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ISSN 2292-9754

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09.19.2014


60.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मनीष को आज ऑफिस से घर पहुँचने में थोड़ी देर हो रही है। राधा शाम का नाश्ता तैयार कर चुकी है। अब वह चूल्हे पर चाय के लिए पानी गर्म कर रही है। वह बार-बार दरवाजे की ओर जाकर फिर लौट रही है। वह सोच रही है कि हर दिन इस समय तक वे आ जाते थे। पता नहीं आज देर क्यों हो रही है। करीब 7.30 बज चुके हैं। उसकी चिंता घबराहट में बदलती जा रही है। आये दिन रोड एक्सीडेंट की खबरें टीवी पर आती रहती हैं। मन में कई तरह की चिंताएँ उभर रही हैं। आज पहली बार उसे फोन की ज़रूरत महसूस हो रही है।

दरअसल, दो व्यक्ति के बीच प्रेम या लगाव तभी होता है जब वे एकसाथ रहना शुरू करते हैं। पहले दोनों कहने के लिए साथ-साथ रहते थे। इधर कुछ दिनों से वे एक-दूसरे से अपने विचारों, भावनाओं, संवेदनाओं को बाँटने लगे हैं। लिहाजा, भावनात्मक लगाव बढ़ना लाजिमी है। कुछ दिन पहले तक मनीष ऑफिस से 10-11 बजे तक लौटते था, फिर भी राधा के मन में किसी प्रकार की चिंता या घबराहट नहीं होती थी।

राधा और मनीष दोनों एक ही मोबाइल से काम चलाते हैं। मनीष मोबाइल घर पर छोड़ जाता है और जब उसे मौका मिलता है, तो आफिस से कॉल कर लेता है। वह रोज फोन नहीं कर पाता है, जैसा कि अधिकारी या अन्य लोग ऑफिस पहुँचते ही घर फोन मिलाने लगते हैं कि हाँ मैं ऑफिस पहुँच गया हूँ, आप कैसे हो?

मनीष को कभी-कभी इन बातों को सुनकर आश्चर्य भी होता है कि आखिर आजकल आदमी इतना अधिक फोन पर क्यों आश्रित हो गया है। इसे वह दिखावा मानता है। वह कभी-कभार जब राधा की तबीयत ठीक नहीं रहती या कोई बहुत आवश्यक काम आ जाता, तो एक-दो बार घर पर फोन कर लेता है। यहाँ तो आदमी हर एक-दो घंटे बाद फोन पर लग जाते हैं हाल-चाल जानने के लिए।

मनीष कम्प्यूटर खरीदने से पहले थोड़ी जांच-पड़ताल कर लेना चाहता है। वह घर के आसपास वाली दुकान में ही कम्प्यूटर के बारे में पता लगा रहा है। वह सोच रहा है कि अगर पास की दुकान में सही कीमत पर कम्प्यूटर मिल जाए, तो वह यहीं से ले लेगा, ताकि कुछ तकनीकी खराबी आने पर उसे ठीक करवाने में अधिक परेशानी न उठानी पड़े। दरअसल, खरीदारी से पहले वह नई तकनीक, जैसे-कोर 2 ड्यो, रैम, हार्ड डिस्क, कीमत आदि के बारे में भी पूरी जानकारी इकठ्ठा कर लेना लेना चाहता है। मनीष अब तक चार-पाँच दुकान में जा चुका है। वह निर्णय नहीं ले पा रहा है, क्योंकि यहाँ की दुकानों में उसकी कीमत 1000 के आसपास अधिक पड़ रही है। वह यह सोचने में असक्षम है कि नेहरू प्लेस जाने और आने में भी पैसा लगेगा। वहाँ जाने-आने में पहले भी पैसा खर्च चुका है। वह सोचता है कि कम्प्यूटर की खरीदारी रविवार को करनी है। इसलिए शेष माथापच्ची उसी दिन होगी और घर की ओर चल पड़ता है। आज दिन-भर वह कम्प्यूटर खरीदने पर ही सोचता-विचारता और शोध करता रहा, इस फेर में वह राधा को फोन भी नहीं कर पाया। घड़ी की सुई 8.10 पर पहुँच चुकी है। राधा की घबराहट चरम पर है। वह कभी दरवाजा खोलती है, तो कभी बंद करती है। ऐसा वह करीब दस बार कर चुकी है। एक बार फिर उसने दरवाजा खोला, तो सामने मनीष को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने उसे तुरंत आलिंगन में बाँध लिया। उसने तनिक भी परवाह नहीं की कि मनीष अभी गेट के बाहर ही है।

