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ISSN 2292-9754

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10.06.2014


66.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मैंने अभी-अभी तुम्हारा मेल चेक किया है। मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि यूनीक आईडेंटिफिकेशन नंबर, यानी यूआईएन को नकारा भी नहीं जा सकता है। हमें इसकी उपयोगिता और इसे पूरा करने में आनेवाली कठिनाइयों का भी अध्ययन करना होगा। इसके बाद ही हम किसी ठोस नतीजे पर पहुँच सकते हैं। मैं अगले महीने दिल्ली आ रहा हूँ, तब इसपर विशेष रूप से चर्चा होगी। विकास का भेजा हुआ ईमेल विजय पढ़ रहा है। इस बीच, मिठाई का डिब्बा लिए हुए मनीष उसके केबिन में दाखिल होता है।

विजय सोचता है-शायद मनीष को मेरे ओएसडी बनने की खबर मिल चुकी है! इसलिए वह कहता है, "अरे, यह क्या है, मिठाई तो मुझे खिलानी चाहिए थी! तुम क्यों लाए हो?" लेकिन तुरंत उसे अहसास हुआ कि उसने तो किसी को अभी तक सूचना नहीं दी है! इस संबंध में कोई नोटिफिकेशन भी नहीं दिया गया है।

आखिर इस बात की जानकारी इसे कैसे मिली? हो सकता है कि मंत्री जी के घर के किसी आदमी ने इसे बताया हो! इसलिए उसने सही बात जानने के लिए पूछा, "तुम्हें यह बात किसने बताई? मैंने तो किसी से अभी तक इस बात की चर्चा भी नहीं की है कि मंत्री जी मुझे ओएसडी के रूप में रखने के लिए तैयार हैं।"

मनीष, "सर! इसमें कौन-सी बड़ी बात हो गई? आप जैसे काबिल आदमी को हर कोई रखना चाहेगा। आप तो पूरे मंत्रालय का जिम्मा संभाले हुए हैं। मंत्री जी को किसी व्यक्ति को रखना ही था। फिर आपसे अधिक योग्य व्यक्ति उन्हें कहाँ मिलेगा? मुझे तो आपको लेकर थोड़ी भी शंका नहीं थी।" विजय के चेहरे पर मुस्कुराहट देख मनीष बोलता चला गया। वह अब इस उधेड़बुन में है कि अपने बारे में कैसे बताऊँ! वह तरकीब सोचने लगता है।

उसने रविवार को कम्प्यूटर खरीद लिया था। उसे सही तरीके से फिट करने के लिए उसने सोमवार को छुट्टी ले ली थी। आज मंगलवार है। वह बजरंगबली का भक्त था। इसलिए आज उसने मंदिर में प्रसाद चढ़ाया था। वह जानता था कि विजय सर को काजू-बर्फी बहुत पसंद है। इसलिए उसने उनके लिए एक किलो काजू-बर्फी और अन्य लोगों के लिए बेसन का लड्डू खरीदा था। वह सबसे पहले विजय को बर्फी देने चला आया था। उसने अभी तक ऑफिस में किसी और से कम्प्यूटर खरीदने के बारे में चर्चा भी नहीं की है। वह विजय से बोला, "सर, मैं आज बजरंगबली के मंदिर चला गया था। पिछले कुछ दिनों से आप परेशान थे और मैं भी! अब जब आपका यहाँ रहना निश्चित हो गया है, तो अपनी परेशानी भी आपसे बता देता हूँ।"

विजय, "यह आपने बहुत अच्छा किया, जो मंदिर से हो आये। हमें भगवान और उनकी अलौकिक शक्तियों पर अवश्य विश्वास रखना चाहिए। अपना कर्म और बुद्धि के साथ-साथ भगवान का आशीर्वाद भी आपके साथ होना चाहिए। हाँ बताइए, क्यों परेशान थे आप?"

मनीष, "सर, इधर मुझे कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। मुझे कितनी तनख्वाह मिलती है, यह बात आपसे छुपी नहीं है। मेरी पत्नी कई दिनों से कम्प्यूटर की मांग कर रही थी। वह कहती थी कि कम्प्यूटर सीखकर वह नौकरी करेगी। इसलिए कम्प्यूटर खरीदना पड़ा। उसने अंग्रेजी भी सीख ली है। अब वह नौकरी करने की जिद कर रही है। मैंने सोचा कि मंदिर हो आऊँ। जा कर दुआ मांगू आप इसी मंत्रालय में बने रहें। उसकी नौकरी लग जाए।"

विजय कुछ देर सोचते रहा और पूछा कि क्या उसे कम्प्यूटर ऑपरेट करना सीखा है? उसे अंग्रेजी आती है? क्या ग्रेजुएट है?
मनीष, "नहीं सर बारहवीं पास है।"
विजय की नौकरी बचाने में मनीष का बहुत बड़ा योगदान था। इसलिए वह उसकी मदद करने के सभी विकल्पों को तलाश रहा है। उसे ध्यान आया कि मंत्रालय के अंतर्गत आने बाले बोर्ड, आयोग, इंस्टीट्यूट जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत स्थापित किया गया है, उसमें डाटा एँट्री आपरेटर की नौकरी मिल सकती है।

उसने पूछा, "क्या वे डाटा एँट्री कर सकती हैं? आप कहाँ रहते हैं? उनका नाम क्या है?"

