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ISSN 2292-9754

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10.14.2014


71.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मंत्री कार्यालय में सभी को बता दी कि मंत्री जी ने दीपावली के दिन अपने घर पर सभी को खाने के लिए निमंत्रित किया है। वे अपने सभी स्टाफ के कामकाज से खुश हैं। उन्होंने मंत्री पद संभालते समय ही कहा था कि किसी दिन हम सब एक स्थान पर इकट्ठा होंगे। लिहाजा, सभी लोग निश्चित समय पर सांय सात बजे मंत्री जी के आवास पर पहुँच गए। विजय सभी लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा था। इसलिए उसने आवास परिसर में एक छोटे समारोह के आयोजन का कार्यक्रम बनाया, जिसमें सभी के बैठने, खाने-पीने की व्यवस्था के अलावा, माइक की भी व्यवस्था की, ताकि मनीष सबको संबोधित करते हुए दो शब्द बोले।

मनीष को इस बात की जानकारी नहीं थी। वह सात बजने में 20 मिनट बाकी था तब वहाँ पहुँचा। वह लोगों से मिल-जुल रहा था। सब लोगों की तरह वह भी सोच रहा था कि मंत्री जी आएँगे और अपनी दो बात कह कर चले जाएँगे। मंत्री जी ठीक सात बजे वहाँ पहुँच गए। विजय ने अपनी सीट से उठकर मंत्री जी का स्वागत किया और मनीष से मंच पर आकर दो शब्द बोलने को कहा।

विजय के ये शब्द सुनकर मनीष हक्का-बक्का रह गया। उसे लगा कि विजय जी ने गलती से उसका नाम पुकार लिया है। इसलिए वह इधर-उधर देखने लगा। उसके नाम को जब दोबारा पुकारा गया, तो वह अपनी सीट से उठ गया। वह यह सोचकर घबरा गया कि वह क्या बोलेगा? जबसे उसने कम्प्यूटर खरीदा है, अमरीका में रह रहे अपने दोस्त से खूब चैटिंग करता। इसलिए आजकल उसे अमरीका के बारे में अच्छी जानकारी हासिल हो गई थी। वहाँ सफलता के पैमाने, भारत से गए लोगों, उनके सुख-दुख आदि के बारे में भी वह कुछ हद तक जान गया था। साथ ही उसे यह भी पता चल गया था कि अमरीका के लोग अब भारतीय जीवन पद्धति को तेजी से अपना रहे हैं। यह सब सोचते हुए वह माइक के पास पहुँच जाता है। अचानक उसे अपने दोस्त की कही गई बात याद आती है कि भारत के ज्यादातर लोग बाहरी आँखों से नहीं, बल्कि मन की आँखों से किसी चीज को देखते-परखते हैं। जो लोग ऐसा नहीं करते हैं, वे बाहरी चकाचौंध से प्रभावित होते हैं।

भारत अन्य सभी देशों की तुलना में अच्छा है। हमें उन चीजों की तलाश करने की ज़रूरत है, जो हमें शक्ति देता है। हम सदियों से शक्तिवान रहे हैं। ज़रूरत है, उन सोई हुई शक्तियों को फिर से जगाने की। उन्हें आज के संदर्भ में ढालना हमारा कर्तव्य है। यदि हम अपने मन की आँखों से देखें, तो हमें सब-कुछ नजर आएगा, वरना नहीं। यही सोच उसके दिमाग पर हावी है। आज दीपावली है, इसलिए दीपावली के दिन मन की आँखों को कैसे खोला जाए, इस पर उसने बोलना शुरू किया।

महानगरीय संस्कृति ने हमारे तौर-तरीकों को काफी प्रभावित किया है। इसी वजह से हमारे जीवन में बदलाव भी आया है। हम महानगर में रहें या गाँव में, अपने पर्व-त्योहार को र्ह्षोल्लास के साथ मनाते हैं। हालांकि शहरी और ग्रामीण परिवेश में इसे मनाने के तरीके में भिन्नता आ गई है। बड़े शहरों में दीया-बाती को इलेक्टॉनिक बल्ब और पटाखे में बदल दिया गया है।

महानगरों की यह परंपरा धीरे-धीरे छोटे शहरों में भी अपनाई जाने लगी है। देखा-देखी में गॉव वाले भी इसे अपनाने लगे हैं। लोगो में यह होड़ रहती है कि दीपावली के दिन अंधकार पर काबू पाने में कौन कितना रुपया-पैसा लगा रहा है! जब मैं इस विषय पर सोचता हूँ, तो ऐसा लगता है कि दोनों के बीच तौर-तरीकों में अंतर आ गया है, लेकिन भाव में नहीं।

दीपावली पर्व हम सभी खुशियाँ बाँटने के लिए मनाते हैं, लेकिन कभी-कभी शहरी चकाचौंध में लोग आँख मूंद लेते हैं। पटाखों की गड़गड़ाहट में धुँआ, प्रदूषण पर चेतावनी भी दी जाती है। पर्यावरणविद हमें इससे होने वाले नुकसान के बारे में भी बताते हैं, लेकिन हम उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते हैं, क्योंकि हम अपनी मन की आँखें बंद किए रहते हैं।

वक्त आ गया है जब हम अपनी मन की आँखों को खोलें। हमें तभी पता चल पाएगा कि एक बड़ा वर्ग, जिसने दीपावली पर्व को उजियाले में तब्दील किया है, उनका जीवन यानी पटाखे, दीया बनाने वाले लोग आज अँधेरे में जी रहे हैं।

मय था, जब ग्रामीण भारत में एक विशेष वर्ग दीया बनाकर अपना पेट पालते थे।
बाद में लोगों ने मोमबत्ती का प्रयोग शुरू कर दिया, लेकिन अब मोमबत्ती का भी प्रयोग कम होने लगा है। आधुनिकीकरण की वजह से हम पुरानी चीजों को छोड़ते जा रहे हैं। इन लघु उद्योग से जुड़े लोगों के बारे में हम तनिक भी नहीं सोचते हैं।

ऐसी स्थिति में सरकार को चाहिए कि छोटे एवं पारंपरिक धंधो का आधुनिकीकरण किया जाये और लोगों को उस ओर आकर्षित किया जाए। और इससे जुड़े लोगों के जीवन में उजियाला लाया जाये।

मुझे उम्मीद है कि हैरी पॉर्टर पढ़ने वाले बच्चे भी आगे चलकर पॉर्टर के बारे में सोचेंगे। हूँ मूण्ड माई चीज पढ़ने वाले पैरेंट्स हू मुण्ड माई रोजी रोटी जो देश के करोड़ो लोग उनसे चिल्ला कर कह रहे हैं उनके बारे में भी सोचेंगे। इस दीपावली पर समाज के सभी तबके में उजियाला लाने का हम संकल्प लें। सभी ने मनीष की बातों का तालियों से समर्थन किया और उसकी सराहना की। मंत्री जी ने भी अपने संक्षिप्त भाषण में मनीष की सराहना की। उन्होंने कहा कि आज भारत को मनीष जैसे युवा की ज़रूरत है। ऐसे ही विचारवान युवकों से भारत तरक्की करेगा। हमें अब किसी एक वर्ग के बारे में नहीं, बल्कि आम जनता के बारे में सोचना है। देश के विकास की रूपरेखा में विसंगति इसी वजह से आई है कि हम किसी खास वर्ग के लाभ तक ही सिमट जाते हैं। हमारी सोच सीमित हो जाती है। मनीष ने अपनी बातों में न धर्म का जिक्र किया और न ही राजनीतिक नफा-नुकसान की बात कही, जैसा कि हम सभी राजनीतिज्ञ करते हैं। हमें गर्व है कि हमारे मंत्रालय में मनीष जैसे लोग हैं, यह वास्तव में हमारा राजदूत है। मैं इन शब्दों के साथ अपनी तकरीर खत्म करता हूँ और विश्वास दिलाता हूँ कि मेरे मंत्रालय में कोई भी निर्णय ब्यूरोक्रेट के ब्रीफींग से नहीं, बल्कि आम लोगों के सरोकार से लिया जाएगा। आम लोगों की समस्याओ को समझने के लिए हम उनके बीच जाएँगे। कोई भी कदम अपने अनुभव के आघार पर ही उठायेंगें।

विकास और विनाश

विकास और विनाश साथ साथ चलते हैं
विकास सृजन है
युगद्रष्टा की सोच है
कड़ी मेहनत का प्रतिफल है
प्रक्रिया है कल को बेहतर करने का

विनाश स्वतः स्फूर्त है
प्राकृतिक हो या मानवकृत
क्षण भर में विघटन
इसकी पहचान है
इसमें संतोष है
ऊँच, नीच, भेद-भाव
किसी की जगह नहीं
सब के लिए समान है

विकास असमान है
वर्ग विशेष, समय सापेक्ष
व्यक्ति विशेष का काम है
इसलिए असंतोष है

विनाश में सांत्वना मिलती
मदद के हाथ आगे आते
भूकंप हो, प्रलय हो
आतंकवाद हो या नक्सलवाद

सभी में हम एकजुटता दिखाते
विकास में विरोध के स्वर उठते
गाँव के पगडंडियों का निर्माण हो
या संसद में पॉलिसी प्रोग्राम की चर्चा
हर कोई उंगली उठाने का मौका तलाशता

आज ज़रूरत है विकास को
वादों की कालकोठरी से मुक्त कराना
समाजवाद, उदारवाद, लेफ्ट या राइट
इसका आधार नहीं हो सकता है

निरपेक्ष हो, समय की कसौटी पर
नई सोच को विकसित करना
विकास की पहली ज़रूरत है
आगे बढ़ने की पहली पायदान है

विकास सिर्फ सड़क, बिजली, पानी पहुँचाना नहीं
शिक्षा, स्वास्थ्य रोजगार उपलब्ध कराना भी नहीं
बल्कि लोगों को अवसरों का विकल्प देना है
उनकी प्रवृति के अनुसार काम फराहम कराना है


लोगों को आसपास के विकास में सहभागिता प्रदान करना है
आपदा के अप्रत्याशित हानि को कैसे कम कर
बगैर हिम्मत हारे आगे बढ़ने की सोच पैदा करना है
विकास और विनाश के बेमेल जोड़ को
समझने की समझदारी पैदा करना है।
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