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ISSN 2292-9754

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09.17.2014


52.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

वरुण आज ’राजनीति और समाज’ पर आयोजित एक सेमिनार में भाग लेने गया था। इसमें देश-दुनिया में बदल रही राजनीति पर चर्चा हुई। इस सेमिनार में हुई चर्चा-परिचर्चा का वरुण पर गहरा असर पड़ा। अरुण की वजह से वह भी राजनीति में काफी दिलचस्पी लेने लगा था। सेमिनार के बाद उसके मन में यह प्रश्न आया कि राजनीति में किन लोगों को जाना चाहिए और इसके लिए क्या आवश्यक योग्यता होनी चाहिए।

इस पर विचार करते हुए उसके मन में कई प्रकार के विचार आने लगे। मौजूदा राजनीतिज्ञों की जमात में ज्यादातर ऐसे लोग हैं, जिनका सरोकार कॉलेज पॉलिटिक्स से रह चुका है। ऐसे लोग अपने पक्ष में तर्क देते हैं कि उन लोगों ने कॉलेज में राजनीति सीखा और देश की खातिर जेल भी गए। क्या राजनीति में प्रवेश का यह आधार ठीक है? कॉलेज में मां-बाप पढ़ाई के लिए भेजते हैं और वे राजनीति करना शुरू कर देते हैं। इससे वे अपने परिवार की आकांक्षाओं और आशाओं पर पानी फेर देते हैं। वे न तो अपने साथ न्याय कर सके और न ही परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाई।

हाँ, उन लोगों की बात अलग है, जिन्होंने इमरजेन्सी के खिलाफ या देश हित के लिए राजनीति में प्रवेश किया। उनकी बात कुछ हद तक समझ में आती है। जिन लोगों ने पढ़ाई को ताक पर रखकर हुड़दंगबाजी के लिए सिर्फ राजनीति में प्रवेश किया, क्योंकि उन्हें यह अच्छी लगती है। यह सर्वथा गलत है। हमें ऐसे लोगों को राजनीति में प्रवेश पर रोक लगानी चाहिए।

परन्तु राजनीतिक पार्टियाँ ऐसे ही लोगों को तरजीह देती हैं। उनका तर्क होता है कि वे ज्यादा परिपक्व होते हैं और चुनाव भी जीत सकते हैं। गैर जिम्मेदार लोगों को टिकट देकर राजनीतिक पार्टियाँ गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार नहीं कर सकती हैं। लोकतंत्र में जीत का महत्व ह, ै लेकिन जीत के लिए लोकतंत्र की आत्मा घोंटना ठीक नहीं है।

पिछले दिनों के राजनीतिक परिदृश्य को देखा जाए, तो दो बातें सामने आती हैं। पार्टियाँ उन लोगों को ज्यादा तरजीह देती हैं जो हो-हल्ला, शोर-शरावा करनेवाले हों यानी बदमाश प्रकृति के हो एवं जिनके पास काफी पैसा हो। सवाल उठता है कि क्या ऐसे लोगों से किसी प्रकार के सकारात्मक योगदान की कल्पना की जा सकती है।

कतई नहीं। ये लोग अपना लाभ भले कर लें, लेकिन आम लोगों को इनसे लाभ नहीं मिल सकता है। ना ही इनसे कुछ उम्मीद की जा सकती है। किसी बदमाश से शराफत की उम्मीद करने में सिर्फ जोखिम ही है।

बदमाशों को सह देने वाला समाज कभी फल-फूल नहीं सकता है। इससे समाज को नुकसान उठाना पड़ता है। इसी तरह गलत लोगों को पार्टी में शामिल करना लोकतंत्र के लिए घातक है। ऐसे लोगों के भरोसे चुनाव में दो-चार सीट जीत लेने पर तात्कालिक सफलता मिल सकती है, लेकिन बाद में यही लोग नासूर भी बन जाते हैं। हम आज पार्टियों में जो बिखराव देखते हैं, शायद इसकी वजह अपराधिक छवि वाले लोग ही हों जिन्हें पार्टी ने किसी समय तवज्जो दिया था। राजनीति में प्रवेश के लिए कॉलेज स्तर पर की गई राजनीति और अधिक पैसे वाला मापदंड नहीं होना चाहिए। सभी राष्ट्रीय पार्टियाँ इसे ही मापदंड मानती हैं और छोटी पार्टियाँ तो केवल इस पर ही फल-फूल रही हैं।

यह गलत है, इस व्यवस्था को बदलना चाहिए।

राजनीति में पैसे की जगह यह देखना चाहिए कि जीवन, समाज और देश के उत्थान के प्रति उसके क्या विचार हैं? उसका बैंक बैलेंस नहीं बल्कि विचारों का बैंक उसके पास है या नहीं, इस बात पर जोर देना चाहिए। यह तब तक संभव नहीं है जब तक कि नेतृत्व का दृष्टिकोण साफ एवं दूरदर्शी नहीं हो।


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