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ISSN 2292-9754

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10.06.2014


61.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय आज सुबह 9 बजे ही ऑफिस पहुँच गया, ताकि वह जल्दी-जल्दी सभी बचे हुये कार्यों का निपटारा कर सके। ऑफिस पहुँचते ही उसने सबसे पहले अपना ई-मेल चेक करना शुरू किया। तभी उसकी नजर विकास द्वारा भेजी गई ई-मेल पर पड़ी। उसे ओपन किया, तो देखा सबसे ऊपर लिखा है फोर डी। नीचे लिखा है-

1. डी.......डिविजन इन सोसायटी
2. डी.......डिलीवर इन टाइम
3 डी........डेवलपमेन्ट टू द डोर
4. डी .....डिस्ट्रक्शन ऑफ नशनल प्रॉपर्टी बी स्टॉप्ड
1. डी - टेक्स प्लेस टू स्टॉप डिविजन इन सोसायटी इन एनी फॉर्म फार द डेवलॅपमेंट ऑफ द कंट्री
2. डी - टेक्स प्लेस टू डिलीवर इन टाइम, दिस इज द डिमांड ऑफ द ट्वेन्टी
फर्स्ट सेन्चुरी
3. डी - टेक्स प्लेस टू टेक डेवलपमेन्ट टू द डोर। इट इज द फॉरमेस्ट नीड ऑफ द कंट्री। पीपल वाँट टू सी देयर डेवलपमेंट; नॉट टू द पॉलिटिशियन या हाई ऑफिशियल
4. डी - यानी नॉट डिस्ट्रक्शन ऑफ द नेशनल प्रॉपर्टी।

क्या देश के विकास की फिलॉसफी यहाँ छुपी हुई है। विजय इस पर सोच-विचार करने लगा।

‘डिवीजन इन सोसायटी’

हाँ, यह सभी जगह मौजूद है। यह आज से नहीं, बल्कि प्राचीन काल से विद्यमान है, इसे कैसे रोका जा सकता है। क्या यह हमारे देश के विकास पर असर डालता है? जब उसने दिमाग पर जोर दिया, तो सारी बातें स्पष्ट हो गईं। सचमुच में आजकल समाज में डिवीजन बढ़ गया है। पहले तो सिर्फ धर्म और जाति के नाम पर, अब शहरी-ग्रामीण, शिक्षित-अशिक्षित, पुरुष-महिलाएँ, क्षेत्रीय-प्रादेशिक, स्वस्थ-अस्वस्थ, सामर्थ-असमर्थ वगैरह कई तरह के डिवीजन समाज में बन चुके हैं। अगर देश हित में कोई पॉलिसी लाई जाती है, तो यह कह कर उसकी आलोचना की जाती है कि इसमें महिलाओं के लिए किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं की गई है। विकलांगों, दबे-कुचलों को कोई स्थान नहीं दिया गया है। अगर कुछ समझ में न आए, तो यह कह कर खारिज किया जाता है कि इस पॉलिसी या प्रोग्राम के बनाने में होलिस्टिक एप्रोच नहीं लिया गया है। राजनीतिज्ञ इसे अपने फायदे के लिए कभी धर्म केन्द्रित, जाति केन्द्रित, तो कभी लिंग आधारित मुद्दा बना लेते हैं। वे चुनाव के दौरान इन मुद्दों को विवादित बनाकर जनता को भड़काने में इस्तेमाल करते हैं। क्या वाकई इसकी ज़रूरत है? क्या किसी प्रोग्राम पॉलिसी को चुनावी मुद्दा बनाकर डिवीजन को प्रमोट करना उचित है? यदि ऐसा है, तो उस पर तुरंत रोक लगानी चाहिए। हमारे देश में जाति प्रथा और धार्मिक उन्माद को भड़कने से रोकने की कोशिश तो कई वर्षों से की जा रही है। लेकिन नतीजों पर गौर करें, तो पाएँगे कि इसका दंश समाज में कैंसर की तरह फैलता ही जा रहा है। इसे दूर करना ही होगा, अन्यथा यह समाज को गर्त की ओर ले जाएगा। आखिर इसका निदान कैसे किया जाए। जब से मैंने होश संभाला है, लोग इसे दूर करने की बात करते आ रहे हैं, लेकिन मेरा निजी अनुभव कहता है कि इसका स्वरूप और आकार बढ़ता ही जा रहा है। आखिर क्यों? शायद इसका उत्तर समाजशास्त्रिायों के पास हो। वे निश्चित तौर पर इन पहलुओं पर अनुसंधान कर रहे होंगे! इसमें कोई शक नहीं है। समाज की संरचना एकसमान नहीं होती है। इसमें विभिन्नता है इसलिए मतांतर स्वाभाविक है। हाँ, वर्तमान समय में अच्छी बात यह है कि ऐसे लोग जो गलत हैं, समाज उसे गलत मानने लगा है। एक समय था, जब लोग गलत को गलत मानते ही नहीं थे।

धर्म और राजनीति में विभेद पर समूचे यूरोप में सौ वर्षों तक युद्ध चला था। भारत में भी इस मुद्दे पर विभेद है। यह प्रक्रिया चलती रहेगी। धर्म के आधार पर हमारी भावनाओं को उकसाना आसान है, क्योंकि इससे हम भावनात्मक तौर पर जुड़े होते हैं। इसलिए राजनीतिज्ञों के लिए यह आसान हो जाता है कि वे धर्म के नाम पर हमें उकसावें। जहाँ तक जाति का सवाल है, तो यह भी हमारी भावनाओं से जुड़ा है। जाति को लेकर कई तरह की भ्रांतियाँ समाज में फैलाई जाती हैं। अज्ञानतावश हम उसकी चपेट में आ जाते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि जाति प्रथा की व्यवस्था समाज की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए की गई थी। प्राचीन समय में अलग-अलग जगहों से लोगों का आगमन भारत में हुआ। ऐसी स्थिति में उन्हें समाज में सही जगह देना एक समस्या थी। इसलिए जाति प्रथा की व्यवस्था की गई। भारत में दास प्रथा विद्यमान नहीं थी। यह पश्चिम से यहाँ आई थी। समाज में शांति व समन्वय के लिए बनाई गई जाति और धर्म की व्यवस्था आज अपने सबसे विकृत रूप में है। आज यही व्यवस्था फूट डालो और राज करो, यानी डिवाइड ऐंड रूल के रूप में समाज में फल-फूल रही है। इसके खतरनाक रूप को देखने के बावजूद हम इसे और बढ़ाते गए।

शहरी और ग्रामीण खाई भी बढ़ती जा रही है। रूरल डिस्ट्रेस, अर्बन डिस्ट्रेस कहकर समाजशास्त्री हमें सचेत भी करते आए हैं। वास्तव में यदि हम इक्कीसवीं शताब्दी में इसे रोक नहीं पाए, तो परिणाम बहुत बुरा होगा।


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