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ISSN 2292-9754

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10.06.2014


67.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मनीष के लिए आज का दिन काफी अच्छा था। आज सवेरे ही उसे वह सब कुछ मिल गया, जिसकी उसे तलाश थी। पत्नी को भी नौकरी मिल जाएगी! विजय के आश्वासन से उसके जीवन में एक नई ताजगी आ गई। वह आज गौरवान्वित महसूस कर रहा था। आज उसकी धारणा को और मजबूती मिल गई कि अच्छा काम कर के भी आदमी आगे बढ़ सकता है। वह ऐसे कई लोगों को जानता था, जो अपने अधिकारियों के लिए पैसा, पब और पार्टी का इंतजाम करते थे। इसके आधार पर वे नौकरी में तरक्की पाते। यह सब देखकर कभी-कभी उसे निराशा भी होती! लेकिन यह सोचकर कि हम ऐसा नहीं कर सकते, अपने मन को तसल्ली देता।

दरअसल, उसके संस्कार उन लोगों से जुदा थे। मनीष ने गाँव के स्कूल में पढ़ाई की थी। वहाँ कक्षा सातवीं में एक बुजुर्ग शिक्षक ने जो सीख दी थी, वह आज भी उसे याद है। उसके जीवन के लिए वह सीख अनमोल है। पारिवारिक एवं आर्थिक कारणों की वजह से उस समय वह उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर सका था। उसके शिक्षक ने कहा था, "सामान्यतया आदमी तीन चीजों के बारे में अधिक बात करता है- एक, अपने आसपास के लोगों के बारे में, उनकी खामियों-गलतियों के बारे में, दूसरा, घटना विशेष के बारे में, और तीसरा, विचारों के बारे में। इन तीनों में जो लोग विचारों के बारे में बात करते हैं उन्हें श्रेष्ठ माना जा सकता है। दूसरी श्रेणी में घटना के बारे में बात करने वाले लोग आते हैं। निम्न कोटि में वे लोग आते हैं, जो केवल दूसरे के बारे में और इधर-उधर की बात अधिक करते हैं।

मनीष ने इसे जीवन का मूल-मंत्र मान लिया। इसी मंत्र के आधार पर वह आदमी की पहचान करता और उसे सम्मान देता। हालांकि ऐसा करते हुए कई बार उसे उपेक्षा और अपमान भी सहना पड़ता। लेकिन वह इससे नहीं डिगा, बल्कि उसकी यह धारणा और मजबूत हुई। आज जब विजय ने योग्यता के अनुरूप उसे काम देने और पत्नी को नौकरी दिलाने की बात कही, तो उसके चेहरे पर गौरव के भाव खिल गए।

वह आज दिन भर हर्षोल्लास के साथ अपने काम को करता रहा। साथ ही, और नए विचारों की तलाश भी करना शुरू कर दिया। शाम में घर आने पर उसने सारी बातें राधा को बताईं। अपनी नौकरी के बारे में सुनकर राधा पहले तो खुश हुई। साथ ही, उसने अपनी नाराजगी भी व्यक्त कर दी।
राधा, "यह ठीक नहीं है। किसी से मांगना ठीक नहीं है। हमें अपनी काबिलियत से ही कुछ हासिल करना चाहिए।"

मनीष, "देखो सरकारी नौकरी का अपना अलग महत्व है। यहाँ व्यक्ति का शोषण नहीं होता है। प्राइवेट नौकरियों में व्यक्ति को खुलेआम परेशान किया जाता है। आठ घंटे के बदले उनसे दस-बारह घंटे काम लिया जाता है। हाल ही में मैं अखबार में एक रिपोर्ट पढ़ रहा था। उसमें बताया गया था कि कारपॉरेट में काम करने वाले लोग 35 वर्ष में ही बूढ़े हो जाते हैं।"

राधा, "क्या काम करने से भी कोई बूढ़ा हो सकता है? यह सब बेकार की बातें हैं।"

मनीष, "तुम सही कह रही हो, काम करने से कोई बूढ़ा नहीं होता है। लेकिन तुम वहाँ काम कराने का तरीका देखोगी, तो आश्चर्यचकित हो जाओगी! प्राइवेट में आपको सुबह 9 बजे ऑफिस पहुँचकर अपनी सीट पर बैठ जाना होता है। वहाँ हर वक्त कैमरा आपकी निगरानी कर रहा होगा! आप लगातार इस डर से सीट पर बैठे होते हैं कि कहीं बॉस की नजर आप पर न पड़ जाए!

