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ISSN 2292-9754

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08.20.2014


48.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मनीष आज ऑफिस आने से पहले नेहरू प्लेस चला गया, क्योंकि कल उसके बॉस विजय ऑफिस आ जायेंगे। करीब दो बजे वह ऑफिस पहुंचा तो गेट पर ही बिहार वाला लड़का मिल गया। पिछले कई दिनों से विजय बाबू इसे तलाश रहे थे। उसे देखकर पहले मनीष ने उससे कुशलक्षेम पूछा। फिर फर्स्ट फ्लोर के मंत्री कार्यालय में ले जाकर उससे विशेष बातचीत शुरू की।

मनीष ने पूछा, "काफी दिनों बाद आप ऑफिस आये हैं। विजय सर आपको खोज रहे थे। अच्छा आपका नाम क्या है?"

"मेरा नाम राजीव है। भला वे मुझे क्यों खोजेंगे? आपको मालूम है कि मैं गेट पर कितनी देर से खड़ा था।"

"क्यों क्या बात हो गई?"

राजीव ने कहा, "यहाँ हर जगह दिखावा है। जब आप सामने रहते हैं, तो कोई आपसे बात नहीं करेगा। आपके पीछे आप के बारे में लोग बात करेंगे।" मनीष को यह बात समझ में नहीं आई। ‘क्या मतलब’, उसने तुरंत पूछा।

राजीव ने कहा, "विजयजी देश को चला रहे हैं। मंत्री कार्यालय में बड़े बाबू हैं। भला वे मुझे क्यों खोजेंगे।"

मनीष, "आप तो काफी नाराज दीख रहे हैं। मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ। वाकई वे आपको खोज रहे हैं।"

राजीव, "चलिए मान ली आपकी बात। सब कुछ यहाँ उल्टा-पुल्टा है। वास्तविकता कुछ और है। आप जानते हैं अमरीका में क्या होता है जैसे-जैसे आदमी का ओहदा बड़ा होता जाता है, वह ऊपर की मंजिल पर बैठने लगता है। भारत में कम ओहदे वाले ऊपर सिर पर और ऊँचे ओहदे वाले पैरों तलें रहते हैं।"

"मतलब," आश्चर्यचकित होकर मनीष ने पूछा।

राजीव, "देखिए, यहाँ कैबिनेट मंत्री फर्स्ट फ्लोर पर राज्य मंत्री सेकंड फ्लोर पर और बड़े अधिकारी उसके ऊपर और सेक्शन के आदमी सबसे टॉप फ्लोर पर। क्यों यह सही है कि नहीं।"

दोनों ठहाका मार कर हंस पड़े।

मनीष ने कहा, "हाँ ऐसा तो है, राजीव जी।"

राजीव ने अपनी हंसी रोकते हुए कहा लेकिन अमरीका में ऐसा नहीं है। वहाँ ऊँचे ओहदे वाले ऊपर और नीचे ओहदे वाले नीचे बैठते हैं। समझे?"

मनीष ने उत्सुकतरवश पूछा, "अच्छा आपको कैसे पता चला। आप वहाँ गये हैं क्या?"

"नहीं, मैं नहीं गया हूँ। मैं क्यों जाऊँ? हमें तो यहीं रहना है। मैं जाऊँगा तो विदेश मंत्री के तौर पर वरना नहीं जाऊँगा।" राजीव ने जबाव दिया।

"भगवान ऐसा ही करें। आप तो बहुत ही ऊँची उड़ान के बारे में सोच रहे हैं।"

"सोचने में क्या बुराई है? यहाँ लोकतंत्र है। कोई भी व्यक्ति कुछ भी बन सकता है। आप भी मंत्री बन सकते हैं। बन जाओगे तो, ये सभी अधिकारी आपके आगे-पीछे दौड़ेंगे जो आज आपको दौड़ा रहे है।" राजीव खुद-ब-खुद बोलता गया।

