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ISSN 2292-9754

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08.20.2014


46.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

साईं बाबा के मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर एक ढाबा था। विजय व वीणा ने खाने के लिए उसमें प्रवेश किया। थोड़ी देर बाद बैरा उन लोगों की सीट की तरफ आया और कई प्रकार के व्यंजन गिनाने लगा। लेकिन इन दोनों ने वहाँ के पॉपुलर डिश का ऑर्डर दिया।

ढाबे में साउथ इंडियन खाने की अधिकता थी। गरम-गरम खाने को दोनों ने खूब चटखारे लेकर खाया। सुस्वादु भोजन और लोगों की सादगी ने विजय को काफी प्रभावित किया।

"खाने में कितना स्वाद है? मुझे लग रहा है कि और खाऊँ।"

"वाकई, इस खाने का कोई सानी नहीं है। मुझे भी काफी पसंद आया। लेकिन तुम्हें ऐसा खाना कैसे पसंद आया, तुम तो सादा खाने को हाथ तक नहीं लगाते थे।"

"हाँ, यह बात मुझे भी समझ में नहीं आ रही है। मैं तो हमेशा मसालेदार खाने को ही पसंद करता था।"

वीणा हमेशा विजय को बड़े होटलों में मसालेदार खाना खाते हुए देखा करती थी। घर में भी वह हमेशा इसी तरह खाना पसंद करता था। सादा व पौष्टिक खाना उसे पसंद नहीं था।

वीणा फिर पूछी, "हम लोग घर पर भी अब से सादा खाना ही खायेंगे। क्या खयाल है?"

"हाँ, ठीक है। मैं तो सादा भोजन का स्वाद ही भूल गया था। आज वर्षों बाद खाया हूँ। हमें काफी अच्छा लग रहा है। हाँ, उससे भी बड़ी बात यह है कि इससे तृप्ति मिली। हम लोग होटलों में जो खाना खाते थे उसमें स्वाद तो रहता था और पेट भी भर जाता था लेकिन जो तृप्ति आज मिली उसका अनुभव पहले कभी नहीं हुआ।"

वीणा ने हामी भरते हुये कहा, "देखो, अंतःमन शुद्ध हो, तो इसका असर खूब पड़ता है। हमारे मन पर, खानपान, वेशभूषा, सभी पर फर्क पड़ता है।"

"तुम ठीक कह रही हो। इसे हम दूसरे रूप में भी कह सकते हैं कि मन का असर, मन के भाव ही हमारे खान पान, वेशभूषा, व्यवहार आदि निर्धारित करते हैं।"

वीणा ने आश्वस्त होने के लिये पूछा, "क्या तुम अब मांस-मछली खाना छोड़ दोगे।"

विजय ने हामी भरी और बाबा रामदेव के बारे में बताना शुरू कर दिया।

"वीणा जानती हो, मैं कुछ दिनों से बाबा रामदेव को आस्था चैनल पर देख रहा हूँ। मैनें उनको देखकर भस्तिका, कपालभाती और अनुलोम-विलोम करना शुरू भी कर चुका हूँ। लेकिन देर तक नहीं कर पाता हूँ। उससे काफी आराम मिलता है। एक रात मैं काफी परेशान था। मैं सो नहीं पाया था। सुबह टीवी खोला, तो आस्था चैनल पर बाबा रामदेव का योग-प्राणायाम प्रोग्राम प्रसारित हो रहा था। मैंने भी उनको देखकर योग करना शुरू किया। क्या बताऊँ? प्राणायाम करते ही, सभी दर्द और अशांति खत्म हो गई। हमें अब इन बातों पर ध्यान देना चाहिए। उम्र के साथ इन सभी चीजों को करना भी उतना ही ज़रूरी है, जितना कि अन्य काम।

स्वास्थ्य ही सब कुछ है यह हम लोग भूल गये हैं। बचपन में बताया जाता था –
वेल्थ इज गोन नथिंग इज गोन
हेल्थ इज गोन समथिंग इज गोन
बट कैरेक्टर इज गोन एवरीथिंग इज गोन
जिंदगी की भागमभाग में हम लोग सब कुछ भूल गये हैं।

"यह तुम सही कह रहे हो। दिखावा हावी है। हम लोगों को महात्मा गाँधी की बात याद रखनी चाहिए। देयर इज एनफ ऑन अर्थ फॉर एवरीबॉडीज़ नीड, बट नॉट एनफ फॉर एनीबॉडीज़ ग्रीड।

"यस यू आर राइट। हमें कितना पैसा चाहिए। अपनी ज़रूरतों के लिये बहुत कम। अब देखो 15 हज़ार हम लोग गाड़ी के लिए खर्च कर रहे हैं। 9 हज़ार की किस्त और 6 हज़ार का पेट्रोल। इसकी क्या ज़रूरत है? हम लोग सैलरी का 10 फीसदी भी खाने-पीने या ज़रूरत की चीजों पर खर्च नहीं करते हैं। हमें पैसा चाहिए इसलिये कि दिखावा बरकरार रहे।

और यह दिखावा हम किसके सामने करते हैं। दूसरों को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि आपके पास कितना पैसा है और कितने मकान। घर में सोफा या डिजाइनर डिनर सेट है या नहीं ---यह सब हम अपने नजदीकी रिश्तेदारों को दिखाते हैं। नतीजा क्या निकलता है, उनसे हम दूर होते चले जाते हैं। अजीब विडंबना है, जिनको हम इम्प्रेस करना चाहते थे, उन्हें इम्प्रेस करना तो दूर अब उनसे मुलाकात भी नहीं हो पाती है। हम लोग मैड रेस में शामिल हो चुके हैं। हमें इसे बदलना होगा। लोगों को जीवन से शांति खत्म होती जा रही है। और लोग केवल दौड़ रहे हैं। बगैर यह सोचे कि क्या हासिल होगा।"

"यह सामाजिक प्रक्रिया है। यही बाजारवाद है। हम सभी चीजों का उपभोग करना चाहते हैं। यह चक्र चलता रहता है और चलेगा।"

"नहीं यह ठीक नहीं है। हम केवल एक चीज के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिये करोड़ों रुपये खर्च कर देते हैं। क्या हम जीवन के यथार्थ को जानने के लिए जागरूकता अभियान नहीं चला सकते हैं। इसमें धर्म का कुछ भी लेना-देना नहीं हैं। जीवन के मूल्य धर्म के मूल्य से अलग हैं। हमें इसे समझना होगा। धर्म को भले ही सरकार ने अछूत कर दिया हो, लेकिन यथार्थ यह है कि धर्म ही जिन्दगी है। इससे जीवन, समाज, राष्ट्र रेगुलेट होता है। गरीबी के लिए सरकार दोषी है, धर्म नहीं। बल्कि धार्मिक प्रवृत्ति के कारण ही भारत के गरीब लोग पत्थर तोड़ते हुए भी शांत भाव से सबकुछ सहते जाते हैं।

क्या यूरोप या पश्चिमी देशों के गरीब यह सब बर्दाश्त कर लेंगे? वहाँ हिंसा हो जायेगी। यहाँ हिंसा गरीबी की वजह से नहीं बल्कि अमीरी की वजह से है। अमीर अपनी अमीरी को बरकरार रखने के लिये गरीबों की रोटी को भी छीनने से बाज नहीं आ रहा है।"

वीणा ने हामी भरी, "हाँ तुम ठीक कह रहे हो। अब हमें यहाँ से चलना चाहिए क्योंकि ट्रेन पकड़ने का समय हो गया है। चलो अब बाद में बात करेंगे।"


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