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ISSN 2292-9754

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09.19.2014


58.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मनीष के साथ लड़कियों के बारे में बात नहीं करनी है। आज सुबह माफी मांगने के बाद संजीव ने इस बात को गाँठ बाँध लिया। उसने मनीष के साथ चाय पी थी और वापस चला आया। संजीव इस सोच में है कि अगली बार उससे मिलने पर क्या बात करेगा? उसकी तो दार्शनिकों जैसी सोच है! वह गाँव और शहर के लोगों की हित के बारे में बात करता है। मेरी इन सभी बातों में दिलचस्पी न के बराबर है। मुझे कुछ करना होगा!

आज लंच ब्रेक में फिर वह मनीष के पास गया और बोला, "चलो खाना खाते हैं।" शुरू में ना-नुकुर करने के बाद मनीष उसके साथ चला गया।

चलते हुए संजीव ने पूछा, "खाने में आप क्या पसंद करते हैं? आज हम आपकी पसंद का ही खाना खाएँगे।" उसके पास पैसे की कमी नहीं थी। पहले भी वह गर्लफ्रेण्ड के साथ खर्च किया करता था।

मनीष, "ना! हम कुछ नहीं लेंगे। मैं तो अपना खाना लेकर आया हूँ। आपको जो अच्छा लगे, वह ले लो।"

संजीव, "आज आपको कुछ ऑर्डर देना ही होगा, ताकि हम दोनों मिलकर खा सकें।"

मनीष, "आप पनीर की सब्जी ले लें। अच्छा शाही पनीर और दाल मखानी ले लेते हैं।"

संजीव, "ठीक है।"

दोनों ने भोजन करना शुरू किया।

संजीव, "बिहार के लोगों को यह खाना काफी पसंद है। हमारे एक बिहारी दोस्त थे, वे भी अक्सर यही खाते थे- शाही पनीर, दाल मखानी। क्या बिहार में यह खूब प्रचलित है?"

मनीष, "नहीं, यह दिल्ली और पंजाब का भोजन है। वहाँ के लोगो ने अब इसे खाना शुरू किया है। जो लोग यहाँ काम करने या पढ़ाई करने के लिए आए, उन्होंने इसका स्वाद चखा और वहाँ भी इसे प्रचलित कर दिया। अन्यथा यह बिहार का खाना नहीं है।"

संजीव, "अच्छा, दिल्ली से ही शाही पनीर और दाल मखानी बिहार गया।"

मनीष, "बिहार का लिट्टी-चोखा और खीर बहुत प्रसिद्ध है। दोपहर के भोजन में दाल-भात, दो-तीन तरह की सब्जी और खट्टी-मीठी चटनी वहाँ के लोग खूब चाव से खाते हैं।"

संजीव इन्हीं सब बातों को जारी रखना चाहता है, लेकिन मनीष बात को दूसरी ओर ले जाना चाहता है।

मनीष, "हाँ, सभी जगह का अलग-अलग खानपान और वेशभूषा होती है। जैसा कि मैं सुबह आपको बता रहा था कि गाँव के स्कूलों की कायाकल्प करने की ज़रूरत है।"

संजीव, "गाँव और शहर में बहुत अंतर है।"

मनीष, "हाँ, गाँव और शहर में काफी बड़ा गैप है। सरकार गाँवों को अनदेखी करती है। इस वजह से दोनों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। अगर सरकार सही दिशा में काम करती, तो आज जो गाँवों के हालात हैं, वह नहीं होता। आजादी के 62 वर्ष बाद भी हर गाँव में स्कूल, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, सड़क, बिजली, स्वच्छ पानी तक की सुविधा नहीं हैं। वहीं शहरों में देखें, तो एक-एक मुहल्ला में कई स्कूल मिल जाएँगे।"

संजीव, "आप गलत सोच रहे हैं। दिल्ली में हर मुहल्ले में स्कूल है, फिर भी बच्चों को दाखिला दिलाने में गार्जियन को बहुत परेशानी उठानी पड़ती है। अच्छे स्कूलों में नामांकन के लिए तो 2 से 5 लाख रुपये तक डोनेशन देना पड़ता है।"

मनीष, "अच्छा, इसके लिए सरकार ने तो कुछ कड़े कदम उठाए थे।"

संजीव, "सरकारी कदम दिखावा के लिए अधिक होते हैं। हाल ही में हमारे मामा के लड़के को स्कूल में दाखिला दिलवाना था, उसमें 3 लाख रुपये डोनेशन देना पड़ा, जबकि वह साधारण स्कूल है। बड़े-स्कूल तो दुकान की तरह हैं। आपकी जेब में पैसे हैं, तो ठीक, नहीं ंतो अपना रास्ता नापिये।"

मनीष, "यह तो बहुत गलत बात है।"

संजीव, "देखिए, सीधा हिसाब है, मांग अधिक है, सप्लाई कम। अच्छे स्कूलों में दाखिले के लिए हजारों आवेदन आते हैं, लेकिन इसमें कुछ बच्चे ही सफल हो पाते हैं। जितनी सीटें उपलब्ध हैं, उतना ही एडमिशन होगा न! हालात तो आप देख ही रहे हैं। हजारों की तादाद में बाहर से लोग यहाँ आ रहे हैं। आखिर उनके बच्चे भी तो पढ़ाई करेंगे ही!"

मनीष, "इसलिए मैं बोलता हूँ कि सरकार गाँवों के विकास पर जोर दे। वहाँ शहरों वाली सभी सुविधाएँ और रोजगार के अवसर सृजित कर दे। क्यों ऐसा करना संभव नहीं है। अरे याद आया, एक प्रोफेसर साहेब अपने ऑफिस में आए थे, वे भी यही कह रहे थे। उनका कहना था कि सिंधु सभ्यता के बाद अब तक कोई भी नगर-आधारित सभ्यता पिछले 3000 वर्षों में विकसित ही नहीं हो पाई है। इसलिए गाँव आधारित विकास-योजना पर सरकार को काम करना चाहिए।"

संजीव, "हाँ यह ठीक होगा। हम सड़कों पर लगने वाले जाम से भी बच जाएँगे।"

दरअसल संजीव एक सामान्य आदमी है। वह केवल अपनी समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में स्थितियों को देख रहा है। अपनी समस्याओं को कम करने के अलावा, उसकी कोई रुचि नहीं है।

मनीष, "जैसा कि आपने कहा शहरों में स्कूलों में दाखिला लेने और उसके बाद पढ़ाई करने में काफी पैसे खर्च होते हैं।"

संजीव, "हाँ, यह तो है। यहाँ पढ़ाई काफी महंगी है। चाहे वह स्कूल की पढ़ाई हो या उच्च शिक्षा पाना। बच्चों के बारे में तो मैंने आपको बताया। एडमिशन लेने से लेकर पढ़ाने तक काफी मशक्कत करनी पड़ती है। हर महीने कम से कम पाँच हज़ार रुपये खर्च हो जाते हैं।"

आश्चर्यचकित होते हुए मनीष ने पूछा, "क्या सचमुच ऐसा है?"

संजीव ने आगे बढ़ते हुए कहा, "जी, ऐसा ही है। उच्च शिक्षा तो इतनी महंगी है कि पूछो मत! देखिए सरकारी कॉलेजों में नामांकन पाने में ही काफी परेशानी उठानी पड़ती है। मैनेजमेंट की पढ़ाई या किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा में बिहारी या उत्तर प्रदेश के विद्यार्थी बाजी मार लेते हैं। दिल्ली वालों के लिए सिर्फ प्राइवेट कॉलेज ही बचते हैं, जहाँ की फीस काफी अधिक होती है। मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट वाले 1.5-2 लाख रुपये लेते हैं। आप स्थिति को समझ सकते हैं!"

मनीष, "क्या प्राइवेट में पढ़ाई अच्छी होती है?"