मेरे हिसाब से यह बहुत ही गलत है। वहाँ आदमी को मशीन की तरह ट्रीट किया जाता है। आप हमेशा एक डर के माहौल में काम करते हैं। आपकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती है। इससे लोगों को तनाव, ब्लड-प्रेशर बढ़ना स्वाभाविक है।
यह ऑफिस की बात हुई। फैक्ट्रियों में तो और भी बुरा हाल है। लोगों से काम लिया जा रहा है, लेकिन उनकी मेहनत के अनुसार उन्हें पैसा नहीं दिया जा रहा है। मालिक अपने मुनाफे का एक हिस्सा भी खर्च नहीं करना चाहता है। वह केवल उतना ही खर्च करता है, जिससे उसका काम निकल जाए।

सरकारी नौकरियों में ऐसा नहीं है। आपको पूरी आजादी दी जाती है। अगर आप काम करना चाहते हैं, तो कर सकते हैं। हाँ, इधर कुछ वर्षों में यहाँ भी दूसरे तरह का शोषण पनपा है।

मैंने तुम्हे बताया था कि सरकारी नौकरियों में अब सीधी भर्ती नहीं हो रही है। सरकार का निर्देश है कि कॉन्ट्रैक्ट पर लोगों को रखा जाए। संस्थान में पहले से काम कर रहे, यानी स्थायी कर्मचारियों को तनख्वाह और दूसरी कई सुविधाएँ दी जाती हैं, फिर भी वे काम नहीं करते हैं। दिन भर गप्पें मारना, और राजनीति में वे समय खर्च देते हैं। वहीं दूसरी ओर, कॉन्ट्रैक्ट पर भर्ती हुआ आदमी इस डर से काम करता है कि अगर वह काम नहीं करेगा, तो उसे निकाल दिया जाएगा! वह अपनी बात को कहीं किसी फोरम में रख भी नहीं सकता है। लिहाजा वह पिस रहा है, फिर भी काम कर रहा है।"

राधा, "पिस क्या रहा है? काम करने का पैसा मिलता है न!"

मनीष, "पैसा मिलता है, लेकिन स्थाई कर्मचारियों के बराबर नहीं। इसलिए ऐसे लोग कुंठित होते रहते हैं। वे चिंतित रहते हैं कि सामनेवाला काम नहीं करने के बावजूद अधिक पैसे कमा रहा है।"

राधा, "उन लोगों के लिए सरकार कुछ क्यों नहीं करती है?"

मनीष, "सरकार को कुछ करना चाहिए, लेकिन उसे मालूम चले, तब न कुछ करे! आज जब तुम्हें नौकरी मिलने की बात आई, तो मैंने इस कॉनट्रैक्चुअल जॉब के बारे में जानने की कोशिश की। तभी इसके बारे में मुझे कई बातों का पता चला। सामान्य व्यक्ति डर या झिझक की वजह से अपने अधिकारियों तक अपनी बात पहुँचा भी नहीं पाता है! इन छोटी बातों को जानने में ऊपर वाले लोगों को दिलचस्पी भी नहीं होती है।

तुम खुद नौकरी पाने की बात करती हो! यह गलत नहीं है। मैं इस सोच की कद्र करता हूँ, लेकिन जब नौकरी की तलाश में बाहर निकलोगी, तब तुम्हें असली बात समझ में आएगी! लोग बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ लेकर घूम रहे हैं, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है। लोगों को उनकी योग्यता से कमतर काम मिल रहा है। बॉटनी में एमएससी किया हुआ छात्र यदि इंश्योरेंस कंपनी का बीमा बेचे, तो तुम क्या इसे सही मानोगी? आज इतिहास और समाज शास्त्र में डॉक्टरेट किए हुए छात्र प्रॉपर्टी डीलर का काम कर रहे हैं। क्या यह ठीक है?

देखो हमें कई सारी विसंगतियों का सामना करना पड़ता है।"

मनीष की बातों को गंभीरता से राधा सुनती रही। काफी सोच-विचार करने के बाद वह उसके मंत्रालय से जुड़ी स्वायत्त संस्था में काम करने को तैयार हो गई।


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