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ISSN 2292-9754

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10.06.2014


64.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

अरुण और वरुण विजय से मिलने के लिए ठीक 3 बजे निर्धारित समय पर पहुँच गये। जब वे लोग उसके केबिन में पहुँचे, तो विजय फाइलों को खंगाल रहा था। दोनों को सामने देखकर विजय ने टेबुल पर पड़ी फाइलों को एक किनारे कर दिया और सामने वाली कुर्सी पर बैठने के लिए कहा। टेबुल और कुर्सी सभी चकाचक था। स्टाइलिश और पूरा नीट ऐंड क्लीन। पुरानी फाइलें उसकी चमक को खराब कर रहे थे। अरुण ने इसे कई बार देखा था, लेकिन वरुण पहली बार यह देख रहा था। वह मन ही मन सबकी कीमत आँकने लगा। अगर पूरा केबिन और सामने पड़ी सोफे की कीमत लगाई जाए, तो इस पर 4-5 लाख रुपये आराम से खर्च हो गए होंगे। अरुण ने विजय से वरुण का परिचय कराया- यह वरुण हैं और पेशे से पत्रकार हैं।

विजय ने हाथ मिलाया और पूछा, "कैसी चल रही है पत्रकारिता?"

"ठीक है, बस काम कर रहा हूँ। अरुण ने आपके बारे में कई बार बताया था। इसलिए सोचा कि आपसे मिल ही लूं।" वरुण ने कहा।

"आपने अच्छा किया," विजय ने अरुण की ओर देखते हुए कहा।

अरुण ने कहा, "यह काफी विचारवान व्यक्ति है। इनकी इच्छा है कि पत्रकारिता में कुछ कीर्तिमान स्थापित करूं। मेरी इनसे कई विषयों पर चर्चा होती रहती है। मैंने इनको आपके पास इस खातिर लाया हूँ कि आप इन्हें कुछ बताएँ और समझाएँ। पत्रकारों की जमात कैसा व्यवहार करती है? किसी भी कॉन्फ्रेंस को कवर करने की बजाय खाने पर उनका अधिक ध्यान रहता है।"

विजय, "तुम खामख्वाह इन्हें डरा रहे हो। यह तो प्रोफेशन का पार्ट ऐंड पार्सल है। भूखे पेट भजन न होय गोपाला। क्या वरुण मैंने कुछ गलत बोला।"

वरुण अपने पेशे पर हंसी उड़ते देख बचाव की मुद्रा में आ गया और बोला,

"जी सर, मैं भी इनको यही बता रहा था। आपने केवल उनको खाना पर टूटते देखा। आपने यह नहीं देखा कि उन्हें रात-रात भर काम कर जल्दी खबर भेजनी होती है। इसलिए वे जल्दी भोजन कर लेना चाहते हैं। इस बात की आपको परवाह नहीं होती है।"

विजय, "बिल्कुल।"

वरुण विजय की बात पूरी हुए बिना बोल पड़ता है, "आज पत्रकारिता की वजह से ही समाज में जागरूकता पैदा हो रही है। जब तक जागरूकता पैदा नहीं होगी, लोग डेमोक्रेसी को मजबूत नहीं करेंगे। यहाँ घोटाला और भ्रष्टाचार चलता रहेगा।"

"हाँ आप ठीक कह रहे हैं, लेकिन अभी-अभी मेरे पास एक लड़का आया था, उसके पास भी बहुत अच्छे-अच्छे विचार हैं। वह देश, समाज के बारे में अच्छा सोचता है, लेकिन उसे नौकरी नहीं मिल रही है ऐसा क्यों?" विजय ने जानने की कोशिश की।

वरुण, "देखिए यह अलग बात है। कोई व्यक्ति देश और समाज के बारे में सोचता है, तो नौकरी पाने के लिए यह आधार नहीं बन सकता है। दरअसल, समय बदल चुका है। हमें शुरुआती दौर में उन लोगों की ज़रूरत है, जो आम लोगों को समझ सकें। जैसे मैं यूनिवर्सिटी कवर करता हूँ, वहाँ विचारों का क्या करना है? वहाँ तो वैसे लोग चाहिए, जो आजकल के लड़के-लड़कियों का ट्रेंड, उनके मनोभावों को जानते-समझते हैं। इसके लिए कार्ल मार्क्स, वेवर और उदारवाद-समाजवाद आदि से किसी को क्या मतलब?"

हालांकि वरुण यह बात बेमन से बोल रहा था, क्योंकि वह भी इसका हिमायती है लेकिन अभी उसे अपने पेशे का बचाव करना है, इसलिए बोल गया। वह अपनी जमात में इस पर कई बार चर्चा कर चुका है कि पत्रकारिता पहले मिशन, बाद में प्रोफेशन और अब तो संभवतः कमीशन बन गई है।

अरुण, "हाँ ये रोजगार पाने के लिए किसी खास स्किल की ज़रूरत के बारे में बात कर रहे हैं।"

विजय, "हाँ, ज़रूरत बदल चुकी है। समय के अनुसार सब कुछ बदलता है। पहले कॉलेज के स्टूडेन्ट्स किताबों, विचारकों पर चर्चा करते थे, लेकिन अब उनके बीच केवल टेक सेवी और टेक्नोलॉजी की ही बात होती है।"

अरुण, "हाँ, बिल्कुल सही कहा तुमने।"