संजीव, "अरे पढ़ाई की बात कौन सोचता है? देखिए, जो बच्चे इतना अधिक पैसे देकर पढ़ रहे हैं, तो उन्हें पढ़ने की क्या ज़रूरत है? उनके बाप-दादा का अपना व्यवसाय है। पढ़ाई करने के बाद काम तो उन्हें वहीं करना है! बड़ी-बड़ी कंपनियाँ आईआईएम से पास आउट स्टूडेंट्स को नौकरी देने में प्रश्रय देती हैं। हाँ कुछेक लोग हैं, जो प्राइवेट संस्थानों से पढ़ने के बाद किसी कंपनी में नौकरी पा लेते हैं।"

"ऐसा है क्या? मनीष ने पूछा। "तो फिर वे लोग इतना अधिक पैसा खर्च कर पढ़ाई क्यों करते हैं?"

"अरे भाई वह तो उनकी मजबूरी है। पढ़ाई तो करनी ही पड़ेगी। कुछ को कहीं डिग्री दिखानी है, तो कुछ की उसी बहाने अच्छे घर में शादी हो जाएगी! इससे ज्यादा उन्हें और क्या चाहिए?"

मनीष, "बड़ी अजीब-बात है।"

संजीव, "इसे आप ने भी नोटिस किया होगा। दिल्ली में लड़कियाँ उच्च शिक्षा अधिक प्राप्त करती हैं। लड़के 10वीं पास करने के बाद से ही किसी नौकरी की तलाश में जुट जाते हैं या पिता के व्यवसाय की गद्दी संभालने लगते हैं। बिजनेस उनके खून में होता है। यह तो हम जैसे छोटे लोग नौकरी करते हैं। मेरे पिताजी भी सरकारी नौकरी किया करते थे। मैंने भी सरकारी नौकरी करना चाहा, क्योंकि मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। हाँ पार्ट टाइम में प्रॉपर्टी डीलिंग का काम कर लेता हूँ उससे मेरा खर्च चल जाता है।"

मनीष, "अच्छा, आप प्रापर्टी डीलिंग भी करते हैं?"

"हाँ, इसमें बुराई क्या है? अगर नहीं करूँ, तो खाना भी पूरा नहीं हो पाएगा। घर में ही आगे बालकनी में ऑफिस बना दिया हूँ। सुबह-शाम उसमें बैठ जाता हूँ। मकान की तलाश में जो बच्चे आते हैं, उन्हें मकान दिला देता हूँ।"

मनीष, "आप बच्चों को मकान कैसे दिलाते हैं?"

संजीव, "हाँ, जो बच्चे पढ़ने आते हैं, उन्हें रहने के लिए ठिकाना चाहिए ना! उनसे एक महीना या आधे महीने का कमीशन लेता हूँ और उन्हें कमरा दिलाता हूँ।"

मनीष, "अच्छा, अब मैं समझा। दिल्ली में हर लोग कुछ न कुछ तिकड़म कर कमा रहा है। यहाँ लोगों के धनी होने का यही राज है।"

संजीव, "धनी कौन है यहाँ सब गरीब हैं।"

मनीष, "सभी लोगों के पास गाड़ी है। अच्छा पहनना-खाना है उनका। और कौन लोग धनी होते हैं?"

संजीव, "जो बाहर से दिखता है, वह यथार्थ नहीं होता है। आप सड़कों पर इतनी अधिक गाड़ियाँ या सभी लोगों के पास घर देखते हैं, तो ज्यादातर लोग बैंक से लोन लेकर अपनी इच्छाएँ पूरी करते है। गंजी-बनियान छोड़कर यहाँ सभी चीज लोन पर खरीद ली जाती है। यहाँ के लोग उपभोक्तावाद का बड़ा अच्छा उदाहरण पेश करते हैं।"

मनीष, "यानी कर्ज लेकर घी पीयो।"

संजीव, "हाँ, सही कह रहे हो।

मनीष, "अब बात मेरी समझ में आई।"


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