अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
09.19.2014


57.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

राजनीति ऐसी चीज है कि एक बार यदि कोई इसमें प्रवेश कर गया, तो इससे बाहर निकलना काफी मुश्किल काम है। ऐसा केवल उन लोगों के लिए ही नहीं है, जो राजनीति में सक्रिय रूप से हैं, बल्कि उनके लिए भी है, जो इसमें दिलचस्पी रखते हैं। अरुण को पहले से ही राजनीति में रुचि थी। वरुण भी अब काफी उत्साह और मनोयोग से इस पर चर्चा करता है। दोनों में आजकल इधर-उधर की बातें कम होती हैं। यदि हुईं भी, तो मात्र औपचारिकता भर। अधिकांश समय वे राजनीति पर ही चर्चा करते रहते हैं। हालात इस हद तक पहुँच चुके हैं कि वे दोनों इसका इंतजार करते रहते हैं।

वरुण ने पिछले दिन पत्रकारिता में आई गिरावट की चर्चा करने को लेकर बात खत्म की थी, लेकिन आज न तो उस पर चर्चा हुई और ना ही जिक्र हुआ। वरुण के मन में कई बार यह बात आई, लेकिन वह गर्मागर्म बहस में खलल पैदा नहीं करना चाहता था। आज बात नेताओं के स्वभाव से शुरू हुई।

वरुण ने आते ही सवाल किया, "क्या नेताओं के पास तमीज नहीं होती है?"

अरुण, "क्या मतलब? आज तुम इतने गुस्से में क्यों हो?"

वरुण, "मैंने तीन बार एक नेता से फोन पर बात करने की कोशिश की, लेकिन बात करना तो दूर, मैं व्यस्त हूँ, कहकर फोन काट दिया। क्या यही तरीका है अपनी व्यस्तता के बारे में बताने का! यदि आपने फोन कॉल रिसीव किया है, तो कुछ पूछना चाहिए या अगर उस वक्त व्यस्त थे, तो बाद में उन्हें फोन करना चाहिए था।"

ण, "व्यस्त होगा! इसमें गुस्सा होने की वजह तो नहीं दिखती है। वह तुम्हें फोन क्यों करेगा, तुम्हारा काम है, तुम करो।"

वरुण, "वाह अरुण जी, आप भी खूब गिरगिट जैसा रंग बदलते हैं। क्या हमें या आपको कोई व्यस्तता के क्षण में जब फोन करता है, तो क्या फुर्सत मिलने पर फोन नहीं कर लेते हैं? करते हैं कि नहीं, बोलिए।"

अरुण कुछ देर तक सोचता रहा। फिर बोला, "हाँ करते हैं। दरअसल, हम सोचते हैं कि कहीं किसी ज़रूरत के लिए कोई फोन कर रहा होगा या कोई हमारे भले के लिए कर रहा होगा।"

वरुण, "हम पूछ रहे हैं करते हैं न, ज़रूरत चाहे किसी की भी हो! हाँ, एक बात आप क्यों भूल जाते हैं, हमें तो अपना पैसे खर्च करना पड़ता है। उन्हें तो दूसरों के पैसे पर खेलना होता है। आप खुद जानते हैं सरकार उन्हें फोन करने का भी पैसा देती है। क्या कहना है तुम्हारा?"

अरुण, "ज़रूर देती है, फोन का ही क्यों, बिजली, पानी सभी चीजों का। इसका मतलब वे सभी लोगों को कॉल करते रहें।"

वरुण, "मैं सब को नहीं बोल रहा हूँ। मैं केवल यह कह रहा हूँ कि कम से कम कुछ लोगों का तो ध्यान रखें। यह गलत है। हमलोगों के पैसे का बेजा इस्तेमाल किया जाता है। अगर सरकार कुछ करना ही चाहती है, तो इसे रोके। लगभग 1000 से भी ज्यादा लोकसभा और राज्यसभा के एमपी को जो यह सुविधा मिलती है, यह बंद होनी चाहिए।"

अरुण, "क्यों बंद होनी चाहिए? सुविधाएँ ही हैं, जिससे लोगों का राजनीति के प्रति आकर्षण होता है, वरना क्या ज़रूरत है? आप आम आदमी हैं, ब्यूरोक्रेट हैं, अभिनेता हैं, क्रिकेट खिलाड़ी हैं, कोई भी हों इस तरह की सुविधा नहीं मिलती है। लिहाजा सभी इसमें डुबकी लगाना चाहते हैं। भले ही आप कहें राजनीति गंदी है, लेकिन यहाँ आने के लिए सभी तैयार रहते हैं। कब्र में पाँव लटका होने के बावजूद कुर्सी से चिपके रहना चाहते हैं। इसे क्या कहेंगे? सभी बहती गंगा में एक बार डुबकी लगाना चाहते हैं।"

"तुम ठीक कह रहे हो। लेकिन मैं इस दिशा को बदलना चाहता हूँ।"

"सो कैसे?"

