अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.29.2014


मेरी दृष्टि में
भगवतीशरण मिश्र

उपन्यास आज सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है। भारत ही नहीं विदेशों में भी कविता, कहानी, निबन्ध एवं यात्र-वृत्तान्त की तुलना में उपन्यासों की लोकप्रियता सर्वोपरि है। आज स्थिति यह है कि उपन्यास बहुत शीघ्रता से पग बढ़ाते हुए अन्य साहित्यिक विधाओं को हाशिए पर डाल रहा है। इसके दो प्रमुख कारण हैं। प्रथम है इसमें निहित प्रचुर पठनीयता। पाठकों को आद्यान्त बाँधे रखने की जो कला औपन्यासिक विधा में विकसित हुई उसका संस्पर्श, अन्य विधाएँ करने में अक्षम सिद्ध हुईं। दूसरा कारण है इस विधा की बहुआयामिता। सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अब तो अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को अपने में समेटने का अद्भुत कौशल जो किसी सिद्धहस्त कथाकार के हाथ का स्पर्श पाकर संक्षेप में ही सब कुछ प्रस्तुत कर देता है। भारतीय वाङ्मय में उपन्यास का प्रवेश बाणभट्ट की प्रसिद्ध औपन्यासिक कृति ‘कादम्बरी’ से हुआ। ‘कादम्बरी’ विश्व की प्रथम औपन्यासिक रचना तो है ही, उसकी विशेषता यह है कि भाषा, शिल्प एवं अभिव्यक्ति-कौशल की दृष्टि से आज तक उसके स्तर का उपन्यास किसी भी भाषा में नहीं लिखा गया। इसका सर्वाधिक समर्थ पक्ष है इसका माधुर्य-गुण। शब्दों के कथन में सिद्धहस्त यह अमर ‘साहित्यकार लिखित शब्दों के ग्रंथन से 4-4, 6-6 पंक्तियों का वाक्य-सृजन करने में पटु था पर इतने दीर्घ वाक्यों के पठन एवं पूर्णतथ्य गृहण में किसी सामान्य पाठक को भी कठिनाई नहीं हुई। इस क्रम में कथ्य, कथोपकथन अथवा चरित्र-चित्रणकहीं से बाधित हुए हों, ऐसा भी नहीं हुआ।
‘कादम्बरी’, संस्कृत-वाङ्मय में एक अपवाद ही है क्योंकि संस्कृत में साहित्य का अर्थ मात्र काव्य था। कालिदास के ‘कुमार संभवम्’, ‘रघुवंशम्’, ‘आभिज्ञान शाकुन्तलम्’ ( नाट्य काव्य)’, ‘ऋतु-संहार’, ‘मेघदूतम्’ तथा भारवि, दंडी, माघ आदि वृहत् काव्यग्रन्थों ने संस्कृत को विश्वसाहित्य का सिरमौर बना दिया। यही कारण है कि कालिदास की उपमा अंग्रेजी के शेक्सपियर से दी जाती है। जो हो, लीक से हटकर लिखने वाले ही पथप्रदर्शक सिद्ध होते हैं। वाणभट्ट की औपन्यासिक कृति ने हिन्दी साहित्य में उपन्यास के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया। यद्यपि इसमें समय लगा क्योंकि हिन्दी का वर्तमान स्वरूप ही विलम्ब से आया। इसके पूर्व बृजभाषा, अवधी, मैथिली आदी प्रमुख लोक भाषाओं में सृजन हुआ। सूरदास का ‘सूरसागर’ एवं गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस इसके प्रमुख साक्षी हैं।

