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ISSN 2292-9754

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09.19.2014


54.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

सेमिनार अटेण्ड करने के बाद वरुण के मन में राजनीति से जुड़े कई तरह के विचार आ रहे थे। वह अरुण के साथ मिलकर कुछ विचारों पर विस्तारपूर्वक चर्चा करना चाहता है। इसलिए वह सीधा अरुण के पास चला गया। जब वरुण वहाँ पहुँचा, तो वह अपने कमरे में बैठा पेपर पढ़ रहा था। उसने घर में ही एक कमरे को ऑफिस बना लिया था। वहीं से वह एन.जी.ओ का काम चला रहा था। ऑफिस में दो कम्प्यूटर लगे हुए थे। एक पर वह खुद काम करता था, जबकि दूसरे पर एक रिसर्च एसोशिएट काम करता था। उसे वह हर महीने चार हज़ार रुपये तनख्वाह देता था।
अरुण मात्र स्नातक था। उसके ऑफिस में काम करने वाला रिसर्च एसोसिएट दिल्ली विश्वविद्यालय से एमफिल कर रहा था। एनजीओ के सभी काम की जिम्मेदारी वही संभालता था। प्रोजेक्ट बनाने से लेकर रिपोर्ट तैयार करने का काम भी उसी के जिम्मे था। अरुण का काम रिपोर्ट को बड़े अधिकारियों तक पहुँचाना और प्रोजेक्ट को पास कराना था। दूसरे शब्दों में कहें, तो उसका काम पब्लिक रिलेशन का था।

घर में प्रवेश करते ही वरुण ने पूछा, "आज आप अकेले हैं। आपके रिसर्चर कहाँ गए?"

अरूण, "उसकी माताजी की तबियत ठीक नहीं है। इस कारण से पिछले एक सप्ताह से वह छुट्टी पर है। वह माताजी को देखने गाँव गया हुआ है। शायद अगले सोमवार तक आ जाएगा।"

"क्या उनकी तबीयत ज्यादा खराब है?"

"हाँ, इसी वजह से वह गया है, वरना वह रेगुलर आता है। कभी छुट्टी की मांग नहीं करता है।"

"अच्छा लड़का है।""हाँ, इसमें कोई दो राय नहीं है। मन लगाकर काम भी करता है। उससे हमारे काम का बोझ कम हो गया है।"

"फिर उसका पैसा क्यों नहीं बढ़ा देते हो?" वरुण ने सवाल किया।

"यह बात तुम क्यों कह रहे हैं?", क्या वह तुमसे कुछ बोल रहा था?"

"नहीं, ऐसी बात नहीं है। मैं इस आधार पर बोल रहा था कि वह दीन-हीन सा लगता है।" वरुण ने ऐसा इसलिए कहा ताकि अरुण पीछे में उस लड़के को बुरा-भला न कहे। दरअसल, कुछ दिनों पहले रिसर्चर ने वरुण से इस बात की चर्चा की थी। पिछले तीन साल से वह यहाँ काम कर रहा है। दो बार उसने अरुण से सैलरी बढ़ाने की बात कही थी, लेकिन उसने अनसुना कर दिया था।

अरुण, "हाँ मैं भी उसकी तनख्वाह बढ़ाना चाहता हूँ, लेकिन क्या करूँ! अभी हालात बहुत खराब हैं। पैसा बचता कहाँ है? मेरी खर्च ही नहीं पूरी हो पाते है।"

वरुण, "हाँ, तुम सही कह रहे हो। महंगाई बढ़ गई है, लेकिन...।"

अरुण, "लेकिन क्या?"

वरुण, "लेकिन हमें दूसरों के बारे में भी सोचना चाहिए। यदि हम नहीं सोचेंगे, तो कौन सोचेगा?"

वरुण ऐसा इसलिए कह रहा है, ताकि उसकी बात उसे बुरी न लगे। हाल में ही उसने 17 लाख रुपये की जमीन खरीदी है, वह भी एनजीओ के पैसे से। बाबू साहब खुद गाड़ी पर चलते हैं। वह लड़का, जो उनके लिए सब कुछ करता है, उसे मात्र चार हज़ार रुपये देकर छुट्टी कर देते हैं। क्या यह सही है? लेकिन कुछ किया भी नहीं जा सकता है! जमाना बड़ा खराब है। जब लोग खुद मुसीबत में होते हैं, तभी दूसरों की पीड़ा को समझ पाते हैं, वरना कभी नहीं। उसने कभी अरुण को भी पैसे की तंगी झेलते हुए देखा है। हमेशा अपनी ज़रूरतों का रोना रोया करता था। आज दूसरों को पैसे की ज़रूरत है, तो नाक-भौं सिकुड़ा रहा है।

कुछ सोचते हुए वरुण कहता है, "चलो यह तुम्हारा मामला है। मैं इसमें दखल नहीं देना चाहता हूँ। और बताओ क्या सब ठीक है?"