मनीष, "अरे भाई, चना के झाड़ पर नहीं चढ़ाओ। मुझे नौकरी करनी है। आम आदमी हैं। आम आदमी की तरह रहना चाहते हैं।"

राजीव, "देखो, मैं गलत नहीं बोल रहा हूँ। यहाँ कुछ भी संभव है। आप नेताओं के इतिहास पर एक नजर डालिए। कोई कंडक्टर था; बस पर पैसा वसूलते-वसूलते पार्टी के लिए पैसा तलाशने लगा। कोई पुलिस में काम करता था; अनुशासन तोड़ पार्टी की पुलिसिंग करने लगा है। किसी ने नौकरी छोड़ पार्टी खड़ी कर ली, अब पूरे प्रदेश की सत्ता उसके हाथों में है।"

मनीष, "आप बड़ी गहरी समझ रखते हैं। क्या आपने पीएचडी किया है?"

राजीव, "नहीं भाई, मैंने पीएचडी नहीं की है। अगर किये रहता, तो नौकरी मांगने थोड़े ही आता। हाँ, पढ़ता-लिखता रहता हूँ। अगर मौका मिलेगा, तो कुछ ज़रूर करूँगा। आदमी को हमेशा पढ़ते-लिखते रहना चाहिए।"

मनीष, "हाँ सही कह रहे हैं। ज्ञान कभी भी बेकार नहीं जाता है। यह किसी न किसी रूप में काम आ ही जाता है।"

राजीव ने बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा, "हम यहाँ नौकरी की तलाश में आए हैं। शायद आपके विजय सर कोई नौकरी दिलवा दें। वह कैसे आदमी हैं? मैने सुना है कि वे केवल पैसा लेने पर ही कोई काम करते हैं।"

"नहीं, नहीं। बड़े भले आदमी है। हाँ अगर पैसा मिल रहा है, तो क्या दोष। यह तो मंत्री ऑफिस है, यहाँ पैसों का क्या मोल है?"

"महाराज! आपने भी बनाया है क्या कुछ पैसा।"

"क्या बात करते हैं, हम जैसे छोटे लोगों का क्या मोल? हम लोग खेत की मूली के समान हैं।"

"क्या बात कर रहे हैं? आप चाहें, तो हर दिन हजारों रुपया कमा सकते हैं। अब देखिए न! सिक्यूरिटी वाला हमें गेट के अंदर आने नहीं दे रहा था। वह तो आप मिल गए, इसलिए आ गया। गेट पर कुछ पैसा दे देते तो आने देगा। वरना नहीं।"

"किस तरह की बात करते हैं? गेट पर पास बनता है। इसके बाद ही कोई अंदर आ सकता है।" मनीष बोला।
राजीव, "वही तो कह रहा हूँ। महाराज, उसी में पैसा बना लीजिए। वरना ऐसे ही रह जाइयेगा। और दूसरा तरीका है साहब लोगों तक फाइल बढाने में देर कर दीजिए। अपने आप लोग पैसा देना शुरू कर देंगे।"
"आप हमको मरवा दीजिएगा। हमको काम करने दीजिए। हम ऐसे ही ठीक हैं। घर-परिवार का पेट भर रहा है। इतना काफी है।"

"चलिये आपकी मर्जी, मैं तो केवल आपसे अपने अनुभवों को शेयर कर रहा था। आगे आप सोचिये। हाँ अगर हो सके तो विजय बाबू से कहकर हमको कोई नौकरी दिलवा दीजिए। अगर पैसा लेंगे तो वह भी दे देंगे। अब आप ही देख लीजिए उनके ससुर का सिफारिश लेकर आया था। उसके बावजूद वे मेरा काम नहीं कर रहे हैं। आप मेरे ऊपर ध्यान रखिएगा।"

"यह ठीक है। कल विजय जी आ रहे हैं। आप परसों 3 बजे आ जाइये। मैं आपको मिलवा दूंगा। ठीक है न।"

राजीव ने हाँ कहा और चल दिया।


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