मनीष ने धीरे से कहा, "हाँ, मैं वैशाली, गाजियाबाद में रहता हूँ सर। उसका नाम राधा है।"

विजय ने तुरंत अपने मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्था के डायरेक्टर को फोन मिलाया। उसने उनसे राधा को नौकरी देने की बात कही। डायरेक्टर ने हाँ कहा और उसे उसके पास भेजने को कहा। दरअसल, इस डायरेक्टर से विजय की खूब जमती थी। उसे डायरेक्टर बनाने में उसका ही योगदान था। अब मंत्री बदल चुके थे। लिहाजा उसे अब फिर से विजय की ज़रूरत महसूस होने लगी थी, ताकि उनका काम ठीक ढंग से चलता रहे।

विजय ने मनीष से कहा, "कल उन्हें भेज देना। समझो उनकी नौकरी पक्की हो गई!"

मनीष को यह बात समझ में नहीं आ रही थी कि आखिर सरकारी नौकरी इतनी आसानी से कैसे मिल जाएगी? इसलिए उसने पूछा- "सर क्या इतनी जल्दी सरकारी नौकरी मिलना संभव है?"

विजय, "हाँ, यह संभव है। असल में ये संस्थाएँ कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी देती हैं। यदि कोई सीट खाली होती है, तो सही व्यक्ति का चुनाव कर नौकरी दे दी जाती है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। कहने के लिए ये संस्थाएँ स्वायत्त हैं, लेकिन ये मंत्रालय से जुड़ी होती हैं। इसलिए कोई दिक्कत नहीं है, आराम से उन्हें वहाँ भेजो, काम हो जाएगा!

हाँ, अब मंत्रालय का काम आपको मन लगा कर करना होगा। हम सभी लोगों के सामने मंत्री जी के सपनों को साकार करने की चुनौती है!"

मनीष, "जी ज़रूर।" और विजय को धन्यवाद देता है।

विजय, "मनीष तुम्हें मैंने बताया या नहीं। कल मैं मंत्रीजी के पास गया था। उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि हमें काम करना होगा, वह भी नए तरीके से! अब पहले वाली बात नहीं चलेगी। तुम तो काम करते ही हो! अब तुम्हें दूसरे लोगों का भी उत्साहवर्द्धन करना होगा! हमें ध्यान रखना है कि आज के समय में डरा-धमकाकर कर किसी से काम नहीं लिया जा सकता है। यह तरीका ठीक भी नहीं है। हमें मंत्रालय में अब ऐसे लोगों की टीम तैयार करनी है, जो समय पर काम करने में विश्वास रखते हैं। फाइल को देरी से निपटाने में उनका विश्वास नहीं होता है।"

"जी सर", मनीष बोला।

विजय, "हमें शहरी और ग्रामीण जीवन, दोनों की परेशानियों को समाप्त करना है। लोगों के दिमाग से भय खत्म हो। खुशहाली और अमन-चैन का माहौल तैयार हो, यही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

इस संदर्भ में योजनाओं, कार्यक्रम को विशेष रूप से कैसे तैयार किया जाए, इस पर अब हमें काम करना होगा। आप डेटा इंट्री और लेटर-डिस्पैच का काम मुख्य रूप से देखते हैं न? यह काम तो कोई और भी कर सकता है! आपके पास आइडियाज़ हैं, हम आपको ऐसी जगह पर रखेंगे, जहाँ आपकी योग्यता का भरपूर इस्तेमाल हो सके! आदमी को उसकी योग्यता के अनुरूप काम मिले, तो अच्छा रहता है।"

मनीष अपनी बढ़ाई सुनकर प्रसन्न हुआ। उसने कहा- "जी सर। आपने हमें जो सम्मान दिया है, इसके लिए हम शुक्रगुजार हैं। मैं हमेशा यह सोचता था कि जिसे जो भी काम मिलता है, उसे करने के साथ-साथ उसे अपनी सोच भी विकसित करनी चाहिए। मेरी इस धारणा को आज और मजबूती मिल गई है। सर मैं अब और अधिक मन से काम करूँगा!"

विजय, "ठीक है, चलिए फिर मिलते हैं।"


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