वरुण, "कैसे क्या? यह बहुत ही आसान है। अब हम पुराने जमाने की बात सोचेंगे, तो कैसे काम चलेगा? हमें आज के समय के हिसाब से सोचना होगा। अब हम सुविधाएँ एमपी को नहीं देंगे। जनता को देंगे। उदाहरण के लिए आप फोन को ही लें। इसकी सुविधा हम आज तक नेताओं को देते आए हैं। वे अपने रिश्तेदारों के फायदे या अपना व्यवसाय चमकाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। मैं इसे रोकना चाहता हूँ और यह बेहद आसान है।

आप हर चुनाव क्षेत्र में एक टॉल फ्री नंबर दे दें। चुनाव क्षेत्र का कोई भी आदमी जब उस नंबर से सांसद के घर फोन करे, तो उसे कुछ भी पैसा चुकाना नहीं पड़े। गरीब आदमी बार-बार फोन करता है और बताया जाता है कि सांसद जी मीटिंग में हैं या व्यस्त हैं। पैसा खर्च होने के बावजूद जनता का काम नहीं हो पाता है। हमें जनता को सशक्त बनाना होगा। उन्हें संवाद बनाने में पैसा न लगे, ऐसा करना होगा।"

अरुण, "हाँ, यह तो ठीक है।"

वरुण, "अभी और कई बातें हैं। कई साकारात्मक बातें निकल आएँगी, अगर हम केवल अपने अप्रोच को बदल दें। परिस्थितियों को न समझ पाना ही हमारी समस्या की जड़ है। पहले सांसद सामान्य लोग हुआ करते थे। देश की अन्य आबादी की तरह उन्हें खाने व पहनने भर पैसा होता था। अब देखो, ज्यादातर सांसद मालामाल हैं। सांसद बनते ही पता नहीं कैसे धन की देवी उस पर खुश हो जाती हैं! अपने साथ-साथ अपने रिश्तेदारों को भी मालामाल कर देते हैं। सभी की अंगुलियाँ घी में ही नजर आती हैं। पता नहीं चार छह महीने में कौन सा करिश्मा हो जाता है?

अरुण, "समझने की कोशिश करो। तुम हमेशा दूसरों को समझाने में लगे रहते हो। अपने-आप को बदल, नहीं तो दुनिया तुम्हें बदल देगी।"

वरुण, "मैं तुमसे सहमत नहीं हूँ। मुझे अपना आदर्श निर्धारित करना होगा। मैं सोच रहा था-जनता के काम में दस परसेंट खाने वालों को कैसे रोका जाए? मैं जनता में 10 काम सांसद के नाम से पर्चा बटवाउंगा। न्यूजपेपर में इश्तिहार दूंगा। इस प्रकार हम लोगों को जाग्रत करेंगे।"

अरुण, "ठीक है। पहले हमें बताओ कि वे 10 काम कौन-कौन हैं?"

तो फिर सुनो....

1. संसदीय क्षेत्र आधारित टॉल फ्री नंबर दिया जाए।

2. सांसद निधि से हर क्षेत्र में हर साल एक 20 बेड का हॉस्पीटल खेाला जाए।

3. सांसद निधि से हर क्षेत्र में एक वोकेशनल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खेाला जाए।

4. सांसद निधि से हर क्षेत्र में गरीबों के लिए पाँच स्वास्थ्य वैन और पाँच

शैक्षिक वैन चलाया जाए।

5. सांसद अपने भत्ते में से कम से कम दस गंभीर रूप से बीमार लोगों को देश के अच्

 अस्पताल मे इलाज कराने की व्यवस्था कराये।

6. सांसद अपने क्षेत्र के सौ बेरोजगार नौजवानों को स्टाइपेंड देकर एक साल तक रखे और

उसे स्वरोजगार स्थापित करने में मदद करे।

7. क्षेत्र के विकास के लिए इलाके केे वुद्विजीवियों की गोष्ठी बुलाये।

8. प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित करे।

9. नई टेक्नालाजी के इस्तेमाल से कैसे इलाके की बेहतरी की जा सकती है इसके लिए

जागरूकता अभियान चलाये।

10. अपने क्षेत्र की समस्याओं को बेबाकी से संसद में उठाये ओर उसे दूर करने के लिए

विभिन्न ऋण देने वाली सरकारी संस्थाओं के साथ समन्वय कर धन इकट्ठा करे।

अरुण, "आजकल बहुत अच्छी-अच्छी बातें कर रहे हो, मैं तो इसे फालतू बकवास मानता हूँ। क्या हाल हुआ शिव खेड़ा का? वे भी इसी तरह अच्छी-अच्छी बातें करते थे। उनकी लिखी किताब ‘यू कैन विन’ खूब बिकीं। नतीजा क्या हुआ? चुनाव में जमानत भी जब्त हो गई।"

वरुण को यह बात चुभ गई। उसे तो यह बात ध्यान में ही नहीं आई थीं। वरुण चुप ही था कि अरुण बोल पड़ा- "केवल फालतू की बकवास करते हो तुम। तुम्हारी किसी बात में भी दम नहीं है। दिमाग का घोड़ा पैसा बनाने में लगाओ। क्या पत्रकारिता में आपको सफलता मिल गई?"

अरुण यह सब इसलिए बोलता जा रहा था ताकि वरुण में पैसे के प्रति रुचि पैदा की जाए! पिछले दिनों उसके यहाँ काम करने वाले रिसर्चर का पैसा बढ़ाने की बात कह कर उसने उसके कमजोर नस पर हाथ रख दिया था।

वरुण ने अरुण की बात पर आश्चर्य व्यक्त किया। बोला- "तब तो आदमी को कुछ सोचना ही नहीं चाहिए।"

अरुण, "सोचना क्यों नहीं चाहिए? अपने बारे में सोचो। वरना इसी तरह रह जाओगे। 50 गज के मकान में रहते हो, कल 20 गज में रहना पड़ेगा। देखो बड़ा-बड़ा एडिटर कैसे मस्ती मार रहा है? जिनको तुम आदर्श मानते हो!"

अरुण "शौरी, चंदन मित्र सब पद व पैसा के लिए कोहराम मचाये हुए हैं।"

वरुण, "बस करो, हमें इन सबों से कुछ नहीं लेना-देना।"

अरुण, "हम भी तो यही कह रहे हैं। इन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दो। जानते हो मैं भी पहले ऐसा ही सोचता था। चार साल तक सुबह-शाम को खाने के लाले पड़े रहते थे। अब देखो सात लाख रुपये में 50 गज का मकान वजीराबाद में खरीदा हूँ। वहीं नीचे एनजीओ का दफ्तर बनाऊँगा और ऊपर रहने का। इस नेहरू बिहार को बाय-बाय। नरक है यहाँ रहना, पंद्रह साल हो गए।"

वरुण, "फिर ठीक है, हमें भी अब एनजीओ में ही नौकरी दिलाओ। पत्रकारिता में कुछ भी नहीं रखा है। क्या करूँ? मैंने सोचा था कि अच्छी नौकरी मिल जाएगी, लेकिन चार साल बाद भी लगता है सब एडिटर ही रह जाऊँगा, क्योंकि मेरी पहुँच ऊपर तक नहीं है। जिन लोगों की बॉस से जान-पहचान है, उनके पास पैसा और पद दोनों है।"

अरुण, "ठीक है छोड़ो, इन बातों को। अब मन बना लो, पैसा कमाना है और कुछ भी नहीं करना है। बस अब मैं जा रहा हूँ। अगली बार बात करूँगा।"

वरुण, "ठीक है।"

वरुण ऊहापोह में है। ऑफिस में उसे अब अनुवाद के साथ-साथ एजेंसी कॉपी से समाचार भी बनाना पड़ता है। करीब तीन साल से वह मुख्य रूप से अनुवाद का ही काम करता था और कभी-कभार फीचर स्टोरी के लिए यूनिवर्सिटी जाता था। हालांकि उसका मन इन सभी चीजों में नहीं लगता था। वह रिपोर्टर बनना चाहता था। न्यूज रूम में रिपोर्टरों की बड़ी-बड़ी बातें सुनकर उसे भी वैसा ही करने की इच्छा होती थी।

कभी उसे न्यूज रूम में सुनाई देता कि मैंने तो जावड़ेकर की ऐसी की तैसी कर दी, तो कभी मैं तो मनीष तिबरिया को बोलने ही नहीं दिया। कभी-कभार बहस शोर-शराबे का रूप धारण कर लेता। डेस्क के लोग चुपचाप रिपोर्टरों की बात सुनते रहते और अपना काम करते रहते। यह एक दिन का नहीं, बल्कि हर दिन का यही हाल था। न्यूज एडिटर भी एक सेनापति की तरह रिपोर्टर रूपी सिपाहियों की बातें खूब चटकारे लेकर सुनते। वे मन-ही मन हर एक के प्रति अपनी राय बनाते।

 हाँ, कभी-कभार इन सिपाहियों को डेस्क वाले यह कहकर उनका मजा किरकिरा कर देते कि अरे जावड़ेकर की बजाय जेटली या मनीष की बजाय राहुल को बोलकर दिखाओ तो जानें।

जब इतने पर भी माहौल में शांति नहीं आती, तो एकाध बार यह भी सुनने को मिलता- चल यार बहुत हुआ! गाड़ी में पेट्रोल डलवाने का पैसा नहीं है और बड़का नेताओं को ठीक करने चले हैं!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें