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ISSN 2292-9754

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10.06.2014


63.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय ऑफिस में काम निपटाने में लगा हुआ है। वह किसी भी फाइल को पड़ा रहने नहीं देना चाहता है। दो दिन का वक्त है, आज शुक्रवार और कल शनिवार। रविवार को मंत्रीजी आ जाएँगे और उस दिन सब साफ हो जाएगा कि वे अपनी टीम में मुझे रखते हैं या कि नहीं।

दो दिन में उसे ना सिर्फ फाइल देखना है, बल्कि सभी लोगों से बातकर रिपोर्ट भी तैयार करनी है। इसलिए वक्त मिलने पर वह लोगों से बात करने की कोशिश भी कर रहा है। उसने अभी तुरंत अपने दोस्त अरुण से फोन पर बात की थी। उसे आज मिलने को भी कहा था, वह तीन बजे आएगा। वह सोच ही रहा था कि सामने देखा बिहार वाला लड़का राजीव और मनीष दोनों चले आ रहे हैं। मनीष राजीव को विजय के कमरे में दाखिल करा, खुद चला गया। विजय ने छूटते ही कहा, "अरे तुम, कहाँ चले गए थे? मैं तुम्हें ढूंढ रहा था! तुम तो गायब ही हो गए। न अपना पता बताया और न ही कोई कॉन्टैक्ट नम्बर छोड़ कर गए। ऐसे थोड़े ही होता है।"

राजीव, "नहीं सर, जब आप नहीं थे, तब मैं यहाँ आया था।" विजय की बातों को सुनकर उसे अच्छा लगा। पिछले दिनों मनीष ने भी इनकी काफी तारीफ की थी। हालांकि उनसे उसकी पहली मीटिंग का अनुभव बहुत ही बुरा था। उस दिन विजय ने जिस तरह ट्रीट किया था, वह उसे अच्छा नहीं लगा था। वह पटना से आया था, जहाँ मिलने आए लोगों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाता है। वह उस समाज से ताल्लुक रखता है, जो प्यार और आदर का भूखा होता है। आदर की कमी या लोगों की अवहेलना उसे मंजूर नहीं होता है। यहाँ उसके साथ जैसा व्यवहार हुआ था, वह उसे नागवार गुजरा, जबकि वह विजय के फादर इन लॉ की चिट्ठी भी लाया था।

विजय, "अच्छा ठीक है और बताओ, क्या हाल चाल है?"

हालांकि आज राजीव को विजय का व्यवहार पसंद आ रहा था, लेकिन आज वह कुछ मकसद के साथ आया था। एक, अगर वे कुछ काम की बात करते हैं, तब तो ठीक है। दूसरा, अगर वे आज भी पहले की तरह पेश आते हैं, तो उनको खरी-खरी सुना देगा। यह दोनों बातें उसके दिमाग में साथ-साथ चल रही थीं। उसने छूटते ही कहा, "क्या ठीक है? यहाँ अपने लोग काम ही नहीं आते हैं। हम लोग छोटे आदमी हैं, तो बड़े लोगों से उम्मीद तो करेंगे ही न? लेकिन बड़े लोग पता नहीं किस गुरूर में रहते हैं!"

विजय को आज राजीव से कुछ काम की बातें निकलवानी थीं! इसलिए उसने संयम बरतते हुए पूछा, "अच्छा यह बताओ कि तुम बिहार के लोगों के बारे में कुछ बात कर सकते हो! उस दिन तुमने काफी अच्छी बातें बताईं थीं।"

राजीव सोचने लगा, अरे उस दिन तो ये मेरी बातों को सुन भी नहीं रहे थे! मैं बोलता जा रहा था और वे अपने काम में मशगूल थे, लेकिन इन्हें तो मेरी बात याद है। वह सच्चाई पता लगाने के लिए पूछता है -

"क्या मैं बिहार के बारे में कुछ बोल रहा था? सर, मुझे कुछ भी याद नहीं है!"

विजय को अब तक महसूस हो चुका था कि उस दिन का उसका व्यवहार राजीव को खराब लगा था। इसलिए उसे खुश करने की चेष्टा करते हुए बोला,

"तुम उस दिन बिहार में रिंग रेलवे बनाने की बात कर रहे थे। दूसरी कई नई योजनाओं के बारे में भी बता रहे थे।"

राजीव खुश हो गया। उसके चेहरे पर प्रसन्नता देखकर विजय बोला, "अच्छा तुमने जर्नलिज्म एवं मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री हासिल की है? तुम्हारी समझ भी काफी अच्छी मालूम देती है।
क्या तुम्हारे लिए यह ज़रूरी है कि केवल मीडिया में ही काम किया जाए?"

राजीव, "नहीं सर, यह ज़रूरी नहीं है। आप अपने विभाग में कहीं पीआरओ के रूप में क्यों नहीं लगवा देते हैं? सरकारी नौकरी हो जाएगी।"

विजय ने सोचा था कि अभी इसे नौकरी का सपना दिखाकर अपने काम की बात करूँ, लेकिन वह इस लड़के की बातों से चारों ओर से घिर गया। उसे कुछ बोलते नहीं बन रहा है। अंत में उसने कहा, "हाँ, ऐसा संभव है। तुम्हारे लिए काम का मौका तलाशता हूँ। तुम अपनी एक सीवी मुझे क्यों नहीं दे देते हो?"

