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ISSN 2292-9754

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08.20.2014


49.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

घनघोर अंधियारे को चीरती हुई ट्रेन आगे बढ़ती जा रही है। ट्रेन की लाइट कभी-कभी पेड़ों की पत्तियों पर भी पड़ रही है। रोशनी में पानी की बूंदे मोती की तरह चमक रही हैं। विजय निहार रहा है। वह इन दृश्यों को अपनी आँखों में समेट लेना चाहता है। वीणा को भी इन दृश्यों को दिखाना चाहता है लेकिन दूसरे पल वह सोचता है कि थक गई होगी। कई दिनों से वह लगातार यात्रा कर रही है। उसके कम्पार्टमेंट के ज्यादातर यात्री सो चुके हैं। विजय अकेला खिड़की से बाहर देख रहा है।

कुछ देर बाद उसे एक पतली नदी दिखाई देती है। इस नदी को देखते ही उसे अपनी गाँव की नदी की याद आने लगती है। जो दृश्य उसके स्मृति में थे, वे एक-एक कर उभरने शुरू हो गए।

विजय को बीस वर्ष से ज्यादा हो चुका है अपने गाँव से बाहर आए। पढ़ाई के सिलसिले में वह दसवीं कक्षा के बाद गाँव से बाहर ही रहा है। शुरुआती दौर में ग्रामीण पृष्ठभूमि में पले-बढ़े विजय के पास याद रखने के लिये आज के युवाओं की तरह फर्स्ट गर्लफ्रेंड, फस्ट डेटिंग, ब्रेकिंग या मूवी विथ गर्लफ्रेंड नहीं था।

ने लगा कि किस प्रकार बारिश के दिनों में वह खेत पर काम करने वालों को खाना पहुंचाने जाता था। स्कूल से छुट्टी पाने का भी एक अच्छा बहाना होता था। लोगों को बरसात के दिनों का काफी इंतजार रहता था। वैसे तो लोग अपने ज्ञान के आधार पर मानसून के बारे में जान लेते थे। गाँव में एकाध पेपर भी आता था। इसलिए लोग मानसून की खबर भी पढ़ते हैं। इस बार बिहार में कौन सी तारीख को मानसून आ रहा है बीस जून या इक्कीस। पढ़े लिखे लोग हों या अनपढ़ सभी इस पर विस्तार से चर्चा करते थे। कोई अपने अनुभव के आधार पर बातें करता, तो कोई फलां चाचा यह कह रहे थे, तो कोई अखबार में बताई गई जानकारी के आधार पर करता। वहीं किसी अंधविश्वासी का विचार होता कि धरती पर पाप बढ़ने के कारण मानसून आने में देर हो रही है।

"एकबार सुखाड़ से निपटने के लिये यज्ञ का प्रबंध भी किया गया था।"

विजय ने सोचा। गरीब किसानों के पास पैसे नहीं थे फिर भी वे अखंड यज्ञ के लिये तैयार हो गये थे। वे सभी स्वेच्छा से जिसके पास जितना धन था यज्ञ के लिये दिया था। उन्हें यह उम्मीद थी कि अखंड यज्ञ से इन्द्र देव खुश हो जायेंगे और वर्षा होगी। उनके खेतों में फसल लहलहा उठेंगे।

हुआ भी था वैसा ही। लगातार तीन दिनों तक बारिश हुई। चारों तरफ पानी ही पानी। लोगों के चेहरों पर अपार खुशी थी। लोगों के चेहरे पर वैसा भाव उस घटा के बाद मैं नहीं देख सका हूँ। सामान्य जीवन से निकलकर जब से महानगरों की ओर मैं रुख किया है, वैसा सहज, सरल और स्वतः खुशी वाकई नजर नहीं आई।

वर्षा के बाद सभी लोग अपने-अपने खेत के काम में मशगूल हो गये।

रोपण के दिन तो खुद पिताजी ने ही पढ़ाई से छुट्टी की इजाजत दे दी थी। रोपण यानी धान बुआई का पहला दिन। उस दिन गाँव भर में उत्सव जैसा माहौल होता था। पूरे गाँव के लोगों का जिस किसान के घर रोपण होता था उसके यहाँ खाना होता था। अच्छे पकवान बनते थे, और सभी लोग खूब चाव से खाते थे।

आज हम शहर में भले ही बर्थ डे पार्टी मनाते हैं। और कई प्रकार की सब्जी जैसे मटर-पनीर, मंचूरियन, कोरमा आदि बनाते हैं। लेकिन गाँव के भोजन का जो स्वाद होता था, उसकी मैं व्याख्या नहीं कर सकता हूँ। वे दिन अब यादों में ही रह गये हैं। क्या आज के बच्चे उसका लुत्फ उठा सकेंगे?

गाँव को याद करते-करते विजय को अपने बेटे का ख्याल आ गया। वह डीपीएस दिल्ली पढ़ाई कर रहा है। मैं भी तो चाहता हूँ कि वह बड़ा होकर इंजीनियर बने। हम गाँव में पढ़े, वह दिल्ली के सबसे बढ़िया स्कूल में पढ़ रहा है। अगर गाँव में भी हालात अच्छे होते, तो वह वहीं पढ़ रहा होता। आज मैं उसकी पढ़ाई पर पाँच से दस हज़ार रुपये खर्च कर रहा हूँ, वहाँ पाँच सौ या हज़ार में हो जाता। मुझे इतना कुकर्म करने की ज़रूरत भी नहीं होती।

खैर, अब तो ऐसा नहीं हो सकता। लेकिन दुःख होता है कि आखिर वे लोग जिन्हें गाँव के जीवन का ज्ञान नहीं है, वे किस प्रकार देश की नीति को निर्धारित करेंगे। क्या उनमें वह संवेदनशीलता, दूरदर्शिता रहेगी? अगर मेरा बेटा कल इंजीनियर या आईएएस बन जाता है, तो क्या वह ग्रामीण जीवन के बारे में निर्णय लेने में इन चीजों का ध्यान रख पाएगा।

शायद नहीं!

उसे गाँव की समस्याओं, अभाव, लोगों की उम्मीदों का स्वाभाविक ज्ञान नहीं होगा। वह केवल सुनी-सुनाई बातों पर ही निर्णय लेगा। आगे का समय अधिक खराब न हो, इसके लिये कुछ-न-कुछ करना होगा। अब मेरा भी वक्त आ गया है। मंत्री जी भी सही आदमी लगते हैं, अब हम कुछ न कुछ ज़रूर करेंगे।

अब सोचने वाली बात है.. यूनिक आईडेंटीफिकेशन नम्बर बनाया जा रहा है। क्या भारत में इसकी वाकई ज़रूरत है? मैं तो समझता हूँ कि कुछेक मेट्रो को छोड़ इसकी कतई ज़रूरत नहीं है।

हम देखा करते थे...गाँव में किसी व्यक्ति के नाम और उसके गाँव के नाम पर उसकी पूरी पहचान और खानदान बता दिया जाता था। कितनी बेकार सोच हो गई है- हम कहते हैं कि जाति प्रथा को खत्म करो। यह सही है। लेकिन जो उसके गुण थे... उसे तो हमें सीख लेना चाहिए। ब्राह्मण लोग केवल पूजा पाठ या पोंगापंथी ही नहीं करते थे, उनके पास गाँव का पूरा रिकार्ड होता था। वे गाँव-गाँव जाते थे। उनकी यादाश्त काफी तेज होती थी। कोई भी धोखा खा जाये। दरअसल वे उनका अलग अलग पारिवारिक रिकार्ड रखते थे। उनके इस ज्ञान का इस्तेमाल किया जा सकता था। हम केवल खुद को फायदा पहुँचाने के बारे में सोचते हैं।

यूआईडी से केवल पढ़े-लिखे लोगों को फायदा मिलेगा। यह प्रोसेस है; स्थायी नहीं हो सकता है। क्यों नहीं हम इसकी जगह हर गाँव में कुछ युवाओं की टीम तैयार करें जो वेबसाइट बनाने की कला सीखें। जो ना सिर्फ वेबसाइट बनाये बल्कि उसे हमेशा अपडेट भी करता रहे। वेबसाइट में गाँव के बारे में, उसमें घर घर के सदस्यों के बारे में, चल रही सरकारी योजनाओं के बारे में जैसे कई महत्वपूर्ण जानकारी फोटो सहित उपलब्ध हो। जब भी कोई उस गाँव के बारे में जानकारी लेना चाहे तो वह एक क्लिक पर उपलब्ध हो। चुनाव पहचान पत्र व पैन कार्ड की सफलता हम देख चुके हैं। अगर पुलिस को किसी तरह की जानकारी चाहिए तो वह बेबसाइट के ज़रिये तुरंत हासिल कर सकता है। केवल उसका नाम और गाँव का नाम टाइप करना होगा। इसकी चर्चा मैं अपने दोस्त विकास से करूँगा। वह कम्प्यूटर प्रोफेशनल है। शायद यह आइडिया बेहतर हो।

ऐसा करना संभव हो सकता है तो केवल हमें गाँव-गाँव कम्प्यूटर लिटरेट तैयार करने होंगे। इससे गाँवों तक ना सिर्फ टेक्नोलोजी पहुँचेगी बल्कि रोजगार भी पहुंचेगा और गर्वनेस का एक नया अध्याय भी जुड़ेगा।


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