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ISSN 2292-9754

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08.20.2014


42.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

अरुण और वरुण हर दिन मिलते हैं। दोनों में दोस्ती की खास वजह है कि वे दोनों एक-दूसरे की ज़रूरत पड़ने पर मदद करते हैं। साथ ही, वे दुनिया के बारे में बातें कर अपनी भड़ास निकालते हैं।
अरुण ने वरुण से पूछा, "क्या बात है वरुण, क्या पत्रकारिता भी बिक चुकी है? तुम तो इस क्षेत्र में काम करते हो, खबरें पढ़ने में आजकल कुछ मजा नहीं आता है।"

"देखिए अरुण जी, गिरावट आती है तो सभी जगह आती है। ऐसा नहीं है कि एक जगह आई, तो दूसरा अछूता रह जाए। यह भूल जाइए कि हर क्षेत्र खुद में इंडिपेन्डेंट है। वास्तविकता यह है कि सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।" वरुण अपनी बात आगे बढा़ते हुए कहता है – "जरा सोचिये, सभी न्यूज चैनलों में ऊपर के ओहदे पर कौन बैठा है? इससे आपको पता चल जाएगा। आप पाएँगे कि चैनलों पर आम आदमी का मालिकाना हक विरले ही है। सभी के ताल्लुकात बड़े घरानों से है। दूसरा-चैनल चलाने के लिए इतना पैसा कहाँ से आता है आपने कभी सोचा है? नहीं न! फिर जो लोग इसमें पैसा लगाएँगे वे अपनी मनमानी तो करेंगे ही। लेकिन फिर भी मैं आपको बता दूँ, इलेक्ट्रानिक चैनल वाले की वजह से समाज में काफी सुधार आया है क्योंकि उनमें प्रतिस्पर्धा की वजह से खबर दिखानी पड़ती है। अगर उन्हें अपनी विश्वसनीयता बचाकर रखनी है।"

"हाँ, वरुण वह तो तुम ठीक कह रहे हो। पत्रकारिता की वजह से फर्क तो पड़ा है। पहले जो हम महीनों तक नहीं जान पाते थे, अब तुरंत हमें जानकारी मिल जाती है।"

ण ने कहा कि आगे बहुत कुछ किया जाना बाकी है। नहीं तो यहाँ भी सब कुछ बेकार हो जाएगा। पहले पत्रकारिता में वे लोग आते थे जिनका उद्देश्य समाज सेवा होता था, अब ग्लैमर की वजह से इसमें ज्यादातर लोग आ रहे हैं, जिनकी रुचि समाज को जागरूक बनाने में कम है और पैसा व प्रसिद्धि पाने में अधिक है। बस अंधेरे में तीर चलाते जाइए, निशाने पर लग गया तो ठीक है।

"हाँ, वरुण यह तो ठीक है। मीडिया के लोग अपनी बातों को इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि लगता है कि सब कुछ ठीक ही कह रहे हैं।

मैं तो भाजपा से जुड़ी सभी खबरों को देखता हूँ। ऐसा लगता है कि खबरिया चैनल के पास जानकारी होती ही नहीं है। वह केवल कनफ्लिक्ट दिखाने में लगे रहते हैं। राजनाथ कैम्प, आडवाणी कैम्प, वाजपेयी कैम्प पता नहीं और क्या क्या।"

"देखो यह कुछ हद तक सही हो सकता है लेकिन पूरी तरह नहीं। पार्टी में नेताओं की एक ऐसी जमात होती है, जिनकी एकमात्र कोशिश मीडिया कवरेज पाने की होती है। वे मीडिया को अपनी तरह से इस्तेमाल करते हैं।"

"अच्छी बात है, तुम मीडिया में हो, इसलिए उसका साथ देना लाजिमी है।"

"नहीं ऐसा इसलिए नहीं कह रहा हूँ, बल्कि आज के भाजपा की यही स्थिति है। अगर भाजपा इस अन्तर्प्रतिस्पर्धा और अन्तर्कलह के चक्रव्यूह से नहीं निकलती है, तो उसका आगे का भविष्य ठीक नहीं है।"

"वरुण तुम यह किस आधार पर कह रहे हो। क्या तुम्हें इसका अनुभव है? तुम तो भाजपा को कवर नहीं करते हो, फिर भी ऐसा बोल रहे हो। क्योंकि मीडिया में ऐसी खबरें आ रही हैं।"

"हाँ, मैं तुमसे सहमत हूँ, मीडिया से खबरें आ रही है। हमें इस पर विश्वास करना होगा, अरुण हम सभी जगह खुद-ब-खुद तो नहीं जा सकते हैं। हमें विश्वास तो करना ही होगा।"

"विश्वास करने से इंकार नहीं कर रहा हूँ। लेकिन तुम बता सकते हो कि भाजपा के नेताओं ने पाँच सालों में सिर्फ आपस में लड़ने के अलावा कुछ भी नहीं किया है। वे केवल लड़ते रहे और सब कुछ होता चला गया। ऐसा नहीं है। इतनी बड़ी पार्टी ऐसे नहीं चलती है!"

वरुण ने कहा, "तुम्हारी पार्टी के नेताओं में एक कमी है। वे पार्टी के भीतर की बातों को भी मीडिया के सामने रखने में जोर देते हैं। अब देखो, कोर टीम की मीटिंग होती है, तो वह सब वर्ड टू वर्ड मीडिया में आ जाता है। क्या तुमने सोचा है, ऐसा कैसे होता है?"

अरूण बोला, "ऐसा इसलिए है कि भाजपा पारदर्शिता में विश्वास करती है। हमारी पार्टी का सिद्धांत है - अपनी बातों को बेबाकी से लोगों के सामने रखना। हमें मीडिया की खबरों में पहले जगह नहीं मिल पाती थी, लेकिन वाजपेयी जी की वाकपटुता और बेबाकी की वजह से मीडियावालों को उनकी बातों को छापना पड़ता था।"

वरुण ने टोका, "ठीक है, भाजपा सिद्धांत वाली पार्टी है। लेकिन अब पार्टी कम और व्यक्ति विशेष की खबरें अधिक आती है। पार्टी का हर नेता अपनी खबर छपवाने में लगा है। पार्टी के सिद्धांत कांग्रेस से आज किस प्रकार अलग हैं? हमलोग भी यह नहीं समझ पाते हैं। आम आदमी के बारे मे सोच सकते हो।"

"देखो एक बात मैं कहता हूँ। अगर तुमको दलाल बनना है तो सबसे बड़े दलाल के साथ काम करो, तभी दलाली सीख पाओगे। ईमानदार के साथ काम करने से नहीं। ठीक वैसे ही, अगर भाजपा भी कांग्रेस की तरह व्यवहार करना शुरू कर देगी, तो लोग इसे वोट क्यों देंगे। कांग्रेस में एक चेन ऑफ कमांड है, उसी को सभी फॉलो करते हैं। हर नेता अपनी डफली अपना राग नही अलाप रहा है।"

"हाँ ये सब तो ठीक है, लेकिन मीडिया को भी इस विषय पर सोचना चाहिए। मीडिया के कामकाज के तरीके के बारे में फिर कभी बात करेंगे। मुझे भी इस बारे में जानना है। फिलहाल, मैं चलता हूँ।"


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