अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
08.20.2014


45.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

आज दिन भर राधा अपनी दोस्त रानी के साथ विविध विषयों पर बातें करती रही। रानी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने लगी थी। राधा भी उसकी तरह बोलना चाहती है। हालांकि राधा को ग्रामर का ज्ञान अधिक है, फिर भी वह बोलने में संकोच करती है। अब वह बोलने की प्रैक्टिस करना चाहती है। रानी भी प्रोत्साहित करती है। राधा को यह बात अच्छी लगती है। वह यह सोच कर कभी-कभी आश्चर्यचकित होती है कि आखिर रानी मेरी इतनी मदद क्यों करती हैं?

उसे अब तक उन महिलाओं से ही पाला पड़ा था, जो स्वभावतः इर्ष्यालु होती हैं और दूसरों की मदद करना नहीं चाहती हैं। गाँवों में ऐसी स्वभाव वाली महिलाएँ कुछ अधिक मिलती हैं। लिहाजा राधा पहले रानी के बारे में भी ऐसा ही सोचती थी। रानी का स्वभाव देखकर वह सोच रही है कि शायद शहरी महिलाएँ ऐसी नहीं होती हैं। यहाँ पढ़ लिखकर लोग आगे बढ़ना चाहते हैं न कि एक-दूसरे की टांग खींचना।

जब मनीष घर आया, तो राधा ने उसके सामने अपना विचार रखा। राधा ने सोचा कि शायद मनीष उसे समझने में मदद करेगा। लेकिन मनीष के पास महिलाओं का ज्ञान कम था। उसने इसके लिये दो प्रकार के विचार रखे।

"शायद तुम उसके बेटे को पढ़ाती हो और बेटी को डांस सीखने में मदद करती हो, इस कारण से उसका तुमसे लगाव हो।"

राधा बोली, "शायद ऐसा हो सकता है।"

"तुम उससे पूछ क्यों नहीं लेती हो?"

"बेअकल की बात करते हो। क्या ऐसी बातें भी पूछी जाती हैं? क्या आपको कुछ भी व्यावहारिक ज्ञान नहीं है?"

इन बातों को सुनकर मनीष ने अपना मुंह फेर लिया। वह बोला मैं इसके बारे में अपने दोस्त संजीव से पूछूंगा। उसके बाद तुम्हें बताऊँगा। वह महिलाओं के बारे में अच्छी जानकारी रखता है।"

"रहने भी दो। तुम हमेशा इसी तरह की बातें करते हो। कभी-कभी अक्ल से भी काम लिया करो। हाँ, क्या तुमने कम्प्यूटर का कुछ पता किया।"

"हाँ, पता किया है। नेहरू प्लेस में केवल कम्प्यूटर का ही करोबार होता है। वह एशिया का सबसे बड़ा बाजार है।"

"हाँ, मैंने भी रानी से बात की थी। उसका भी कम्प्यूटर नेहरू प्लेस से ही आया था। ‘असेम्बल्ड’ क्या होता है?"

"बाजार में दो तरह के कम्प्यूटर मिलते हैं। एक ऐसा जो कंपनी द्वारा तैयार किया जाता है। इसे ब्रैंडेड कम्प्यूटर कहते हैं। दूसरे तरह के कम्प्यूटर वे हैं जिनके अलग-अलग पार्ट्स खरीदकर तैयार किये जाते हैं। वह असेम्बल्ड कहलाता है। इसमें पैसा भी कम लगता है।

 भी इंतजाम हो गया है। ऐसा है कि जो हम कमिटी में जमा करने के लिए पैसा देते हैं उसे मैं अगले महीने ले लूंगा, उससे करीब तीस हज़ार रुपये मिल जायेंगे, 23-24 हज़ार में अच्छा कम्प्यूटर आ जायेगा।"

"ये कमिटी क्या होती है? क्या तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं? हम दूसरे लोगों का पैसा; कर्ज लेना पसंद नहीं करते हैं।"

मनीष ने समझाया "नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं है। वह पैसा मेरा ही है। हम कुल बीस लोग हैं। हर महीने हमलोग डेढ़ हज़ार रुपये जमा करते हैं। जिसे जब ज़रूरत पड़ती है, वह पैसा ले लेता है।"

"अच्छा ठीक है। लेकिन ध्यान रखना हमें कर्ज नही लेना है। मेरी दादी कहती थी - कर्ज लेनेवाले के घर का नाश हो जाता है।"

मनीष ने उसकी भावनाओं को समझते हुए कहा कि हाँ भाई, यह कर्ज नहीं है। तुम बेकार की बातें मत सोचो।

"ठीक है फिर, हम कल चलेंगे कम्प्यूटर खरीदने।"

"नहीं, कल नहीं। नेहरू प्लेस यहाँ से काफी दूर है। हम लोग अगले रविवार को चलेंगे।"

"तुम हमेशा अगले रविवार कहकर टाल देते हो। क्या सात दिनों का कोई मोल नहीं है। अगर चार हज़ार रुपये भी महीने का कमाऊँ तो एक सप्ताह का हज़ार रुपया हो जाता है।"

"ठीक है, इस रविवार को ज़रूर कम्प्यूटर ले आयेंगे।"

दरअसल, मनीष ने भी कम्प्यूटर खरीदने का मन बना लिया था। क्योंकि उसके दोस्त संजीव ने कहा था कि महिलायें बहुत फरमाइश करती हैं। लेकिन राधा ने तो अब तक सिर्फ एक ही मांग की है और वह भी कम्प्यूटर। भले ही वह मंहगा हो लेकिन है काम का चीज। वह आगे की सोच रही है। हमें भी इसे खरीद लेना चाहिए।

ठीक है, अगर नौकरी नहीं भी करेगी तो कम से कम उसमें व्यस्त रहेगी। वैसे भी खाली मन शैतान का घर होता है। सीखना बुरी बात नहीं है। हम भी कुछ सीख लेंगे। आज के समय में कम्प्यूटर का ज्ञान काफी ज़रूरी है। बगैर इसके अब कुछ संभव नहीं है। इस रविवार को ज़रूर ले आऊँगा। खरीदने के पहले कुछ और जगहों का हम सर्वे कर लेते हैं ताकि ठगा नहीं जायें। कल ऑफिस जाते ही संजीव से पूछूंगा, वह तो दिल्ली का रहनेवाला है। उसे सब कुछ पता होगा। ऐसे भी वह तेजतर्रार है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें