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ISSN 2292-9754

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08.20.2014


47.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

शाम के आठ बजे हैं। वरुण टीवी पर न्यूज देखने में मशगूल है। भाजपा में मचा घमासान। सभी चैनल्स पर बार-बार एक्सक्लूसिव टैग के साथ यह लिखा हुआ आ रहा है। वह सोचने लगता है कि अरुण सही बोलता है कि मीडियावाले भाजपा के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। वह सोच ही रहा है कि दरवाजे की घंटी बजती है। वरुण दरवाजा खोलने जाता है। सामने अरुण को खड़े देखकर बोल पड़ता है- यार, तुम ठीक कहते हो, मीडिया वाले भाजपा के पीछे पड़े हुए हैं। सत्ता धारी दल होने की बजाय विपक्ष में है भाजपा। फिर भी हर दिन खबरों में रहती है। क्या ज़रूरत है उस पर इतना अधिक फोकस करने की। सरकारी अमलों में न्यूज की भरमार है। कई मुददे हैं, जिस पर मीडिया को सारे देश में बहस करानी चाहिए, लेकिन उससे मतलब ही नहीं है। उसे अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए मसाला चाहिए। और यह मसाला मिलता है उन्हें भाजपा में।

अरुण ने खुश होते हुए कहा, "लगता है तुम्हें अब मेरी कही गई बात समझ में आ गई है। पहले तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं होता था।"

"हाँ यार, मैं भी अब सुनते-सुनते थक चुका हूँ। मैं कल अपने ऑफिस में भाजपा कवर करने वाले रिपोर्टर से बात कर रहा था। मैंने बातों ही बातों में उनसे पूछा कि आजकल भाजपा में क्या-कुछ चल रहा है? जानते हो उसने क्या जवाब दिया- अरे क्या बताऊँ उस पार्टी में घमासान मचा हुआ है। वहाँ सभी अपनी डफली अपना राग अलाप रहे हैं।"

"इसे मैं सोलहों आने सही नहीं कह सकता हूँ। भाजपा एक संगठित पार्टी है। इसमें कांग्रेस पार्टी की तरह उत्तराधिकारी पहले से तय नहीं रहता है। यहाँ हर नेता को अपनी दावेदारी पेश करने का अधिकार है। यदि दल का कोई नेता ऐसा करता है, तो सामने वाले को लगता है कि वह दूसरे की कब्र खोद रहा है। यदि पार्टी में लोकतंत्र है, तो नेता को अपनी बात रखने का अधिकार है। जब नेता अपनी बात रखते हैं, तो मीडिया वालों को लगता है कि वे स्वार्थवश केवल अपना मौका तलाश रहे हैं।"

"हाँ यही बात है। वे पार्टी फोरम में अपनी बात रखते हैं और मीडियावाले उसे दूसरे अंदाज और अर्थ में पेश करते हैं। कहीं यह भाजपा के मीडिया मैंनेजमेंट का फेल्योर...तो नहीं है!"

सशंकित अरुण ने जबाव दिया, "हाँ ऐसा हम कह सकते हैं। मुझे भी कभी-कभी ऐसा लगता है। हम कल की ही बात ले सकते हैं। किस चतुराई से कांग्रेस वालों ने अपने मुद्दे को बहस या फिर टीवी की एक्सक्लूसिव खबर बनने से रोक लिया!"

"कौन-सा मुद्दा?", वरुण ने पूछा।

"पिछले दिनों कांग्रेस के एक सांसद ने बैंक अधिकारी को थप्पड़ जड़ दिया। इस बात का भाजपा जोरदार तरीके से विरोध कर रही थी। यह मामला तूल न पकड़ ले, इस कारण सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम चार रुपये बढ़ा दिए। इससे लोगों का ध्यान तुरंत इस ओर चला गया।"

"इस बात का सांसद के थप्पड़ मारने से क्या संबध हो सकता है?"

"बहुत बड़ा संबंध है। अब अगर सांसद की दादागिरी का मुद्दा जनता के बीच चला जाता है, तो यह काफी भावनात्मक साबित हो सकता है। राहुल गाँधी की आम लेागों के बीच जो रहनुमा की छवि बन रही है, वह धूमिल हो सकती है। इस खबर को दबाने के लिए पेट्रोल की मूल्य वृद्धि कर दी गई।

यह सोचने वाली बात है कि आखिर इतनी जल्दी पेट्रोल का दाम बढ़ाने की क्या ज़रूरत थी? जबकि संसद का सत्र दूसरे दिन ही शुरू होने वाला था। कोई भी सरकार विपक्ष को सदन में हावी होने का मौका नहीं देना चाहती है।"

"हाँ, तुम्हारी बात में दम है।"

"यह तो केवल एक उदाहरण है। कई बार मैंने ऐसा भी देखा है कि कांग्रेस के पॉजिटिव न्यूज के साथ भाजपा की नाकारात्मक खबर एक कॉलम में लगा दी जाती है, ताकि पार्टी की छवि खराब हो।"

"वाह! तुम तो सभी खबर पर नजर रखते हो। तुम्हें इन सबकी क्या ज़रूरत है?"

अरुण ने बताया, "मैं पिछले कई वर्षों से ऐसा देख रहा हूँ। तुमको बता दूं कि इसका काफी असर पड़ता है। शहरों में भाजपा की अच्छी पकड़ थी। लेकिन अब देखो क्या हाल हो रहा है? शहरों में भी उनका जनाधार सिमटता जा रहा है। दिल्ली में तो भाजपा की हार के बारे में पहले किसी ने सोचा तक न था।

"अरे यार कैसी बात करते हो। वी के मल्होत्र को जब से चीफमिनिस्टर के रूप में प्रोजेक्ट किया गया था, तभी से भाजपा की हार की भविष्यवाणी कर दी गई थी। यहाँ के लिये अरुण जेटली ठीक रहते। वे शीला दीक्षित के सामने मजबूत दावेदार थे। संभव था, वह सरकार बना लेते। लेकिन राष्ट्रीय महत्वकांक्षा के कारण उन्होंने ऐसा करना उचित नहीं समझा। यह सबसे बड़ी भूल थी। उन्हें दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं करना, भाजपा की हार में महत्वपूर्ण साबित हुआ।"

"वह कैसे?" अरुण ने पूछा।

"अगर जेटली जी दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी होते, तो निश्चित तौर पर भाजपा की सरकार बनती। यहाँ की जनता, कांग्रेस की सरकार से त्रस्त आ चुकी थी। वे बदलाव चाहते थे, लेकिन वे सशक्त और ऐसा व्यक्ति, जो सही दिशा दे सके उसकी उन्हें तलाश थी। जनता ने मल्होत्रा में ऐसे गुणों का अभाव पाया।"

"अरे अरुण जेटली राष्ट्रीय नेता हैं। उन्हें इस मोर्चे पर लगाना उचित नहीं होता।"

"भाजपा में इसी बात की गलतफहमी हो गई। कोई राष्ट्रीय नेता है। कोई यह पदवी पाने को बेताब है। कोई राष्ट्रीय नेता का तमगा पाने के लिए पैरवी कर रहा है, तो कोई दूसरे से करवा रहा है।

मैं तुम्हें बता दूं। अगर भाजपा दिल्ली में नहीं हारी होती, तो लोकसभा में उसका अच्छा प्रदर्शन होता। सरकार भी बना लेती। दिल्ली में चुनाव जीतने पर कुछ अलग ही बात होती। पूरे देश की नजर गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान की बजाय दिल्ली पर टिकी हुई थी। इसका मनोवैज्ञानिक असर नेताओं के साथ-साथ कार्यकर्ताओं पर भी हुआ।