अरुण, "हाँ सब ठीक है। मैं कल तुम्हारे पास नहीं आ सका था, क्योंकि मैं अपने क्षेत्र के सांसद से मिलने उनके घर गया हुआ था। उनके यहाँ ही मेरा भोजन था।"

वरुण, "अच्छा, यह बात थी, लेकिन कल मैं तुम्हारे आने का इंतजार कर रहा था। पहले मुझे यह बताओ तुम इन लोगों के पास अक्सर क्यों आते-जाते रहते हो? तुम्हें बुरा नहीं लगता है। मैं बता दूं ये सभी लोग ज़रूरत के वक्त कभी मदद नहीं करते हैं।"

अरुण, "देखो यार! उनसे मिलने पर अच्छा अनुभव तो नहीं करता हूँ। लेकिन यह सब रोटी के खातिर करना पड़ता है! वरना कौन इन अनपढ़ों के पैर छूए और जी हजूरी करे।"

वरुण, "हाँ, तुम ठीक कह रहे हो । सब पेट का मामला है, वरना आदमी ऐसा क्यों करेगा? दरअसल, मैं आज एक सेमिनार को कवर करने गया था। वहाँ राजनीति को लेकर बड़ी-बड़ी बातें हो रही थी। मुझे हर बात बकवास लग रही थी। यथार्थ से कोई लेना-देना नहीं। मैं जो कुछ अभी देख-सुन रहा हूँ, उससे बिल्कुल अलग था।"

अरुण, "तुम्हारी क्या राय है? ऐसी स्थिति में राजनीति मे कैसे सुधार हो सकता है?"

वरुण, "मेरे हिसाब से आज लोग न तो राजनीतिज्ञों पर विश्वास करते हैं और न ही इस पेशे को अच्छी निगाह से देखते हैं। यह बहुत ही खराब संकेत है। इससे हर हालत में बाहर निकलना होगा।"
अरुण, "कैसे निकलेंगे।"

वरुण, "यह बड़ी बात नहीं है। यदि हम अपनी सोच में बदलाव लाएँ, तो यह संभव हो सकता है। राजनीति में शुचिता लाने के लिए इसमें अच्छे लोगों की भागीदारी बहुत ज़रूरी है, लेकिन अच्छे लोग भागीदार बनने की बजाय इससे दूर भाग रहे हैं।

यह तय है कि अच्छे लोग ही लोकतंत्र को मजबूती प्रदान कर सकते हैं। इस लोकसभा चुनाव में क्रिमिनल बैकग्राउण्ड के सभी प्रत्याशियों को मुंह की खानी पड़ी। हम अब जनता को दोष नहीं दे सकते। अब ज़रूरत है कि राजनीतिक पार्टियाँ अच्छे लोगों को आगे लाए और अच्छे लोग भी अपना योगदान देने के लिए तैयार हों। राजनीति गंदी नहीं होती है। लोग इसे गलत और सही बनाते हैं।"

अरुण, "अच्छे लोग कैसे आएँगे? अच्छे लोग कहने से आपका क्या मतलब है?"

वरुण, "पार्टियों को अच्छा और बुरा में विभेद करना आना चाहिए। क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता है?"

"हाँ, कुछ हद तक तुम ठीक कह रहे हो।"

वरुण, "कुछ हद तक नहीं, यह बात पूरी तरह से ठीक है। क्या तुम स्कूल में विभेद नहीं करते थे? ऑफिस में नहीं करते हो? करते हो न, फिर क्या दिक्कत है?"

सबसे बड़ी दिक्कत है कि अच्छे लोग आगे नहीं आते हैं। उनको आगे लाने के लिए जो पुरानी जमींदारी प्रथा जैसी व्यावहारिक नीति अपनाई जाती है, उसे खत्म करना होगा। मैं तुम्हें कुछ चीज बताता हूँ।

समझदारी और जिम्मेदारी राजनीतिक कार्यकर्ताओं का सर्वोपरी गुण होता है। कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वह............ पैर छूने की संस्कृति को त्यागें। नेताओं की चापलूसी व परिक्रमा करने की बजाय लोगों से संपर्क करने की आदत डालें। पैसा, परिवार और बाहुबल से पद पाने की लालसा छोड़ें और ऐसे लोगों का बहिष्कार भी करें। स्वभाव और व्यवहार में विनम्रता लायें। अपने परिश्रम और परफॉर्मेंस पर भरोसा रखें।

अपने इलाके की समस्याओं को समझें और उसका सर्वसम्मत हल निकालने की कोशिश करें। क्षेत्र प्रतिनिधि और जिला प्रशासन के कार्य व अधिकार को समझकर अपने इलाके के विकास की योजना तैयार करने में सक्रिय रहें। विविध विषयों पर इलाके के बुद्धिजीवियों की संगोष्ठी का आयोजन करें।

राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं के व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन होने से यह संभव है।

अरुण- "हाँ यह ठीक है। तुमने बिल्कुल सही बात बताई।"


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