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ISSN 2292-9754

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09.19.2014


56.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

शाम के पाँच बज चुके हैं। पत्नी वीणा चाय बना रही है। विजय घर के आगे बरामदे में लगे बेंत के सोफे पर बैठा हुआ है। शिरडी से वापस लौटने के बाद वह थकान अनुभव कर रहा था। इसलिए आज वह ऑफिस नहीं गया था। वह घर पर रहकर आराम कर रहा है।

विजय का घर दिल्ली के पॉश इलाके ग्रीन पार्क में है। वह चुपचाप बैठकर घर और उसके सामने का नजारा देख रहा है। उसे अच्छी तरह याद है कि आज से चार साल पहले वह जब इस घर को खरीदने आया था, तो इसी तरह मुआयना किया था। आज यह दूसरी बार है। इसकी वजह यह थी कि इस बीच उसे कभी वक्त ही नहीं मिला। वह नौ से पाँच ऑफिस में रहता था। इसके बाद यदि उसे वक्त मिलता, तो फाइव स्टार होटलों या शहर के बड़े-बड़े क्लबों में जाता। आज संयोगवश वह घर में है। उसे सुकून के साथ बैठकर घर के सामने का दृश्य देखना अच्छा लग रहा है। सड़क पर चहलकदमी अच्छी लग रही है।

पेड़-पौधों को देखना तो उसे बचपन से भाता था। अचानक उसकी नजरें सामने बैठी एक बुढ़िया पर पड़ी, जो भुट्टा बेच रही थी। एक आदमी उसके पास आया और पूछा कितना दाम है?

बुढ़िया बोली- पाँच रुपये।

आदमी ने उससे दो भुट्टा खरीदा और लेकर चला गया।

कुछ देर बाद फिर एक आदमी आया और भुट्टा खरीदकर चला गया। विजय को अपने गाँव की याद आने लगी। उसकी मां लकड़ी के चूल्हे पर भुट्टा पकाती और घर भर के लोग बड़े चाव से भुट्टा खाते जाते! उसे आज भी याद है, उसके बापू भुट्टा खाने के बाद पानी पीने से हमेशा मना करते। कहते थे कि इससे सर्दी-जुकाम हो जाएगी।

विजय को भुट्टा खाना बहुत पसंद था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वह उसका स्वाद भी नहीं ले पाया था। 17 वर्ष की उम्र में ही उसने गाँव छोड़ दिया था। उसके बाद उसने कभी भुट्टा खाया हो, लेकिन याद नहीं है।

अक्सर आदमी को भय, दुख या अतिहर्षोल्लास में पुरानी बातें याद आती हैं। विजय को फिलहाल इन सभी स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। उसके दिमाग में अचानक कई तरह के भाव आने लगे। फक्कड़ स्वभाव का होने के बावजूद उसे दिल्ली छोड़ना मुश्किल हो गया। एकाध बार उसके मन में नौकरी छोड़ कर अपना व्यवसाय करने का विचार आया, लेकिन यह बात उसने किसी से नहीं बताई।

वह ग्रामीण जीवन से बिल्कुल अनभिज्ञ हो गया था। जिस गाँव में उसने शुरुआती सत्रह वर्ष गुजारे, उसे छोड़ने के बाद वहाँ मुश्किल से सत्रह दिन ही बिताए होंगे।

वह कभी अपने गाँव को संवारने का सपना देखा करता था। अब उसकी स्मृति विलुप्त नहीं, तो क्षीण ज़रूर हो गई थी। वह गाँव में बिताए कई खुशनुमा पलों को याद कर रहा है कि तभी वीणा चाय लेकर चली आती है।

वीणा, "चाय लो, क्या तुम्हें बिस्किट भी चाहिए?"

विजय, "नहीं, आओ यहाँ बैठो। कुछ काम की बातें करते हैं।" वीणा बैठ जाती है और दोनों आपस में बातचीत शुरू कर देते हैं। विजय, "जानती हो, वीणा। जब मैं छोटा था, तब गाँव की भलाई के बारे में बहुत सोचता था! मुझे अपने गाँव से बहुत लगाव था। जब मैं पहली बार पढ़ाई के लिए शहर जाने लगा, तो बहुत बुरा लगा था। मैं सोचता था कि पढ़ाई के बाद वापस गाँव में आकर बस जाउंगा।"

वीणा, "हाँ, ज्यादातर लोग अपना घर छोड़ना नहीं चाहते हैं। क्योंकि वहाँ की हर चीज से उनका लगाव होता है।"

विजय, "हाँ, यही बात है। मैं उन दिनों कभी नहीं सोचता था कि कभी शहर में बस जाउंगा! हाँ, गाँव से याद आया। अच्छा तुम मुझे यह बताओ कि यह नामकरण गाँव-शहर, गली-मुहल्ला आदि कैसे पुकारा जाने लगा? क्या समाज शास्त्र में इसकी पढ़ाई होती है?"

वीणा, "मुझे नहीं मालूम कैसे पड़ा? किसी ने रख दिया होगा! अब तुम्हारा नाम विजय क्यों पड़ा? मेरा नाम वीणा क्यों है? इसके पीछे कोई लॉजिक नहीं है।"

विजय को लगा कि उसने गलत प्रश्न पूछ दिया। हालांकि वह इस वजह से जानना चाहता था कि नामकरण के पीछे भी कोई न कोई तर्क होगा! पहले लोगों का नाम भगवान के नाम पर रखा जाता था। गाँव में गली होती है और शहर में मुहल्ला होता है। शायद इसलिए कि शहरों में महलों की संख्या अधिक है और महल के साथ लगने वाला स्थान मुहल्ला हो गया होगा! लेकिन उसने इस बात को जाहिर नहीं होने दिया। उसने बात की दिशा मोड़ते हुए कहा-अरे हमारे जे एन यू आर एम में मुहल्ला सभा बनाने की बात कही गई है।

वीणा, "हाँ, यह ठीक है। यह भी ग्राम-सभा की तरह काम करेगा।"

विजय, "बात तो ठीक है। लेकिन यह बताओ कि क्या प्राचीन भारत में मुहल्ला सभा का कहीं जिक्र है?"

वीणा, "नहीं ऐसा तो नहीं है। हाँ नगर सभा का जिक्र कहीं-कहीं मिलता है, लेकिन मुहल्ला सभा शायद नहीं है।"

विजय, "शहरों में सुधार के लिए प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त करने में यह अहम साबित होगा।"

वीणा, "यह हम नहीं कह सकते, क्योंकि जब तक इन सभाओं को शक्ति नहीं दी जाएगी, तब तक इनकी सफलता को आँका नहीं जा सकता है।"

हमारे यहाँ ग्राम सभा प्राचीन काल से है। यह सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में काफी भरोसेमंद साबित होता था। और ध्यान से देखें, तो यह मजबूत संस्था उन्नीसवीं सदी के मध्य तक थी। अंग्रेजों ने इसे कमजोर कर दिया, क्योंकि यह उनकी सफलता के लिए आवश्यक था। अब फिर से इन संस्थाओं को जागृत करने का काम करना होगा। मध्य प्रदेश में 2002 में ग्राम सभा को यह अधिकार दिया गया कि काम नहीं करने वाले अधिकारियों का वेतन ग्राम सभा के लोग रोक सकते हैं। इसका परिणाम काफी साकारात्मक रहा।"

विजय, "तुम यह सब कैसे जानती हो?"

वीणा, "ग्राम सभा की कार्रवाइयों के बाद जो शिक्षक वर्षों से अनियमित रूप से स्कूल जाते थे, उन्होंने स्कूल जाना शुरू कर दिया, यानी लोगों का प्रत्यक्ष शासन। सरकार इस व्यवस्था में केवल एक मघ्यस्थ की भूमिका निभाएगी। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि लोगों की प्रशासन पर हर चीज के लिए जो निर्भरता थी, वह खत्म हो गई।

मुहल्ला सभा के पीछे भी यही भावना हो सकती है कि शहरों में लोगों को प्रशासन के साथ सीधे तौर पर जोडना। रेसिडेंस वेलफेयर ऑरगनाइजेशन यानी आरडब्लूए से दिल्ली में काफी लाभ मिला। शायद इसका स्त्रोत यही है। अगर इस संस्था को मजबूत बनाया जाए, तो शहरों के विकास में भी नया आयाम जुड़ेगा।"

विजय, "हाँ, अबतक हम लोग आम लोगों की राय जाने बिना विकास का काम उन पर थोपते रहते हैं। क्षे़त्र के विकास के लिए पैसा लगाया भी जाता है, लेकिन फिर भी लोग खुश नहीं रहते हैं, चाहे कोई भी सरकार क्यों न हो! वीणा, "इसकी वजह यह है कि हम विकास की योजना बनाते समय उन्हें भागीदार नहीं बनाते हैं, जबकि उनकी अपेक्षाएँ बहुत कम होती हैं। अगर उनसे पूछा जाए, तो मैं समझता हूँ कि पर्याप्त विकास भी होगा और लोग खुश भी होंगे। करीब 1200 करोड़ रुपए हर जिला के विकास के लिए भेजा जाता है। हर साल राज्यों को पैसा मिलता है, फिर भी विकास न के बराबर होता है। यहाँ तक कि पैसा केंद्र सरकार के पास वापस आ जाता है।"

विजय, "यह बिल्कुल सही बात है। स्थानीय लोगों की राय के अनुरूप उस क्षे़त्र के विकास पर पैसा खर्च करना चाहिए।"

वीणा, "यही मैं भी कहना चाहती हूँ।"


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