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ISSN 2292-9754

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08.20.2014


50.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

एक बज चुके हैं। ऑफिस में लंच ब्रेक हो चुका है। सभी लोग अपना-अपना लंच बॉक्स लेकर कैंटीन में खाने के लिये जा रहे हैं। मनीष भी खाने के लिये तैयार है। वह अपनी सीट पर ही खाना खाता था। वह लंच बॉक्स खोलने ही वाला था कि संजीव वहाँ आ पहुंचा। उसने उसे कैंटीन में चलने को कहा।

संजीव ने कहा, "चलो यार, कैंटीन में खाना खाते हैं।"

मनीष बोला, "नहीं, नहीं यहीं पर खाना खा लेते हैं। आप भी यहीं खा लो।"

"अरे यार, मैं कहाँ खाना लाता हूँ। घर में मिलता ही नहीं है, तो यहाँ लाने के लिये क्या मिलेगा। चलो वहीं कैंटीन में कुछ ले लेंगे और फिर दोनों साथ मिलकर खायेंगे।"

"अच्छा, क्या बात कर रहे हो?"

मनीष बोल ही रहा है कि संजीव ने टोक दिया। उसने उसका हाथ पकड़कर चलने के लिए मजबूर कर दिया, "चलो यार तुमको सब बताता हूँ।"

मनीष भी संजीव के साथ ही चल पड़ा।

कैंटीन में दोनों ने खाना खाया। उन दोनों के बॉस विजय ऑफिस नहीं आए थे। इसलिये दोनों बातें करते हुए ऑफिस से बाहर निकल पड़े। संजीव ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि देखो यार! मुझे तुमसे अपनी बात बताने में कुछ भी संकोच नहीं होता है। मुझे तो सात दिन में चार दिन बाहर ही खाना पड़ता है। ऑफिस में प्रतिदिन कैंटीन में ही खाता हूँ। शनिवार, रविवार को अक्सर पत्नी के मायके जाना होता है। इसलिए वहाँ नहीं तो होटल में खाना पड़ता है। हर रोज सुबह ऑफिस के लिए निकलते वक्त वह सोती रहती है, इसलिए रोज ब्रेड-बटर ही खाना पड़ता है।

मनीष आश्चर्यचकित होते हुए पूछा, "क्या भाभी जी खाना नहीं पकाना जानती हैं?"

संजीव, "खाना पकाना जानना तो अलग बात है। मन भी तो होना चाहिए। यह दिल्ली है, यहाँ तुम्हारे बिहार वाली बात नहीं है। पति परमेश्वर नहीं होता है कि पत्नी उसके लिए सब काम करे। वह सीधा बोल देती है - "तुम खुद कर लो।"

मनीष, "अच्छा, यह क्या बात हुई?"

संजीव ने कोई उत्तर नहीं दिया। अभी उसका ध्यान वहाँ नहीं था। उसकी नजरें कहीं कुछ और तलाश रही थी।

मनीष ने अपने सवाल को दुहराया, "फिर भी उसे संजीव का उत्तर नहीं मिला। वह कहीं और देख रहा था। मनीष कुछ पूछता, इससे पहले कि संजीव के मुंह से आवाज निकल पड़ी, "अरे वाह, कितनी सुंदर लड़की है।"

मनीष को यह सुनकर अटपटा लगा। संजीव उस लड़की को घूरता रहा और उसके रूप के गुणगान में कुछ न कुछ बोलता रहा। जब तक कि वह लड़की वहाँ से चली नहीं गई।

मनीष ने टोका, "कैसी बेकार की बातें कर रहे हो? क्या तुमने यही संस्कार पाया है।"

संजीव, "क्या यार! कभी तो मजा लेने दो। संस्कार की बात मत करो, सुंदरता देखने के लिये ही होती है। मैं उसका कुछ बिगाड़ नहीं रहा हूँ। तुम बेमतलब गुस्सा कर रहे हो।"

"मैं गुस्सा नहीं कर रहा हूँ। मैं सिर्फ यह बता रहा हूँ कि अच्छे लोगों को ऐसी बातें करना शोभा नहीं देती हैं। यदि वह तुम्हें देख लेती तो चप्पल से मारती।"

"तुम भी कैसी बातें कर रहे हो। वह उस टाईप वाली नहीं है। यह चलाऊ है। उसपर खर्च करो और कहीं भी ले जाओ।"

"बस रहने दो.... हमें इस तरह की गंदी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है। तुम जो करना चाहते हो वह करो, मैं कल से तुम्हारे साथ नहीं आऊँगा।"

"खामख्वाह नाराज हो रहे हो। चलो छोड़ो आगे से तुम्हारे साथ ऐसी बातें नहीं करूँगा। तुम क्या पूछ रहे थे बोलो!"

"क्या भाभी जी तुम्हारे लिये खाना नहीं बनाती हैं? अच्छा ही करती हैं, तुम्हारे जैसे लोगों को खाना तो दूर घर से निकाल देना चाहिए।"

"हाँ मनीष मैं तुम्हारे विचार से सहमत हूँ, लेकिन एक सवाल का जबाव तुम मुझे भी दो।"

"हाँ, बोलो क्या सवाल है?"

"अगर मैं करूँ तो वह सही नहीं है। लेकिन अगर वह भी इसी तरह करे तो तुम इसे क्या कहोगे? जानते हो यहाँ लड़कियाँ कपड़ों की तरह लड़के बदलती हैं। तुम जानना चाहते हो, तो चलो मेरे साथ।"

मनीष इसका जबाव नहीं दे पाया। केवल इतना कह सका कि देखो इसमें सच्चाई कम होती है अफवाह ज्यादा। यहाँ अभी भारतीयता बरकरार है। यहाँ की महिलाएँ ऐसा नहीं कर सकती हैं।

"तुम सही हो। भारतीय महिलाएँ ऐसा नहीं कर सकतीं, लेकिन उनके बारे में तुम्हारी क्या राय है जो हैं तो भारतीय, लेकिन उनके संस्कार हैं विदेशी। वे सिगरेट पीती हैं, गाड़ी चलाती हैं, पढ़ी-लिखी हैं, उन्हें कोई भी काम करने में शर्म महसूस नहीं होता है। वे जिन्दगी को अपने अनुसार जीना चाहती हैं। समाज और परिवार का बंधन उनके लिये कोई मायने नहीं रखता है, वे सिर्फ मौज-मस्ती चाहती हैं।"

"उनसे भगवान बचाए। मुझे कुछ नहीं कहना है। चलो अब चलते हैं। बहुत समय हो गया। ऑफिस में लोग हमारा इंतजार कर रहे होंगे।"

"हाँ, ठीक है, चलो चलते हैं। लेकिन मैं तुम्हें बता दूं कि अब हालात बहुत ही खराब हो चुके हैं। यह केवल दिल्ली में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों से आई लड़कियों का भी यही हाल है। मैं तो दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास रहता हूँ। वहाँ देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। मैं उन्हें जो हरकतें करता देखता हूँ, वह क्या बताऊँ।"

"क्या देखते हो तुम।"

"वही जिस बात पर आप गुस्सा हो रहे हैं। आज के लड़के-लड़कियाँ संस्कार से नहीं, बल्कि बाजार से प्रभावित होते हैं। उन्हे संस्कार और संस्कृति की बातें दकियानूसी लगती हैं। वे हर क्षेत्र में स्वतंत्रता चाहते हैं।"

"यह सच है कि वे स्वतंत्रता चाहते हैं लेकिन स्वच्छंदता और मर्यादा को भी समझते हैं। किस हद तक उन्हें जाना है, उनको यह अच्छी तरह मालूम है। तुम जाकर उनसे बात करो तब पता चलेगा। जो दिखता है वह होता नहीं है और जो होता है वह दिखता नहीं है।"

"यही तो कह रहा हूँ। कल न्यूज पेपर में एक खबर छपी थी – शायद हिन्दुस्तान टाइम्स में। आजकल लड़के-लड़कियों को साथ रहने और मौज-मस्ती में कोई परेशानी नहीं है। इसमें वे कुछ भी बुराई नहीं मानते हैं।"

"हो सकता है। कुछ लोग ऐसे हों, लेकिन सभी ऐसे नहीं होते हैं। यह मानते हो या नहीं।"

"हाँ यह मैं मानता हूँ, लेकिन उन लोगों की संख्या बढ़ रही है, जो इसे पसंद करते हैं। तुम्हारे जैसे लोगों की संख्या बहुत कम है। अरे यार! जिन्दगी मिली है, मौज-मस्ती से काटो, आगे क्या होगा कौन जाने!"

"क्या मौज-मस्ती का एक मात्र यही साधन है?"

"क्या मैंने कुछ ऐसा कहा, नहीं न। लेकिन जो लोग स्वछंद जीवन जीने को सही मानते हैं, तो उसे आप सही या गलत नहीं कह सकते हैं। आप उन्हें यह निर्णय लेने दें चाहे तो वे पसंद करें या न करें।"

"तुम कैसी बात करते हो। उन पर कैसे छोड़ दिया जाए। जो इस कीचड़ में फंसे हैं उन्हें कैसे मालूम कि यह गलत है या सही।"

"उन लोगों को सब पता है।"

"हम अपनी भावी पीढ़ी को खराब नहीं होने देंगे।"

"रोको फिर, पता चलेगा। क्या तुम उनपर अंकुश लगा सकोगे।"

"नहीं, मैं उन्हें समझाने की कोशिश करूँगा। तर्क सहित बातें कहने से बड़ी से बड़ी बात बन जाती है।"

"हाँ, इस मिशन में मै भी तुम्हारे साथ हूँ, लेकिन मैं उन्हें अपने साथ चलने के लिए समझाऊँगा। वे लोग हमें सेक्सी कहेंगे और तुम्हें बूढ़ा खूसट।"

मनीष, "ठीक है, अब कोई बात नहीं करूँगा। जब सभी खराब हो रहें हैं, तो होने दो। हमसे जितना बन पड़ेगा। हम करेंगे।"


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