"हाँ, कुछ हद तक तुम ठीक कहते हो। आडवाणी जी में सभी गुण थे। अगर उन्हें व्यक्तिगत तौर पर देखा जाए, तो उनमें कोई अवगुण नहीं है। वे जिस मर्यादित ढंग से कार्य करते हैं, वह अनुकरणीय है। जिन्ना विवाद को छोड़कर उनका जीवन बेदाग है। वास्तव में जिन्ना को सेक्यूलर बताकर उन्होंने अपनी छवि बदलने की कोशिश की थी। सही मायने में उन्होंने राजनीति में कई आयाम जोड़े हैं। इस बार भी उन्होंने डिजिटल डेमोक्रेसी की नींव रखी। मैंने इस विषय पर एक आर्टिकल लिखा था- वह तुम्हें दिखाता हूँ।

डिजिटल लोकतंत्र की ओर बढ़ता भारत?

आजकल आप किसी भी साइट को क्लिक करते हैं, तो भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी की साइट सामने आ जाती है। भाजपा का यह डिजिटल प्रेम भारत के लोकतंत्र को नई दिशा दे सकता है। ऐसी संभावना जताई जा रही है। हालांकि इंटरनेट, मोबाइल व अन्य गैजेट्स का उपयोग अपनी बातों को मतदाताओं तक पहुँचाने के लिए किया जा रहा है, लेकिन पार्टियों के बीच इसके असर को लेकर मतभेद है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी इसे लेकर काफी उत्साहित हैं और न सिर्फ वेबसाइट, बल्कि कैंपस, ब्लॉग, ऑरकुट, फेसबुक जैसे सभी मौजूद आधुनिक तकनीक में पार्टी के प्रचार की वे संभावना तलाश रहे हैं, ताकि मतदाताओं के साथ सीधा संवाद पैदा किया जा सके।

हमारे यहाँ दो तरह के मतदाता होते हैं। एक वे जो हर हालात में पार्टी के प्रति समर्पित होते हैं। वे उसी पार्टी को वोट देते हैं, जिसकी विचारधारा से उन्हें लगाव होता है। दूसरे वे मतदाता हैं, जिन्हें पार्टी के सिद्धान्त व विचारधारा से बिल्कुल लगाव नहीं होता है। वे किसी भी पार्टी की ओर जा सकते हैं। वास्तव में इनकी संख्या ही अधिक है। लिहाजा, पार्टियाँ इन्हें लुभाने के लिए ’इन्फॉर्मेशन कैपिटल’ का इस्तेमाल करती हैं। वह विरोधियों को ध्वस्त करने के लिए किसी भी सूचना का इस्तेमाल अपनी इच्छा अनुसार कर सकती है। यहाँ तक कि इस फेर में वह दल कभी-कभी दुरूपयोग करने से भी नहीं हिचकिचाता है।

शायद यही वजह है कि शहरी आधार वाली भाजपा को शहरी वर्ग के रवैये व व्यवहार के अनुसार, प्रचार को केंद्र में लाना पड़़ ऱहा है। इसका मकसद सिर्फ मतदाताओं तक पहुँचना नहीं है, बल्कि शहरी क्षेत्रों में घटते जनसमर्थन को भी रोकना है। दिल्ली विधान सभा चुनाव 2008 में भाजपा का खराब प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि भाजपा को शहर में अपनी जमीन बचाने के लिए उनके सामने अपनी बातों को पहुँचाना ही होगा।

इंडिया शाइनिंग को अपनी गलती बताने वाले आडवाणी चुनाव में प्रचार के तौर तरीकों को बदलने के लिए तैयार हैं। वे जानते हैं कि शहर के लोगों के पास इतनी फुर्सत नहीं है। सच तो यह है कि वे अपने परिवार के सदस्यों से संवाद भी फोन या कम्प्यूटर के माध्यम से ही बातें कर पाते हैं। लिहाजा, आडवाणी एक तीर से दो निशाना साध रहे हैं।

