऐसे लोगों के पास पहुँचने का है, जो विकास को समझना चाहते हैं व उससे जुड़ी अवधारणाओं को खुद पढ़कर समझने की कोशिश करते हैं, लेकिन कुछ कारणवश कभी एक दिशा में तो कभी-कभार एक साथ कई दिशाओं में चलने लगते हैं। ऐसे हालात में वे अपने लिए किस तरह एक दिशा तय करंे, इसे बताने की कोशिश की गई है।

स्वतंत्रता के बाद से ही देश के विकास पर जोर दिया जा रहा है। अब तक कई पॉलिसी व कार्यक्रम बनाए गए। इस बात का लोगों को आश्वासन दिया गया कि खास कार्यक्रम देश की तकदीर बदल देगा। लेकिन वर्षों बाद पता चला कि देश के विकास का फलसफा उसमें निहित नहीं था, बल्कि किसी अन्य में है। उस फलसफे को फिर से ढूंढ़ने का प्रयास शुरू किया जाने लगा। आजादी पाने के बाद के 62 सालों को मूलतः चार रूपों में देखा जा सकता है। पहला दौर नेहरू का था, जब उन्होंने औद्योगिकीकरण को सर्वेसर्वा बताया। यह प्रक्रिया आज तक जारी है। लेकिन आज इसे दूसरे रूप में परोसा जा रहा है। पॉलिसी मेकर का ध्यान उद्योग खोलने या बंद करने में नहीं है। वे अब इसका विनिवेश करने और उससे प्राप्त धन को किस तरह मौजूदा समस्याओं के समाधान में लगाया जाए, इन बातों पर हैं।

दूसरा दौर राजीव गाँधी का आया। आधुनिकीकरण यानी टेक्नोलॉजी का अधिकतम उपयोग करने की बात की जाने लगी। भारत के युवा वर्ग को सुनहरा सपना दिखाया जाने लगा। परन्तु उनका सपना साकार होना तीसरे दौर में शुरू हुआ, यानी जब मनमोहन सिंह ने वैश्वीकरण की आँधी में देश को विकसित देशों की कतार में खड़ा होने का आभास दिलाया। वे ‘दुनिया एक गाँव के समान’ का काल्पनिक चित्र लोगों के बीच बेचने लगे। खेत-खलिहान में काम करनेवालों के कुछ बच्चों को सिलिकॉन वैली में काम करने का मौका भी मिला।

इसके पहले व्यक्ति और प्रकृति दोनों के साथ तालमेल कर देश का विकास श्रीमति इंदिरा गाँधी का सिर्फ राजनीतिक चाल रहा। आम आदमी के सपनों को पंख नहीं लगा पाया। नेहरू के इंडस्ट्री इज डेवलपमेंट की जगह सस्टेनेबल डेवलपमेंट का प्रावधान ला वे देश के विकास की डोर को पकड़़े ज़रूर रहीं, लेकिन वैसी ऊर्जा और शक्ति का संचार करने में विफल रहीं।

आज जब हम तीन दौर औद्योगिकीकरण, आधुनिकीकरण व वैश्वीकरण का कटु अनुभव ले चुके हैं, तो एक नए दौर में एक नया नारा ‘इन्क्लूसिव ग्रोथ के साथ लोगों को आगे ले जाने की कोशिश की जा रही है। इसके नायक भी श्री मनमोहन सिंह हैं, जो 1991 में वित्त मंत्री थे और अब प्रधानमंत्री हैं। आज उनकी फिलासफी बदली हुई लगती है। दुनिया एक गाँव बताने वाले श्री मनमोहन सिंह गाँव में अब पूरी दुनिया तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। इस बीच श्री अटल विहारी वाजपेयी ने विकास को गाँवों के साथ जोड़कर आम लोगों केे जख्म को छूने की कोशिश की, लेकिन मरहम लगाने में कामयाब नहीं हुए।

ऐसे हालात में लोगों के मन में देश का विकास को लेकर जो पशोपेश आजादी के वक्त था, अब भी कायम है। किताब में लोगों के बीच संवाद के माध्यम से इसे दूर करने की कोशिश की गई है। साथ ही, अपनी समझ से सामान्य समाधान पेश करने की कोशिश भी की गई है। सामाधान पाठकों को रुचिकर लग सकता है, लेकिन इसकी फिसीबिलिटी का अध्ययन करना रिसर्च से जुड़े लोगों का काम है। इस वजह से हमलोगों ने अवधारणा का विस्तृत वर्णन नहीे किया। अगर करता, तो एक अलग उपन्यास, विकास और नीति लिखी जा सकती है, जिसमें नीतिगत फैसले लेने, निर्माण से लेकर कार्यान्वयन का वृहत चित्रण किया जा सकता है।

अगर आपका समर्थन मिला, तो आगे आपकी रुचि और जिज्ञासा को पूरा करने का अवश्य प्रयास किया जाएगा। उपन्यास के रूप में गूढ़ विषय को सरल तरीके से आप तक पहुँचाने में हमें बहुत खुशी हो रही है। प्रोत्साहन के लिए आपके सहयोग एवं समर्थन की हमलोग कामना करते हैं।

यह उपन्यास हमलोगों के साझा प्रयास का फल ज़रूर है, लेकिन रचयिता डॉ. भगवतीशरण मिश्र हैं। उनके प्रोत्साहन से ही लेखन जैसा दुसह्य कार्य करने की इच्छाशक्ति और विचारों को शब्दों में पिरोने का साहस हम लोगों ने किया। उनके लिए आभार प्रदान करना हमारे साहस से परे है।

हमलोग श्री अम्बाचरण वशिष्ट का सादर आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने संपादन कर इसे पाठकों के लिए रुचिकर और मूल्यवान संपदा बनाने में अहम भूमिका अदा की। श्री अवधेश जी का भी आभारी हैं, जिन्होंने अपना बहुमूल्य समय निकालकर इसे टाइप किया।

अंत में श्री मनीन्द्र नाथ ठाकुर का भी आभार व्यक्त किए बिना हम नहीं रह सकते हैं, जिन्होंने प्रकाशन के पहले पढ़ने के लिए वक्त निकाला और एक उपयोगी साहित्य बनाने के लिए अपने कुछ सुझाव दिए। साथ ही, हमलोग आप पाठकगण के भी बहुत-बहुत ़ऋणी हैं।

स्मिता
अमरेन्द्र


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