वरुण, "ऐसा नहीं हैं। जब मैं खबर कवर करने जाता हूँ, तो कॉलेज, यूनिवर्सिटी कैंपस में भी सेमिनार, कॉन्फ्रेंस आयोजित होते देखता हूँ। बड़ी-बड़ी बातें होती रहती हैं। बात यह है कि यहाँ न्यूज का मतलब दूसरा है। अन्य क्षेत्रों में न्यूज का मतलब आदर्शवादी बातों से लगाया जाता है, जबकि यहाँ उल्टा होता है। लोग यदि कुछ अलग कर रहे हैं, तो उसे हम न्यूज बनाते हैं। दरअसल, पाठक भी ऐसी ही खबरों को अधिक चाव से पढ़ते हैं। वैसे कॉलेज-यूनिवर्सिटी में पढ़ाई तो होती ही रहती है।"

विजय, "हाँ, और प्रोफेसर लोगों का क्या हाल है?"

वरुण, "जो बच्चे पढ़ना चाहते हैं, प्रोफेसर उन्हें पढ़ाते हैं। बाकी अपने प्रोजेक्ट या फिर फॉरेन कंट्री कैसे जाया जाए, इसकी चिंता उन्हें लगी रहती है। हाँ, यह भी सच है कि अब पढ़ाने वाले प्रोफेसर्स की बहुत कमी हो गई है।"

विजय, "क्या मतलब?"

मतलब साफ है कि जो प्रोफेसर पढ़ाने वाले थे, उन्हें किसी न किसी एडवायजरी बोर्ड में शामिल कर लिया गया है। पूरा दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स खाली हो गया है। लोग बताते हैं कि प्रधानमंत्री वहाँ पढ़ा चुके हैं। इसलिए उनके दोस्त भी कहीं न कहीं फिट हो चुके हैं।"

वरुण, "अमरीका या लंदन का ज्ञान रखने वालों की बजाय अहमदाबाद और लखनऊ की जानकारी रखने वाले को एडवाइजरी बोर्ड में शामिल करने की ज़रूरत है। पिछले पचास सालों से, मैंने जब से होश संभाला है, तब से लोगों को प्रोफेसर यशपाल के पीछे पड़े हुए पाया है। देश की शिक्षा से संबंधित हर बात का निर्णय प्रोफेसर यशपाल की एडवायजरी कमेटी से पूछ कर लिया जाता है। दसवीं में परीक्षा होगी या नहीं, विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में प्रवेश की अनुमति दी जाए या नहीं, सभी का ज्ञान प्रो. यशपाल के पास है। क्या देश में केवल वही एक शिक्षाविद हैं? अरे यार आगे बढ़ो। अपनी देश की जनता क्या चाहती है उसे समझो और उन्हें भी मौका दो।"

विजय, "बहुत गुस्से में है, वरुण।"

अरुण, "गुस्से में नहीं है यह। इसके विचार ऐसे ही उग्र हैं। इसलिए इसे पत्रकारिता में भी सफलता नहीं मिल रही है। इसे कोई ऐसी नौकरी दिला दो या तो पत्रकारिता में या एनजीओ में जहाँ पैसा मिले। पैसा आने पर आदमी का मुंह बंद हो जाता है।"

विजय ने हंसकर टाल दिया और कहा, "नहीं देश को ऐसे विचारों की ज़रूरत है।"

अरुण, "हमें अपने देश में और आतंकवादी तैयार नहीं करना है। अगर पढ़े-लिखे लोगों को पैसा नहीं मिलेगा, उनकी योग्यता के अनुसार जॉब्स नहीं मिलेंगे, तो वे मजबूरन बंदूक उठाएँगे ही।"

विजय असमंजस में है। वह सोच रहा है कि क्या बोले-हर जगह समस्या है!

वरुण ने स्थिति को भांप लिया और बोला, "नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। हम तो केवल अपना विचार बता रहे थे। अगर विचार शून्य हो जाएँगे, तो देश का क्या होगा? जिन समस्याओं से हम घिरे हुए हैं, उससे बाहर तो निकलना ही होगा।"

विजय गंभीर होते हुए बोला, "आप सही बोल रहे हैं। अब स्थिति बेहद नाजुक हो चुकी है। हम सभी दोषी हैं। एक आदमी या एक वर्ग को दोष देना ठीक नहीं है। जनता कब तक चुपचाप सहती रहेगी।

कई जगह जनता भी उग्र रवैया अपना रही है। तोड़-फोड़ आम दिन की घटना हो गई है। कभी देश के इस कोने में-तो कभी उस कोने में विवाद होता रहता है। सवाल यह नहीं है कि इसे कैसे रोका जाए? सवाल यह है कि इन समस्याओं का निश्चित हल क्या हो? आखिर क्या वजह है कि जनता उग्र होने के लिए बाध्य हो जाती है? भारत का शांतिप्रिय समाज हिंसा पर क्यों उतारू हो जाता है? ऐसी स्थिति में आने वाली पीढ़ी के सामने भारत की कैसी तस्वीर उभर कर आएगी?

अरुण और वरुण दोनों शांत रहे। विजय भी कुछ देर चुप रहा। उसने कहा- "अब हम लोग यहीं पर बात खत्म करते हैं। कुछ न कुछ हल निकल कर ज़रूर आएगा। आखिर परिस्थितियाँ सदा एक समान नहीं रहती हैं।"

अरुण और वरुण उसकी बात से सहमत हुए और विजय से जाने की इजाजत मांगी।


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