भले ही लोगों को यह तरीका बिल्कुल नया लग रहा हो, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर इससे एक नई क्रांति का जन्म हो रहा है। अब तक मीडिया जनता और सरकार के बीच खाई को पाटने का एकमात्र माध्यम थी, लेकिन आडवाणी के ब्लॉग और वेबसाइट नेता और जनता के बीच सेतु का काम कर रहे हैं। हालांकि अभी इसका फायदा स्पष्ट तौर पर दिखाई नहीं दे रहा है। लेकिन यह डी लोकतंत्र (डिजिटल लोकतंत्र) का पहला कदम है, जिसे अभी मीलों लंबी दूरी तय करनी है। आज नहीं तो कल मोबाइल के समान ही कम्प्यूटर भी शहरों की सीमा पार कर गाँवों की पगडंडियों पर अपना स्थान बना पाएगा। निर्णय चौपालों में नहीं, बल्कि खेत और खलिहानों में लिए जाएँगे। और निश्चित तौर पर वोट डालने के लिए लंबी लाइन नहीं, बल्कि एक क्लिक ही काफी होगी। लोकतंत्र से डी लोकतंत्र की बात भले देर से ही सही, लेकिन इस ओर हम पहल अवश्य कर चुके हैं। राजनीति में चाहे यह बात नई हो पर विज्ञापन संस्थायें इस माध्यम व का पूरा-पूरा उपयोग सफलतापूर्वक कर रही हैं। इसके लिये प्रचार माध्यम फिल्मी हस्तियों का भी उपयोग कर रही हैं।

विपक्षी पार्टियों का यह आरोप है कि इंटरनेट की पहुँच ग्रामीण लोगों तक न के बराबर है। कुछ हद तक यह सच भी है। पर युवाओं का डिजिटल प्रेम देखते हुये ऐसा लगता है आज न तो कल यह सब राजनैतिक पार्टियों को करना ही पड़ेगा।"

"हाँ, यार यह तो बहुत अच्छी तरकीब थी। लेकिन यह समय से पहले की है। भाजपा को नई तरह की रणनीति बनानी होगी। साथ ही, यह भी ध्यान रखना होगा कि नेताओं की भी अपनी सीमा होती है। वे यदि अपने दायरे से बाहर आकर काम करेंगे तो असफल भी हो सकते हैं।"

"तुम्हारा कहने का क्या मतलब है?"

"मतलब साफ है। नरेन्द्र मोदी गुजरात में सफल रहे हैं, लेकिन वहाँ से बाहर निकलने की कोशिश करेंगे, तो वे पिट जायेंगे। क्या नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह अपने-अपने राज्यों में अच्छी पकड़ के बावजूद प्रधानमंत्री के दावेदार हो सकते हैं? कदापि नहीं, पहले भी तो सुंदर लाल पटवा, भैरो सिंह शेखावत जैसे कद्दावर नेता थे। उनलोगों ने कभी-भी प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब नहीं देखा। अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व के आगे उन्होंने अपनी बात कभी नहीं की। अभी भी ज़रूरत है कुछ ऐसा ही करने की। संघ को चाहिए कि जिस प्रकार वाजपेयी को तैयार किया गया, उसी तरह किसी नये व्यक्ति को तैयार करे, वरना पार्टी की और खराब दुर्दशा होगी।"

"हाँ, तुम ठीक कहते हो। अब छोड़ो भी! हम लोग इन सभी बातों पर बहस क्यों कर रहे हैं? बड़े-बड़े लोग हैं इस पर चर्चा करने के लिए। असल में रविवार के दिन मेरे दोस्त विजय ने इस विषय पर काफी देर तक चर्चा की थी। उसकी बातों का ही प्रभाव था कि मैं तुम्हारे यहाँ आने के साथ ही चर्चा में जुट गया। चलो अच्छा हुआ, इसी बहाने यह भी जान पाया कि जर्नलिस्ट लोग क्या सोचते हैं?"


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