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ISSN 2292-9754

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09.19.2014


59.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

पिछले दिनों अरुण ने यह कहकर अपनी बात खत्म की थी कि खुद आगे बढ़ो और पैसे कमाओ। पिछले दो दिन से वरुण इस पर विचार मंथन में लगा हुआ है। आखिर किस राह मैं जाऊँ। नेताओं की व्यवस्था को ठीक करने में लग जाऊँ या घर-गृहस्थी के लिए पैसे जुटाऊँ। यह निर्णय करना उसे कठिन लग रहा है। इसी असमंजस के साथ वह अरुण के घर की ओर चल पड़ा। उम्मीद के अनुसार अरुण घर पर ही मिल गया। उसने एक हाथ से कम्प्यूटर के माउस को पकड़ रखा था, और दूसरे हाथ पर सिर को टिकाए हुआ था। मानो पूरी दुनिया का बोझ उसके सिर पर आ गया हो! उसने अपना एक पैर कुर्सी पर ही मोड़कर रखा हुआ था। वरुण के आते ही उसने अपना पैर नीचे किया, हाथ में कलम ली और एक दार्शनिक की मुद्रा में वरुण से मुखातिब हुआ।

गंभीर मुद्रा में बोला, "यस पत्रकार वरुण! क्या हालचाल है? मैं समझता हूँ आपकी कलम एक दिन रंग लाएगी।"

यह कहकर अरुण एक तीर से दो निशाना साध लेना चाहता है। एक, वह वरुण पर उस दिन कही गई बात का असर देख लेना चाहता है, तो दूसरा, अपने विजयी होने का अहसास भी उसे दिला देना चाहता था।

वरुण भी उसकी बात का आशय समझ गया, लेकिन आज वह बहस करने के मूड में नहीं है। वह व्यावहारिक बातों को जानने के लिए उत्सुक है। उसने एक कुर्सी खिसकाई और बैठते हुए कहा, "कलम रंग लाएगी या नहीं, मैं यह नहीं जानता, लेकिन मेरा भला अब आप ही करेंगे।"

अरुण प्रसन्न हुआ और कहा, "देखो भाई, मैं तुम्हारी जमात को अच्छी तरह जानता हूँ।" उसने जानबूझकर ऐसा कहा, ताकि वरुण के दिमाग पर असर पड़े। मैं पत्रकारिता के हर पहलू से वाकिफ हूँ। ’इसलिए मैं तुम्हे सचेत कर रहा रहा हूँ, ना कि हतोत्साहित।

मैं तुम्हें बता दूं कि ये तीसमार खान पत्रकारों को आप चैनल पर दमखम के साथ नेताओं से बहस करते हुए देखते हैं, वे सभी मंत्रियों के आगे-पीछे करते रहते हैं। ऑफिस में अपनी बहादुरी का बखान करते हैं, जबकि नेताओं को चापलूसी का मक्खन लगाते हैं। इनकी जात बहुत खराब है। ये कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं।"

वरुण चुप-चाप बातों को सुन रहा है। बीच-बीच में सिर हिलाकर दिखा रहा है कि हाँ मैं तुम्हारी बातों से सहमत हूँ।

अरुण, "वरुण तुम खुद इतने दिनों में समझ गए होगे कि उनकी हेकड़ी में कितना दम होता है। किसी दिन तुम हमारे साथ चलना, फिर तुम इनके चरित्र पर गौर करना। एक बोतल काफी है न्यूज चलवाने के लिए।"

अरुण पिछले कई वर्षों से न्यूज पेपर्स और चैनलों के दफ्तर जाता रहा है। मीडिया हाउस के नजरों में वह एक काम करने वाला सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में स्थापित हो चुका है।

वह जानता है कि इन जगहों पर किस प्रकार काम होता है।

वरुण भी अरुण की बातों से पूरी तरह सहमत हो चुका है। उसे लग रहा है कि अरुण उसके मन की बात कह रहा है।

वरुण ने पूछा, "तुम्हें यह सब कैसे मालूम हुआ।"

अरुण, "जब तुम मेरे साथ नेताओं, सांसदों और मंत्रियों के यहाँ जाओगे, तब तुम्हें भी पत्रकारों का असली चेहरा दिख जाएगा।"

