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ISSN 2292-9754

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09.19.2014


53.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मनीष अभी ऑफिस आया ही था कि संजीव उसके पास आकर माफी मांगने लगा। उसने कहा-आगे से वह उससे महिलाओं के बारे में बात नहीं करेगा। ऑफिस से घर जाने के समय वह सोच रहा था कि मनीष का दिल उसने क्यों दुखाया? हालांकि उसकी ऐसी कोई मंशा नहीं थी। वह अक्सर अपने दोस्तों के साथ इस प्रकार की बातें किया करता था। वे सभी चटकारे लेकर उसकी बात सुनते थे। लेकिन मनीष ने उसकी बात को नापसंद किया।

संजीव को यह डर भी सताने लगा कि मनीष कल कहीं उसकी बातों को विजय सर से न बोल दे। क्योंकि वह उनसे काफी क्लोज था। इसलिए राजनीति का तकाजा यह था कि वह आपस में ही इन बातों को सुलझा ले। ऑफिस आते ही संजीव, मनीष के पास गया और बोला, "क्या अभी तक गुस्सा हो? मुझसे गलती हो गई, आपके सामने मुझे ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए थी।"

मनीष तुरंत बोला, "नहीं, इसमें माफी की क्या बात है? जब तुम उस तरह की बातें करते हो, तो करो हमें उससे कोई लेना-देना नहीं है।"

संजीव ने छूटते ही कहा, "लेना-देना क्यों नहीं है? अब जब आप मेरे दोस्त बन गए हो, तो आपको हमें सही रास्ते पर लाना ही होगा। मैंने गलती की और आज उसे स्वीकार कर रहा हूँ। आप मुझे माफ कर दो।"

मनीष, "ठीक है यार, कोई बात नहीं।"

संजीव ने उसकी बात में रुखाई कम और मान जाने का भाव देखा। उसने सीधे उसकी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा कि चलिए अब हम चाय पीते हैं। साथ चाय लेंगे, तो समझेंगे आपने मुझे माफ कर दिया। मुस्कुराते हुए मनीष उसके साथ चलने के लिए तैयार हो गया। चलो चलते हैं लेकिन जल्दी आ जाएँगे। हमें यह सब पसंद नहीं है। मैं काम करूँ या नहीं, अपनी सीट पर बैठा रहता हूँ और कुछ-न-कुछ पढ़ता रहता हूँ।

संजीव, "बहुत बढ़िया करते हो। व्यर्थ की बातों में समय जाया करने से क्या लाभ है? आदमी को कुछ-न-कुछ काम करते रहना चाहिए।"

दरअसल, ऑफिस में संजीव से बहुत कम लोग बात करते थे। जो लोग करते थे तो सिर्फ काम भर। वह न तो खुद काम करता था और ना ही दूसरों को काम करने देता था। बड़ी बात तो यह थी कि वह बड़े अधिकारी की नजरों में भी ठीक व्यक्ति नहीं था। इसलिए वह मनीष से दोस्ती को तोड़ना नहीं चाहता था।

एक बात और थी, जिससे लोग उससे चिढ़ते थे। वह हर दिन दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक ऑफिस से बाहर अपनी गर्लफ्रेंड के साथ समय बिताता था। इस वजह से डायरेक्टर से उसकी लड़ाई भी हो गई थी, लेकिन अपने इमीडिएट बॉस की मेहरबानी की वजह से उसकी नौकरी बच गई थी। वे उसे इस वक्त छुट्टी दे देते थे। इसके बदले में उन्होंने उसके जिम्मे ट्रांसलेशन का काम सौंप दिया था, जिसे वह देर शाम तक बैठकर पूरा करता था। इधर कुछ दिनों से वह पूरे समय तक ऑफिस में टिका रहता था। इसलिए उसे बातचीत के लिए कोई साथी चाहिए था, जो मनीष के रूप में उसे मिल गया था। मनीष इन बातों से अनभिज्ञ था, क्योंकि वह अपने काम से मतलब रखता था। उसे ऑफिस गॉसिप से कोई मतलब नहीं था।

मनीष, "हाँ मैं अपने काम से ही मतलब रखता हूँ।"

संजीव को बातचीत जारी रखने के लिए कुछ सूझ नहीं रहा था। दरअसल, वह हमेशा लड़कियों के बारे में ही बात करता था। उसने कहा, "वाकई कई बार हमें आगे का रास्ता नहीं सूझता है। हम घटनाओं को समझ नहीं पाते हैं। हम ऐसी परिस्थिति में फंस जाते हैं कि उससे निकलना मुश्किल हो जाता है। उसने बातचीत को सरकार के कामकाज की ओर मोड़ दिया।

मनीष को टोकते हुए कहा, "सरकार तो केवल कानून बनाने भर अपनी जिम्मेदारी समझती है। आम आदमी पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, यह कोई सोचने वाला नहीं है। अब अगर कोई दिल्ली वालों से पूछे कि आपके लड़के के लिए स्कूल में क्या सुविधा मुहैया कराया जाए? लोगों का उत्तर होगा ....स्पोर्ट्स ग्राउण्ड, विलियर्ड्स ग्राउंड, पर्सनैल्टी डेवलपमेंट से जुड़ा साधन मौजूद होना चाहिए। वहीं अगर गाँव वालों के सामने यही सवाल किया जाए तो उनका जवाब कुछ और होगा। होगा कि नहीं, मनीष।

मनीष ने हाँ में हाँ मिलाई। कहा कि यहाँ की ज़रूरतें, अपेक्षाएँ गाँव वालों से अलग हैं। शहरी लोगों की अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर केवल योजनाएँ तैयार की जाएँ, तो गाँववालों का बंटाधार हो जाएगा।

संजीव ने बात आगे बढ़ाते हुये कहा, अब देखिए, आँध्रप्रदेश में सभी जगह कम्प्यूटर लगाया गया, लेकिन बिजली की व्यवस्था नहीं की गई। ठीक उसी प्रकार का हाल हरियाणा में हुआ। लिहाजा, कई योजनाएँ फेल हो गईं, जबकि इसे शुरू करते समय बहुत वाहवाही मिली थी।
मनीष, "मन-ही-मन सोचा कि संजीव ने आम आदमी का अच्छा प्वाइंट उठाया है। इसपर आगे भी चर्चा करते रहेंगे। यह कहकर उसने अपनी बातों को विराम दिया और ऑफिस की ओर चल दिया।"


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