हिन्दी उपन्यास का आरम्भ प्रेमचन्द से कुछ पूर्व हुआ। ये आरम्भिक लेखक थे - श्रद्धाराय फिल्लौरी, पं. गौरीदत्त एवं किशोरी लाल गोस्वामी आदि। किशोरी लाल गोस्वामी को हिन्दी के प्रथम उपन्यासकार के रूप में मान्यता मिली। इन लेखकों के पश्चात् देवकीनन्दन खत्री ने अपने तिलस्मी एवं ऐयारी लेखन से उपन्यास को एक नए रूप में उपस्थित कर लोकप्रियता के नए शिखरों का स्पर्श किया। इनकी आकर्षक एवं चमत्कारी प्रस्तुति ने कई लोगों को हिन्दी सीखने को बाध्य किया। खत्री की कृतियों के पाठक आज भी कुछ कम नहीं है। प्रेमचन्द का महत् योगदान यह है कि उन्होंने हिन्दी उपन्यास को सही दिशा और दशा दी। फलतः उनके द्वारा दिखाए मार्ग पर चलने वाले सफल-असफल उपन्यासकारों की एक बड़ी पंक्ति खड़ी हो गई। प्रेमचन्द एक यथार्थवादी आदर्शपरक लेखक थे। सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक समस्याओं पर उनकी गहरी पकड़ थी। गाँवों में व्याप्त गरीबी, शोषण एवं अत्याचार से उनका समीप का परिचय था। अपने उपन्यासों में इनका यथार्थ-परक चित्रण कर वे पाठकों के प्रिय-पात्र बन गए। वह मूलतः ग्रामीण परिवेश के लेखक थे कुछ अपवादों को छोड़कर। आज हिन्दी उपन्यास शिल्प की दृष्टि से नहीं सही पर अन्य दृष्टियों से प्रेमचन्द से बहुत आगे बढ़ गया है। अब तो सामाजिक उपन्यासों के स्थान पर मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक, पौराणिक आदि औपन्यासिक कृतियाँ भी आने लगी हैं। ऐसे भी सम्पूर्ण विश्व (ग्लोब) तो अब एक गाँव बन कर रह गया है। इस ‘ग्लोबलाइजेशन’ अथवा वैश्वीकरण को संभव किया है दूर-संचार-माध्यमों विशेषकर टी.वी., इंटरनेट के विश्वव्यापी प्रचार-प्रसार ने। इससे अब तो आर्थिक परिदृश्य ही पूर्णतया परिवर्तित हो गया है। आर्थिक सम्पन्नता की इस दौड़ में किसी एक राष्ट्र की प्रमुखता कब तक बनी रहे यह कहना कठिन है। वैश्वीकरण अथवा ‘ग्लोबलाइजेशन’ को लेकर भी औपन्यासिक कृतियों के आने की आवश्यकता है। अन्य भाषाओं में कुछ ऐसी कृतियाँ आई भी हैं पर हिन्दी में इस महत्वपूर्ण वैश्विक परिवर्तन को लेकर शायद ही कोई महत्त्वपूर्ण कृति आई है। इस तरह, स्मिता-अमरेन्द्र (पत्नी-पति) की यह सह-प्रस्तुति ‘नया सवेरा’ इस नए युग की एक तरह से प्रथम औपन्यासिक कृति है। पुस्तक की विशेषता यह है कि इसके प्रमुख पात्र दूर-संचार के आधुनिकतम स्वरूप में पूर्णतया दक्ष हैं। देश में बैठे ये कनाडा, अमेरिका आदि से ‘चैटिंग’ कर दोनों ओर की समस्याओं से अवगत होते रहते हैं और आवश्यक सुधारों की संभावनाओं पर भी वार्ता करते रहते हैं। इनके अनुसार अमरीका आदि तथाकथित विकसित देशों का विकास मात्र ऊपरी एवं चकाचौंध भरा है। जमीन से जुड़ाव इनका न के बराबर है तथा इनका इन्फ्रास्ट्रक्चर दुर्बल है जो बहुत सीमा तक भारत आदि कई देशों की सहायता पर टिका है। तथाकथित विकासशील देशों में स्वरोजगार की संभावनाएँ बनते ही इनकी सम्पूर्ण संरचना चरमरा जाएगी और उसके साथ ही इनकी चकाचौंध भी निःशेष हो जाएगी।

इन्हें आज भी गाँधी की बताई अर्थव्यवस्था प्रासंगिक लगती है। भारत आज भी गाँवों का देश है। गाँधी ने स्वावलंबन पर जोर दिया। कुटीर-उद्योगों को यहाँ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी। मशीनी युग में ये कुटीर उद्योग उपेक्षा के आखेट हो समाप्त हो गए। अगर इनको पुनर्जीवित किया जाये तो आज की आधुनिक विकास-प्रणाली के साथ संयुक्त हो ये इस राष्ट्र को शीघ्र ही विकासशील की संज्ञा से मुक्त कर विकसित राष्ट्र की पंक्ति में ला सकते हैं।

इसके एक पात्र मनीष ने दीपावली पर्व के उत्सव के बहाने मंत्री महोदय के समक्ष अपना तर्क प्रस्तुत किया है। उसका अपना विचार है, ‘भारत अन्य सभी देशों की तुलना में बढ़िया है। हमें उन चीजों की तलाश करने की ज़रूरत है जो हमे शक्ति देती हैं। हम सदियों से शक्तिवान रहे हैं। ज़रूरत है उन सोई हुई शक्तियों को फिर से जगाने की। उन्हें आज के संदर्भ में ढ़ालना हमारा कर्त्तव्य है। इसी सोच के आधार पर उसने मंत्री महोदय एवं अन्य एकत्रित लोगों के समक्ष बोलना आरम्भ किया - "महानागरीय संस्कृति ने हमारे तौर-तरीकों को बहुत प्रभावित किया है...बड़े शहरों में दीया-बाती को इलेक्ट्रोनिक बल्ब और पटाखों में बदल दिया जाता है। वक्त आ गया है कि हम अपने मन की आखों को खोलें। हमें तभी पता चल पायेगा कि एक बड़ा वर्ग जिसने दीपावली-पर्व को उजियाले में तब्दील किया है, यानी...दीया बनाने वाले लोग आज अंधेरे में जी रहे हैं। एक समय था जब ग्रामीण भारत में एक विशेष वर्ग दीया बना कर अपना पेट पालता था...आधुनिकीकरण की वजह से हम पुरानी चीजों को छोड़ते जा रहे हैं। इन लघु उद्योगों से जुड़े लोगों के बारे में हम तनिक भी नहीं सोचते हैं।

ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि छोटे एवं पारंपरिक धंधों का आधुनिकीकरण किया जाए और लोगों को उस ओर आकर्षित किया जाए और इससे जुड़े लोगों के जीवन में उजियाला लाया जाये।" सभी लोगों ने मनीष की बातों का तालियों से समर्थन किया और उसकी सराहना की। मंत्री जी ने भी...मनीष की सराहना की ‘...हमें गर्व है कि हमारे मंत्रलय में मनीष जैसे लोग हैं...मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मेरे मंत्रलय में कोई भी निर्णय ब्यूरोक्रेट की ब्रीफींग से नहीं होगा, बल्कि लोगों के सरोकार के आधार पर लिया जाएगा। आम लोगों की समस्याओं को समझने के लिए हम उनके बीच जायेंगे। कोई भी कदम आम लोगों के अनुभव के आधार पर ही उठायेंगे।" इन्हीं पंक्तियों के साथ उपन्यास का अंत होता है और ये ही पंक्तियाँ स्पष्ट करती हैं कि कैसे कुछ समर्पित निष्ठावान एवं देश-प्रेम से आकंठ भरे लोग एक राष्ट्र के मंत्री तो मंत्री, राष्ट्र की ही दशा-दिशा बदल देते हैं। लेखक-गण ने कुछ सूत्र सुझाए हैं जो मौलिक हैं। इस उपन्यास में उपन्यास की सारी महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ जैसे - चरित्र-चित्रण, कथ्य, कथोपक्रम, अभिव्यक्ति, कौशल आदि उपलब्ध हैं। सर्वोपरि, कथोपकथन अत्यन्त प्रवहमान, सरल एवं प्रभावी हैं। किन्तु इन सब पर आने के पूर्व हमें उपन्यासकारों की मौलिक उद्भावनाओं को जान लेना आवश्यक हैं जो सूत्रवत् प्रस्तुत किये गए हैं। उपन्यास लेखन में यह प्रथम प्रयोग है और इनसे नए लेखकों को कुछ नए रूप में प्रस्तुत करने की प्रेरणा मिलेगी। उपन्यास का यह अंश उद्धृत करना पड़े़गा-

"विजय-‘सर आपको मालूम है कि जब आम आदमी को केन्द्र में रख कर ही काम किया जा रहा है तो हमें भी उसी के इर्द-गिर्द काम करना है।’

‘मैं कई लोगों से बात करने पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि आदमी के विकास के लिए ‘3 सी’ और देश के विकास के लिए ‘4 डी’ की ज़रूरत है। ’

‘क्या मतलब’, मंत्री जी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा -
विजय - ‘सर! 3 सी का मतलब कम्युनिकेशन, कॉन्फिडेंस ऐंड कम्प्यूटर।

वहीं 4 डी मिन्स -
1. डी-डिविजन इन सोसायटी
2. डी-डिलीवरी इन टाइम
3. डी-डेवलपमेन्ट टू दी डोर
4. डी-डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ नेशनल प्रोपर्टी। ’

लेखक ने इस तरह के सुझाव दिये हैं। विशेषकर पंचायतों के सशक्तिकरण का इनका सुझाव मौलिक एवं मननीय ही नहीं प्रयोगणीय भी है। हम उपन्यास की विशेषताओं की चर्चा कर रहे थे। विशेषकर कथोपकथन की। प्रस्तुत है एक उदाहरण- - "वीणा ने हामी भरते हुए कहा - "देखो मन शुद्ध हो तो इसका असर हम पर खूब पड़़ता है। हमारे मन पर खान-पान, वेशभूषा, सभी का प्रभाव पड़ता है।
विजय - ‘तुम ठीक कह रही हो। हम इसे दूसरे रूप में भी कह सकते हैं कि मन के भाव भी हमारे खान-पान, वेश-भूषा व्यवहार आदि को निर्धारित करते हैं’ वीणा ने आश्वस्त होने के लिए पूछा, ‘क्या तुम अब मांस-मछली खाना छोड़ दोगे?’ विजय ने हामी भरी।

‘...............................................’

अधिक नहीं लिखकर यही लिखना पर्याप्त है कि इस औपन्यासिक .ति में उपन्यास के सभी गुण तो वर्तमान हैं ही, यह कुछ नए प्रयोग भी करता है। एक नए तकनीक से पाठकों और लेखकों का परिचय कराता है। उपन्यास स्वागत-योग्य है। यह पठनीय और संग्रहणीय ही नहीं मननीय भी है। यह मात्र एक काल्पनिक नहीं व्यावहारिक एवं यथार्थ-परक कृति है जिसकी मान्यताओं पर अमल किया जाय तो देश में सचमुच ‘नया सबेरा’ आकर रहेगा।

लेखक-द्वय को ऐसी अच्छी कृति के लिए मेरा पुनः-पुनः साधुवाद। इतिशुभम्।

- भगवतीशरण मिश्र
जी.एच - 13/805 पश्चिम विहार, नई दिल्ली - 87 मो. 9871219732



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें