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ISSN 2292-9754

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09.19.2014


55.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

आलोचना करना आदमी का स्वभाव होता है। अगर ऐसा नहीं होता, तो हमें अपने चारों ओर हर चीज पर बहस करते हुए लोग नहीं मिलते। बात देश की हो या अपने जीवन के प्रति नजरिए की या फिर परिवार में होने वाले खर्च पर, सभी पर हमें दो तरह की राय सुनने को अवश्य मिल जाती है। खासकर राजनीति, जिसमें हर बात पर बाल की खाल निकाली जाती हो, साधारण सी बात को भी बहस का मुद्दा बनाया जाता हो, वहाँ एक-दूसरे की आलोचना किये बगैर कहाँ बात बनती है! राजनीति में यह बात आम है। अरुण ने अपनी बातों को कुछ इस प्रकार वरुण के सामने रखा।

पिछले दिनों जब वे दोनों मिले थे, तो राजनीति पर खूब गर्मागर्म बहस हुई थी। उस दिन वरुण सेमिनार से लौटा था, इसलिए उसकी विषय-वस्तु पर तैयारी अच्छी थी। इसलिए वह बोलता गया और अरुण चुपचाप सुनता गया। आज अरुण तैयार हो कर आया है। उसे वरुण को अपनी बातों से सहमत भी कराना है।

वरुण, "हाँ, यह स्वाभाविक है, लेकिन तुम आलोचना को गलत क्यों मान रहे हो? यह साकारात्मक भी हो सकता है!"

अरुण, " हाँ क्यों नहीं! दुख की बात तो यह है कि हम इसे सकारात्मक रूप नहीं दे पाते हैं। सकारात्मक का मतलब है, ऐसी आलोचना जो लाभ पहुँचाए, वह किसी के दिल को ठेस न पहुँचाए!"
वरुण, "तुम्हारी बात आधी सही है और आधी गलत।"

"क्या मतलब"

वरुण, "मतलब साफ है। तुमने कहा कि ऐसी बात, जिससे दिल को ठेस न पहुँचे। मैं इससे सहमत हूँ, क्योंकि आलोचना से कोई व्यक्ति आहत हो जाए, तो वह ठीक नहीं है। लेकिन क्या यह संभव है? अगर तुम्हारी राय के विपरीत, मैं कोई बात करता हूँ, तो क्या तुम आहत नहीं होंगे। हाँ यह अलग बात है कि किस हद तक आप आहत होते हैं! यह तुम पर और मुझ पर भी निर्भर करता है कि किस प्रकार मैं तुम्हारी आलोचना करू, जिससे कि तुम्हारे स्वाभिमान को चोट न पहुँचे। हाँ, दूसरी बात तुम्हारी आलोचना दूसरों को लाभ भी पहुँचाए! इसका क्या मतलब?"

"किसको लाभ मिलना चाहिए? मतलब तुम्हारी आलोचना तुम्हारे साथ-साथ समाज और देश को भी लाभ पहुँचाये।"

वरुण, "तुमने बिल्कुल सही प्वाइंट उठाया है। अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि कैसे तुम मेरी आलोचना भी करो और ठेस भी न पहुँचे! मैं एक उदाहरण देता हूँ। मान लीजिए हम लोग किसी मीटिंग में सम्मिलित हुए हैं। वहाँ तुम मेरी गलतियों को उठाते हो और आलोचना करते हो। मेरे सामने दो रास्ते हैं। पहला, तुम्हारी बताई गई गलतियों को अनसुना कर दूं या तुम्हारी भी आलोचना करने लग जाऊँ। दूसरा, अपने में सुधार का प्रयास करूँ। पहले दो ऑप्शन आसान हैं। इसे कोई भी कर सकता है, लेकिन मैं तीसरे विकल्प को चुनता हूँ। मुझे चतुराई से तुम्हारे साथ पेश आना होगा। मैं इस प्रकार मीटिंग में अपनी बात रख सकता हूँ। क्या आप जानबूझकर ऐसी बात कर रहे हैं, ताकि मुझसे आपका पुराना हिसाब-किताब बराबर हो जाए या अज्ञानतावश केवल मेरा पक्ष जानने के लिए सभी लोगों की उपस्थिति में यह बात पूछ रहे हैं। संभव है कि तुम्हें अपनी गलतियों का अहसास होगा। या फिर अपनी बात दोबारा मेरे सामने रखोगे, क्योंकि तुमने जानबूझकर वैसा नहीं किया है। मैं समझता हूँ कि आलोचना करते वक्त हमारा उद्देश्य लोगों को सिखाने का नहीं, बल्कि समाज और देश हित में विचार- व्यवहार में बदलाव लाने का होना चाहिए। इसमें संयमित भाषा का प्रयोग बहुत ज़रूरी है।"
वरुण, "यह बात तुमने ठीक कही। हमारी वाणी मर्यादित होनी चाहिए। खास बात तो यह है कि बगैर बोले भी हम अपनी बातों को रख सकते हैं।"

अरुण, "सो कैसे, बगैर बोले... यह कैसे संभव है?"

वरुण, "अरे, आपके नेता अटल बिहारी वाजपेयी जी का ऐसा ही कहना है। उनके व्यक्तित्व से जुड़ी एक कविता मेरे हाथ लगी है। जरा इसे पढ़ो। जानते हैं क्या हुआ था? संसद में एक बार बहस छिड़ी हुई थी। सभी अपना-अपना मत रख रहे थे। इसी बीच कोई वाकया हुआ। तब वाजपेयी जी ने कहा था-बोलने के लिए वाणी चाहिए और चुप रहने के लिए वाणी और विवेक दोनों चाहिए। उनकी यह बात सुनकर पूरा संसद खामोश हो गया।

मैं खामोश हूँ बीमार नहीं

मैं खामोश हूँ बीमार नहीं
डर अपनों से है परायों से नहीं
मेरी खामोशी को सबने सराहा
संसद में नेहरू ने
तो सड़क पर जनता ने

वाक्या मैं भूलता नहीं
जब वाणी को बल का जोर दिया जा रहा था
संसद में संख्या बल से शोर हो रहा था
तब मेरे सिर्फ एक वाक्य को सुन
क्षण भर में संसद खामोश हो गया
बोलने के लिए वाणी चाहिए
चुप रहने के लिए वाणी और विवेक दोनों चाहिए
लोग बोलकर भी हार गए
मैं खामोश रहकर भी जीत गया

खामोशी टूटती नहीं
बात रुकती नहीं
संसद से चलकर सड़क तक
सड़क से मैदान के मंच तक पहुँच गई
जब मैं चुप रहता भीड़ की मांग होती
मैं बोलने लगता जनता खामोशी से सुनती रहती

बात सिर्फ दिल्ली की नहीं है पूरे देश की है
पूछना है तो श्रीनगर के लाल चौक से पूछो
कन्याकुमारी के जलतरंगों से पूछो
पटना के गाँधी मैदान से पूछो
राजस्थान के रणबाँकुरों से पूछो
पंजाब के पंच प्यारों से पूछो

सुलगते उत्तर-पूर्व के राज्यों से पूछो
असम दिल्ली से दूर है, दिल से दूर नहीं
इस वाक्य का असर क्या था
इतिहास के झरोखों से पूछो
पुराने पन्नों को खंगालो, उत्तर मिल जाएगा

इमरजेन्सी के दौरान भी मैं बीमार था
एम्स की दीवारों में कैद था
पर मेरी खामोशी की ध्वनि
चारो ओर गूंज रही थी

बीमारी को मैंने पटकनी दी
यू एन ओ जाकर सिंहनाद किया
दुनिया में हिन्दी का प्रचार किया
अपने पराये सभी ने साथ दिया

आज इस बेला में भी मैं खामोश हूँ
क्योंकि खामोशी मेरी शक्ति है बीमारी मेरी करघनी
नाउम्मीदी के भंवर में, मोहन भागवत पुराण सुनता हूँ
डर है इस बात की, कोई जीते जी गरुड़ पुराण न सुना दे

वक्त मिलता है तो अभी भी गुनगुनाता हूँ........
अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।

अरुण- "हाँ, यह बड़ी अच्छी कविता है। वाकई यह उनके व्यक्तित्व का दर्पण है।"
वरुण- "संसद में अब नेता बहस करना नहीं चाहते हैं। वे सभी अपनी-अपनी गोटी फिट करने में जुटे रहते हैं। यदि वे अपनी सार्थक बहस और अपनी बुद्धिमता से लोगों को परिचित करा दें, तो उनके खिलाफ विरोध का स्वर कभी नहीं उठेगा। नेताओं के पास कई तरह की शक्ति हो सकती है। पद, करिश्माई व्यक्तित्व, विचार-व्यवहार, संस्कार और परिवार की शक्ति। आदि आदि।"

"आप कहना क्या चाह रहे हैं?"

"मैं कहना चाह रहा हूँ कि नेताओं को अपनी शक्ति पहचाननी चाहिए। वे किस चीज में दक्ष हैं, उसे मजबूत करने का काम करना चाहिए। पद पाकर वह मदांध हो जाए, यह गलत है। मैंने बताया न आपको वाजपेयी जी और इसके पहले इंदिरा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, इन सभी नेताओं ने अपने व्यक्तित्व से अपनी पहचान और जनता के दिलों में जगह बनाई थी। ऐसा नहीं था कि पद पर आसीन होने के बाद लोगों ने उन्हें सिर-आँखों पर बिठा लिया।"

अरुण, "महात्मा गाँधी ने तो अपने व्यवहार और संस्कार से ही पूरी दुनिया के लोगों के दिलों पर राज किया। उनके विचार आज भी लोगों के दिलों में बसते हैं। श्रद्धा-भाव से उन्हें स्मरण करते हैं।"

वरुण, "यही तो बात है। लोगों के दिलों में राजनीतिज्ञों के प्रति अब इज्जत नहीं होने की वजह उनकी विचारशून्यता, व्यवहार कुशल न होना और लोगों पर अपनी बातों को जबरन थोपना है।"

अरुण, "दरअसल बात यह है कि ज्यादातर नेताओं और लोगों की सोच मर चुकी है। आप किसी आदमी से पूछिए कि नेताओं को क्या करना चाहिए-जबाब मिलेगा- सड़क बनवा दे, स्कूल खोल दे, बेटे को नौकरी दिला दे, जॉब में अच्छी जगह पर ट्रांसफर करा दे आदि। इसी तरह का काम करने की नेताओं से अपेक्षा की जाती है।

दूसरी बात यह है कि आज हर आदमी नेता बनना चाहता है। उसकी सोच होती है कि इसमें बिना काम-धाम किए ही नाम और दाम दोनों मिल जाता है। वे सोचते हैं कि यदि हम नेता बन जाएँगे, तो हम भी अपने नेताओं की तरह जनता से केवल वायदे कर लेंगे। असल में करना तो कुछ भी नहीं पड़ता है!"

वरुण, "हाँ, ऐसे विचार ही देश के लिए हानिकारक साबित हो रहे हैं। यदि आगे भी ऐसी स्थिति बनी रही, तो पूरा देश ही बैठ जाएगा। लेकिन कुछ अच्छे नेता भी हैं, जिनकी वजह से बड़ी-बड़ी पॉलिसीस बन रही हैं और उस पर काम भी हो रहा है। मसलन फूड सेक्यूरिटी, नेशनल मिशन ऑन एजूकेशन आदि-आदि।

हाँ, यह अलग बात है कि इससे कुछ नेतागण ही जुड़े हुए हैं। ज्यादातर केवल अपने क्षेत्र और वहाँ के वोटर से ही मतलब रखते हैं। कुछ गलत लोगों की वजह से पूरा राजनीतिक कॉम ही बदनाम हो गया है।"

अरुण, "हाँ तुम्हारा कहना ठीक है। हम लोग हमेशा आलोचना ही करते रहते हैं। हमें किसी भी चीज की तह में जाने के बाद ही उसके बारे में विचार प्रकट करना चाहिए। हमें केवल सभी लोगों की खिंचाई ही नहीं करते रहना चाहिए।"

वरुण, "अपने स्तर पर हमें भी अपना योगदान देना चाहिए, भले ही वह नोटिस में आए या नहीं! अगली बार जब मैं तुमसे मिलूंगा, तो मीडिया के लोग भी कैसी बे सिर-पैर की बातें करते हैं, इस पर चर्चा करुंगा, जबकि इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है।"

अरुण, "हाँ, काफी देर हो गई। अब चलते हैं।"


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