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ISSN 2292-9754

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10.14.2014


68.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मंत्री कार्यालय में सभी लोग आ चुके थे। सभी अपनी-अपनी सामान्य ड्यूटी को निभा रहे थे। रोज की तरह विजय अपने दैनिक कार्यों में जुटा हुआ है। आज उसे कई और काम भी करने हैं। मंत्री कार्यालय में वह सबसे पुराना अधिकारी है। आजकल उसे नए बहाल हुए कर्मचारियों के सिटिंग एरेंजमेंट से लेकर ऑफिस के इंटीरियर डेकोरशन के काम को भी अपनी निगरानी में पूरा कराना पड़ रहा था। वह कार्यालय को नया लुक देना चाह रहा था। इन सभी काम को निबटाने में अब तक तकरीबन उसे दो महीने से भी ऊपर समय लग चुका था।

इस बीच वह देश के विकास की योजनाओं के बारे में बिल्कुल ही नहीं सोच पाया था। उसने सोचा कि पहले इन सभी काम को निपटा लिया जाए, उसके बाद उस विषय पर सोचूंगा। दो दिन पहले उसकी सॉफ्टवेयर इंजीनियर दोस्त विकास से मात्र दो घंटे के लिए गाँवों कीे वेबसाइट बनने की प्रक्रिया पर चर्चा हुई थी। दरअसल, विकास ने उसे बताया कि इस प्रोजेक्ट को पूरा किया जा सकता है, लेकिन इसमें कई समस्याएँ आ सकती हैं। उसने उसे प्रोजेक्ट को पूरा करने में आने वाली कई तरह की बाधाओं से अवगत कराया। साथ ही, उसने यह भी बताया कि नंदन निलेकनी जैसे लोग इस यूनिक आइडेन्टीफिकेशन नम्बर प्रोजेक्ट से जुड़े हैं, तो उसका विरोध करना ठीक नहीं है।

इसके अलावा, दोनों ने अर्बन व रूरल डिस्ट्रेस को कैसे खत्म किया जाए, इस पर भी चर्चा की। विकास ने रूरल डिस्ट्रेस को खत्म करने के लिए चार ज़रूरतों को पूरा करने की सलाह दी। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पलायन। दोनों इस बात पर सहमत हुए कि गाँव से पलायन रोकने के लिए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम के पूरा ;च्नतंद्ध कॉन्सेप्ट को त्वरित गति से लागू करने का निर्णय लिया जाना चाहिए। दूसरी बात यह कि गाँवों का आकार एक समान हो। कहने का मतलब यह है कि अभी किसी गाँव में 1000 घर हैं, तो किसी दूसरे गाँव में 100 घर। साथ ही, उनके क्षेत्रफल में भी अन्तर है। ऐसी स्थिति में गाँव के विकास में बहुत परेशानी आती है। विकास का मानना है कि सभी गाँव का क्षेत्रफल और जनसंख्या एक समान करने से कई लाभ होंगे। गाँवों के आधुनिकीकरण के लिए यह ज़रूरी है। ग्रामीण जनता शहरों की ओर रुख न करे, इसके लिए गाँवों में मकान, वाटर सप्लाई, ड्रेनेज सिस्टम आदि का पुख्ता प्रबंध ज़रूरी है।

सरकार इस पर भी ध्यान दे कि यदि किसी गाँव के इर्द-गिर्द अपार्टमेंट बनाया जा रहा है, तो उस गाँव की ज़रूरत को समझा जाए! दिल्ली, मुम्बई और अन्य मेट्रो के इर्द-गिर्द कई सेटेलाइट टाउनशिप बन रहे हैं, लेकिन उसके आस-पास के गाँव अभी-भी पिछड़ी स्थिति में हैं। गाँवों के लोगों की जमीन चली गई। उनके जमीन पर शहर के धनाढ्य लोग ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहे हैं, वहीं गाँवों के लोगों को साफ पानी भी नहीं मिल़ पा रहा है। सरकार मॉडल विलेज के कॉन्सेप्ट पर काम करे। ग्रामीण ज़रूरतों के आधार पर मकान तैयार किया जाए। पहले गाँव के मकान में खूब जगह होती थी। अब ज्यादातर गाँवों में गलियाँ संकरी और आँगन खत्म हो गए हैं, क्योंकि परिवार बढ़ने के कारण घर बंटते चले गए और जगह कम होती गई। मकान ऐसा हो, जिसमें आने वाली पीढ़ियाँ उसमें बदलाव करें, फिर भी मकान की सुंदरता बरकरार रहे।

गाँव में सुविधाओं की कमी और उसके बदलते स्वरूप की वजह से भी जो लोग नौकरी करने के लिए गाँव से बाहर चले जाते हैं, वे फिर दोबारा वहाँ लौटकर नहीं जाते हैं। इसकी वजह से आज शहर में भीड़ बढ़ती जा रही है। यदि यह सब इसी तरह चलता रहा, तो शहर को ध्यान में रखकर किया जाने वाला विकास लाभदायक नहीं होता है। देश की राजधानी दिल्ली में बाहर से आकर यहाँ बस जाने वाले लोगों की संख्या कई गुणा बढ़ गई है। यहाँ सड़कों का निर्माण पिछले 20 वर्षों से जितना अधिक हुआ है, उससे कई गुणा वाहनों की संख्या बढ़ गई। हालात यह हैं कि सड़कों पर गाड़ियाँ दौड़ती नहीं, बल्कि रेंगती हैं।

विकास और विजय काफी देर चर्चा करने के बाद इस निर्णय पर पहुँचे कि गाँव से बाहर जाने वाले लोगों को अपनी कमाई, बचत का कुछ पैसा गाँवों में भी खर्च करना चाहिए। सरकार को भी ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए टैक्स रिलीफ सहित कई दूसरी सुविधाएँ देनी चाहिए। हालांकि शहर में कमाई करने के बाद गाँव के लोग वापस लौटना चाहते हैं, लेकिन वहाँ मूलभूत सुविधाओं का अभाव होने के कारण अपना विचार त्याग कर "शहर में ही बस जाते हैं। सरकार को इस दिशा में ज़रूर पहल करनी चाहिए। यदि लोग गाँव की ओर लौटने लगेंगे, तो न केवल वहाँ एक नई ऊर्जा का संचार होगा, बल्कि शहरों की समस्याएँ भी कम होंगी।


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