"हाँ, सर लीजिए," उसने अपने बैग से सीवी निकाली और हाथ में थमा दिया।

विजय उसे हाथ में लेकर सोचता है...स्थितियाँ बदल रही हैं। लोगों में जब बदलाव आना शुरू हो गया है, तो सरकार को भी फास्ट डिलीवरी मेकनिज्म तैयार करनी चाहिए। यह सोचते हुए कहा, "अपने कुछ नए विचार मुझे बताओ।"

राजीव, "सर मैं, दिल्ली में देख रहा हूँ कि यहाँ लोग टेक्नोलॉजी के गुलाम होते जा रहे हैं। मैंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया है। इससे मेरा रहन-सहन का खर्च निकल आता है। जब मैं बच्चों को हिसाब बनाने देता हूँ, तो वे बोलते हैं कि मोबाइल से कलकुलेट कर आपको बताता हूँ। बच्चे हमेशा गाना सुनने, वीडियो गेम्स खेलने और दोस्तों से बातचीत करने के लिए मोबाइल पर लगे रहते हैं।"
"तो क्या हुआ?"

"सर आप कहते हैं कि क्या हुआ, पूछिये क्या नहीं हुआ? अगर आपके पास मोबाइल न हो तो, आप क्या करेंगे? आप पहले मोबाइल लाने को कहेंगे, तब कलकुलेशन करेंगे। बच्चों की दिलचस्पी कम्प्यूटर आदि में अधिक है, वे बेसिक शिक्षा लेना नहीं चाहते हैं।"

विजय को इन बातों में अधिक दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन उसे खुशी हो रही थी कि कल तक हवा में बात करने वाला, आज ट्यूशन पढ़ाने लगा है और शिक्षा में कमी व उसके स्वरूप आदि के बारे में बात कर रहा है।

"हाँ, आ बताओ। क्या यहाँ की शिक्षा और बिहार की शिक्षा में तुम्हें कुछ अंतर दिखाई देता है?"

राजीव, "अंतर तो बहुत है, यहाँ के छात्र अंग्रेजी में बहुत ही आगे हैं, जिससे उन्हें नौकरी पाने में कोई दिक्कत नहीं होती है। हम लोगों के यहाँ साइंस पर जोर दिया जाता है। इंजीनियर, डॉक्टर बन गया तो ठीक है, वरना उसे बहुत पापड़ बेलना पड़ता है। अब हमें देखिए, क्या कुछ नहीं करना पड़ रहा है!

यदि हम ग्लोबलाइजेशन की बात करें, तो इसने स्थिति और खराब कर दी। प्राइवेट में जॉब जान-पहचान वालों को ही मिलती है। अगर हम कहें कि यहाँ भी सिफारिश का बोलबाला है, तो गलत नहीं होगा। अब मीडिया में देखिए, मैं पिछले तीन साल से देख रहा हूँ, किसी प्रकार की रिक्तियाँ नहीं आई हैं। सुनने में आता है कि कई चैनल खुल रहे हैं, लेकिन पता नहीं चलता है कि उसमें भर्ती कैसे होती है?"

विजय यह सब सुन रहा है। उसकी बात में हाँ में हाँ भी मिला रहा है। साथ ही इस निष्कर्ष पर भी पहुँच रहा है कि हमें छोटी-छोटी चीजों पर अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है। हम बड़े-बड़े मिशन, पायलट प्रॉजेक्ट के बारे में सोच लेते हैं, लेकिन मूलभूत ज़रूरतों, जिससे आम लोग जूझ रहे हैं, उनके बारे में सोच ही नहीं पाते हैं। वह राजीव से पूछता है-

"क्या मीडिया में वेकेन्सीज नहीं निकलती है?"

"नहीं सर, कभी नहीं। यहाँ तो केवल बड़े लोग अपने बच्चों को या जो इसमें काम कर रहे हैं, अपने दोस्त-यार या परिवार वालों को जगह देते हैं। हाँ, और ये सभी आलेख, जिसे आप रोज अखबार में पढ़ते हैं, वे सभी उन बड़े-बड़े लोगों का लिखा हुआ है, जिन्होंने पूरे सिस्टम को गंदा कर दिया है। वे लोग ही लिख रहे हैं और उन्हीं की राय पर युवा पीढ़ी को चलने के लिए कहा जाता है। पूरी व्यवस्था में सड़ांध आ गई है। कहीं भी नई विचारों की खुशबू नहीं आती है।"

विजय, "वाकई, हम ब्रॉडकास्ट बिल, कास्टिंग काउच, मीडिया पॉलिसी की बात करते हैं, लेकिन यह नहीं सोचते हैं कि किस प्रकार के लोगों को इससे जुड़ना चाहिए! उनके चयन, उद्देश्य आदि में पूरी निष्पक्षता बरतनी चाहिए।"

राजीव, "जी सर, आपने ठीक कहा, अखबार में भी कुछेक लोगों का आधिपत्य है। भाई-भतीजावाद, परिवारवाद, अधिनायकवाद केवल राजनीति में ही नहीं, बल्कि यह सभी जगह है।"

विजय, "हाँ, आप ठीक कह रहे हैं। चलो फिर मिलते हैं, मिलते रहना। हम मिलजुलकर कुछ करते हैं।"


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