मनीष संभलते हुए अंदर आ गया और पूछा, "क्यों आज बड़ी खुश लग रही हो-क्या बात है?"

"नहीं नहीं, कुछ नहीं", राधा बोली।

मैं थोड़ा घबरा गई थी। हर रोज तुम अधिक से अधिक सात बजे तक घर आ जाते थे, लेकिन आज बहुत देर हो गई। भगवान न करे! बोलकर लकड़ी छूती है और कहती है, "तुम्हें फोन तो करना चाहिए था। मुझे आशंका हो रही थी कि कहीं एक्सीडेंट तो नहीं हो गया!"

मनीष चुपचाप उसे देखता जा रहा है। राधा का दिल जोर-जोर से धड़क रहा है। आगे वह क्या-क्या बोलती जा रही है, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा है।

राधा जब थोड़ी संयत हुई, तो मनीष ने कहा, "मैं यहाँ के आसपास की दुकान में कम्प्यूटर देखने चला गया था, लेकिन यहाँ 1000 रुपया अधिक लग रहा है। लाभ यह है कि अगर खराब हो जाए, तो ठीक कराने में आसानी होगी।"

राधा, "ठीक है, तब यहीं से ले लेंगे, क्योंकि उसमें कुछ खराबी आने पर ठीक करवाने में अधिक झंझट नहीं होगी।"

मनीष, "हाँ, ठीक कह रही हो। नेहरू प्लेस जाने में भी पैसा खर्च होगा, इसलिए यहीं से ले लेंगे। हम भारतीयों में यही आदत खराब है कि एक शर्ट लेनी हो, कम्प्यूटर लेना हो या कोई और सामान सभी में रिसर्च वर्क करने लग जाते हैं, लेकिन जिस काम में रिसर्च की ज़रूरत पड़ती है, तो नहीं करते हैं। आज के बच्चों को देखो। उन्हें सभी ब्रांड के बारे में विस्तार से मालूम है, लेकिन उन्हें किताब कौन-सी पढ़नी है, वह उन्हें नहीं मालूम है।"

राधा, "अब यह बताओ कम्प्यूटर कब खरीदोगे?"

मनीष, "रविवार को खरीद लेंगे।"

राधा, "हाँ इस बार ज़रूर खरीद लेंगे।" वह सोच रही है कि मोबाइल खरीदने के बारे में भी बोलूं, लेकिन नहीं बोल पाई। उसने सोचा कि जब कम्प्यूटर खरीदने जाएँगे, तब चर्चा करूँगी। मोबाइल तो नौकरी करने के बाद भी खरीदा जा सकता है!

राधा को चुप देखकर मनीष ने पूछा, "क्या सोच रही हो?"

राधा, "कुछ नहीं।"

मनीष ने जिद की, तो बोली, "यदि हम मोबाइल खरीद लें, तो कैसा रहेगा? आज तुम्हारे देर से घर आने पर मैं काफी घबरा गई थी। यदि फोन होगा, तो परेशान नहीं होना पड़ेगा।"

मनीष उस समय राधा का दिल नहीं तोड़ना चाहता था। इसलिए बोला, "हाँ ठीक है। हम ले लेंगे। चलो अब समाचार सुनते हैं। वह समाचार देखने लगा और राधा खाना पकाने चली गई।"


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