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ISSN 2292-9754

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10.06.2014


62.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

दस बजे तक मंत्री कार्यालय में सभी कर्मचारी आ चुके थे। पिछले कुछ दिनों से देर से आने वाले कर्मचारी भी आज समय पर आ गए। उन लोगों को मालूम था कि आज विजय ऑफिस आ जाएँगे। विजय आज 9 बजे ही ऑफिस आ गया था। ऐसा लगता है वह अपने केबिन में कम्प्यूटर पर कोई गंभीर काम करने में मशगूल है! कुछ लोग शीशे से अंदर झांकने की कोशिश कर रहे हैं। बीच-बीच में चपरासी चाय-पानी पूछकर उसकी ध्यान भंग कर रहा था। बाकी सभी कर्मचारी अपनी-अपनी सीट पर बैठकर काम निपटाने में लग गए।

मनीष भी आ चुका था। वह इंतजार कर रहा था कि विजय सर उसे बुलाएँ, तो वह उनसे मिलने जाए। साढ़े दस बजे तक जब उनकी तरफ से कोई बुलावा नहीं आया, तो वह खुद उनसे मिलने के लिए सोचने लगा।

दो बार शीशे से उसने झांककर देखा, तो विजय अपनी अंगुली मुंह पर रखे हुए था। वह आँखें बंद कर कुछ सोचने में मशगूल था। जाऊँ या ना जाऊँ, इसी उधेड़बुन में वह शीशे से झांक रहा था कि विजय की नजर उस पर पड़ गई। उसने इशारे से उसे अंदर बुलाया। मनीष ने अंदर आते ही नमस्कार किया और पूछा, "सर, आपकी शिरडी की यात्र कैसी रही?"

विजय सामने की कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए बोले, "मेरी यात्रा बहुत अच्छी रही।"

अटेन्डेंट को बुलाने के लिए उसने बज़र बजा दिया।

विजय, "हाँ, तुम बताओ क्या हाल-चाल है? ऑफिस, घर-परिवार में सब कुछ ठीक है?"

मनीष, "हाँ ठीक है, ऑफिस में भी सब कुछ ठीक है।"

इतने में अटेन्डेंट आ जाता है। विजय उसे प्रसाद निकाल कर देता है और उसे ऑफिस में बाँटने के लिए कहता है। उसे मनीष को भी प्रसाद देने के लिए कहता है।

विजय, "मनीष! क्या तुमने देश के विकास के बारे में कुछ और सोचा है?"

मनीष, "जी सर, मेरे अनुसार तो....हाँ पहले मैं आपको बता दूं कि देश का विकास आम आदमी को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए। हम छोटे लोगों की ज़रूरतों को भी ध्यान में रखना चाहिए। जब तक हम सभी लोगों के बारे में नहीं सोचेंगे, तब तक समाज में असमानता बरकरार रहेगी।
"छोटे लोगों की समस्याएँ भी छोटी होती हैं। उसे पूरा करना कोई बड़ी बात नहीं है। उनकी ज़रूरतों से ज्यादा तो यूं ही खर्च कर दिया जाता है।"

विजय, "मतलब, समस्याएँ भी छोटी होती हैं, का क्या मतलब है?"

मनीष, "सर, सामान्य लोगों को आमतौर पर तीन तरह के खर्चे होते हैं। घर खर्च, बच्चों की पढ़ाई का खर्च, और बीमारी का खर्च। घर खर्च इतना अधिक नहीं होता है। लोग अपनी जेब के हिसाब से घटा-बढ़ा लेता है, खाना तो रोटी ही है। हम लोग रोटी-नमक खाकर भी रह सकते हैं। लेकिन बच्चों की पढ़ाई और बीमारी पर बहुत अधिक खर्च करना पड़ता है। दिल्ली में हालत और खराब है। बच्चों को स्कूल में दाखिला के लिए डोनेशन देना पड़ता है। हर महीने स्कूल फीस और उनकी अन्य फरमाइशें, बस की फीस आदि लोगों की कमर तोड़ देती है। महंगाई के दौर में सामान्य आदमी असक्षम है। समझ में नहीं आता है कि क्या किया जाए? चिंता तब होती है जब बच्चों पर इतना अधिक खर्च करने के बावजूद पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें नौकरी मिल पाएगी या नहीं, यह असंभावना बरकरार रहती है। क्या सरकार इसके लिए कुछ नहीं कर सकती?"

विजय, "हाँ, इस पर सोचना होगा।"

मनीष, "सर, एक आइडिया है क्यों न संस्था से शिक्षा पूरी होने के बाद नौकरी देना अनिवार्य कर दिया जाय। जिस तरह इंश्योरेंस कंपनियाँ लोगों से रिटायरमेंट प्लान के लिए पैसा जमा करवाती हैं और एक समय बाद यानी 60-65 साल बाद हर महीने पैसा देती हैं। उसी प्रकार हम लोग अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए अपनी कमाई का एक हिस्सा उन पर खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं। सर, हम भारतीय हैं। बुढ़ापे में अपने बच्चों को बेरोजगार देखना हम लोगों के लिए कष्टप्रद होता है। भारतीय पिता खुद नौकरी में रहते हुए बच्चों को नौकरी शुरू करते देखना चाहता है। ग्रामीण भारत में आप देखेंगे कि बुजुर्ग लोग अपने कष्ट से ज्यादा पुत्रों के पास काम नहीं होने से दुखी हैं।"

विजय, "हाँ, भारत के सामाजिक ढांचे को समझ कर ही आगे कुछ योजना बनानी चाहिए।"

मनीष, "जी सर, मैं भी ऐसा ही कहना चाह रहा हूँ। क्यों न ऐसी व्यवस्था हो, जिसमें सभी लोगों को रोजगार मिले। यदि सभी हाथ में काम होगा, तो दूसरी समस्याएँ खुद-ब-खुद हल होती चली जाएँगी।

दूसरी समस्या स्वास्थ्य की होती है, सर! स्वास्थ्य बीमा शुरू की गई है, लेकिन इसके दायरे में बहुत कम लोग ही आ पाए हैं। चरणबद्ध तरीके से इसमें ग्रामीण जनसंख्या को जोड़ने की ज़रूरत है। गाँव की कहावत है-बीमारी और फौजदारी से घर नाश होवे।"

विजय, "हाँ, यह ठीक है।"

मनीष, "जी सर। आप इस दिशा में कुछ करिए। आप जैसे लोगों पर ही देश को दिशा देने की जिम्मेदारी है। आपकी तरह ही अगर सभी लोग काम करने लगें, तो निश्चित तौर पर हमारे देश की हालात में सुधार आ जाएगा।"

विजय ने अपने अंदाज में हाँ कहकर आश्वासन दिया। हम ज़रूर करेंगे।

मनीष, "सर! आज वह बिहार वाला लड़का राजीव, जिसे आप ढूंढ रहे थे, 3 बजे आएगा।"

यह कहकर वह विजय को नमस्कार करता हुआ केबिन से बाहर चल दिया।


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