वरुण, "यह बात सौ प्रतिशत सही नहीं है। हाँ इस पेशे में कुछ लोग ऐसे ज़रूर हैं, जो पूरी मीडिया जगत को बदनाम कर रहे हैं।"

अरुण, "अरे ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं। जहाँ तक खबरों के लिए प्रतिस्पर्धा की बात है, तो उन्हें कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा ही। वरना उन्हें कौन पूछेगा। तुम्हें विश्वास नहीं होता है न! कल मैं अपने दोस्त विजय के पास जा रहा हूँ, वह मंत्री का एडिशनल प्राइवेट सेक्रेटरी है। वहाँ चलना फिर संवाददाताओं के काम करने की शैली को तुम जान पाओगे।"

वरुण, "ठीक है, चलूँगा। अब तुम बताओ तुम्हारा क्षेत्र कैसा है़? क्या एनजीओ में काम करना ठीक रहेगा।"

अरुण, "देखो भाई, हम तो साफ बोलते हैं, पहले ठीक था, लेकिन अब इस क्षेत्र में भी माहौल बढ़िया नहीं रहा।"

"क्या मतलब, पहले ठीक था, लेकिन अब नहीं।"

"कहने का मतलब है कि पहले इसमें पैसा था। दुनिया भर के लोग, संगठन आदि समाजसेवा के नाम पर इसमें पैसा देते थे, लेकिन आजकल पैसे की आमद बहुत कम हो गई है।"

"ऐसा क्यों?"

अरुण, "इसके दो कारण हो सकते हैं-एक, पहले विकसित देश समझते थे कि हम गरीब देश हैं इसलिए वे हमारी सहायता करते थे लेकिन अब उसमें कमी आई है। वे सोचते हैं कि हमारे पास बहुत पैसा है, तभी हम अरबों-खरबों का घोटाला करते हैं। अब बड़े-बड़े एनजीओ जैसे-नेशनल एनजीओ, मदर एनजीओ आदि आदि के पास ही पैसा नहीं आता है, तो छोटी संस्थाओं को कौन पैसा देगा! दूसरा, सरकार भी नहीं चाहती है। आपको याद होगा कि सुनामी प्रलय के समय हमारे देश ने पैसे लेने से इंकार कर दिया। यह कहते हुए कि हम इससे निपटने में सक्षम हैं। इसकी दुनिया भर में भारत की अच्छी छवि बन गई। परंतु एनजीओ पर इसका काफी बुरा असर पड़ा। ऐसे देश जो भारत को पैसा देते थे, वे अन्य गरीब देशों को पैसा देने लगे।"

वरुण, "अच्छा, यह बात है।"

अरुण, "हाँ, सभी जगह एक जैसी स्थिति है। सबकुछ पहले जैसा ही है। जिसकी लाठी उसकी भैंस। तुम उस दिन हमारे यहाँ काम कर रहे लड़के के बारे में बोल रहे थे कि उसकी तनख्वाह क्यों नहीं बढ़ा देते हो। तुम दूसरी जगह जाकर देखो। वहाँ तो और भी स्थिति खराब है। छोटा एनजीओ होने के बावजूद मैं चार हज़ार रुपये देता हूँ। बड़े-बड़े एनजीओ में कर्मचारियों को इतना भी पैसा नहीं मिलता है। कहीं-कहीं तो मुफ्त में खटाया जाता है। उनसे कहा जाता है कि यह सामाजिक संस्था है, आप योगदान करें।"

वरुण, "क्यों कोई विरोध नहीं करता है?"

अरुण, "आखिर कोई विरोध क्यों करेगा? जो मिल रहा है, उसे लेकर ही लोग खुश हैं। तुम दुनिया को पहचानते नहीं हो, इसलिए ऐसी बातें कह रहे हो।"

वरुण, "सभी जगह एक जैसी स्थिति है। मैं तो समझता था कि पत्रकारिता में ही संघर्ष है।"

अरुण, "सभी क्षेत्र में संघर्ष करना पड़ता है। कोई कहीं पिस रहा है, तो कोई कहीं, सभी समय चक्र में अपने-आप को खपा रहे हैं।"

वरुण, "मैं खपना नहीं चाहता हूँ, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना मेरा उद्देश्य है।"
अरुण, "गुड लक, ऐसा ही हो।"


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