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ISSN 2292-9754

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07.26.2014


41.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

वीणा पेशे से समाज शास्त्र की प्रोफेसर है, लेकिन कुछ ज्ञान उसे मनोविज्ञान का भी है। विजय की परेशानियों को समझने की वह लागातार कोशिश कर रही है। एक दो बार उसने इस विषय पर विजय से पूछने की कोशिश की, लेकिन वह इधर उधर की कुछ बातें कह कर टाल गया।

आज, जब वे दोनों पति-पत्नी शिरडी के लिए ट्रेन में सवार हुए, तो आपस में बातचीत करने के लिए भरपूर समय था। वीणा इस सोच में मग्न थी कि कैसे वह विजय से बात करना शुरू करे और उसकी परेशानियों को जान पाए। वह अभी इसी उधेड़बुन में थी कि विजय ने ही बात की शुरूआत कर दी। उसने फिर से देश के विकास के बारे में चर्चा शुरू की।

वीणा को विजय के मनोभावों को पढने मे एक पल की भी देरी नहीं हुई। अब उसे यह समझते देर नही लगी कि कहीं न कहीं देश के विकास की बातें हीं उसके मन में घूम रही है। कंटेंट एनेलाइसिस रिसर्च मेथड से विजय की बातों को विश्लेषण कर इस निष्कर्ष पर पहुँची कि कहीं न कहीं देश का विकास ही उसकी परेशानी का सबब है।

विजय के प्रश्न पूछने के अंदाज में उतावलापन है। इस बार सीधे तौर पर पूछने की जगह अपरोक्ष रूप से उसने प्रश्न किया। उसने पूछा कि क्या तुम्हें किसी सेमिनार में भाग लेना है? कल से तुम लगातार देश की विकास के बारे में ही चर्चा कर रहे हो।

विजय ने कहा, "नहीं ऐसी केाई बात नहीं है। हम केवल अपने बारे में सोचते हैं, देश के बारे में नहीं। हम एक सामाजिक प्राणी हैं, हमें अपने साथ-साथ देश के विकास के बारे में भी सोचना चाहिए।"

वीणा ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए अपनी बात शुरू की।

"देखो विजय! समाजशास्त्र में ही देश के विकास का हल छुपा है। समाज शास्त्रके चिंतक दुर्खिम, मैक्स बेवर, कार्ल मार्क्स आदि-आदि ने इस संबंघ में कई अवधारणाएँ पेश की हैं। अगर हम उन सबको समझें, तो अच्छा होगा।

अब देखो मैक्स बेवर ने ’सोशल एक्शन ऐंड आइडियल टाइप’ का बहुत ही बढ़िया कॉनसेप्ट दिया है। अगर पाँच आदमी रो रहे है, तो उसकी वजह एक नहीं बल्कि अलग-अलग हो सकते हैं। कोई भूख की वजह से रो रहा होगा तो कोई शोक की वजह से इत्यादि इत्यादि। इसलिए हमें उन कारणों को समझना होगा और उसके अनुरूप हल निकालना होगा।"

"बस करो वीणा, तुम्हारी ये समाज शास्त्र की दलीलें मैं कितनी बार सुन चुका हूँ। इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है। कल अरुण आया था। वह कुछ अलग ही विकास की कल्पना के बारे में बताना शुरू किया। रोस्टोव के पाँच स्तरीय सिद्धान्त? मॅडिसन का विकास सिद्धांत।

बोल रहा था कि भारत अभी टेक ऑफ स्टेज में है, यानी विकासशील से विकसित देश बनने के अंतिम पड़ाव पर है। इन सभी बातों में क्या रखा है? नेहरू जी ने एक पंचवर्षीय योजना क्या बनाई, भारत में हर काम पंचवर्षीय योजना के अनुरूप होना शुरू हो गया। बच्चे पैदा करने में भी लोगों ने पंचवर्षीय योजना को अपनाना शुरू कर दिया। यह गलत है। यह ठीक उसी तरह है कि एक आदमी विदेश जाता है तो सभी ने जाना शुरू कर दिया। भेड़ चाल मुझे पसंद नहीं। ठीक ही हुआ, राजनीति से एकेडमीशियन को हटा दिया। वरना सारा समय लेक्चरबाजी में जाता।"

"क्या मतलब? क्या बोल रहे हो तुम?" वीणा ने सवाल किया।

मैं बोल रहा हूँ कि देखो, आजादी की लड़ाई में सबसे अधिक किस पेशे के लोग भाग लेते थे- वकील, प्रोफेसर, डॉक्टर, पढ़े-लिखे लोग।

"अब क्या हो रहा है उन लोगों का स्थान गौण है। कुछ वकील, डॉक्टर जो पैसे कमा रहे हैं वे तो अपना स्थान बना भी पा रहे हैं लेकिन प्रोफेसर लोगों का प्रवेश राजनीति में न के बराबर है। क्या यह ठीक है, बोलो तुम।"

"हर जगह किताबी ज्ञान नहीं चलता, वीणा। हमें जमीनी स्तर पर सोचना होगा। अब सोचो समाज और राजनीति में क्या संबंध है? ‘समाज नियंत्रित राजनीति या राजनीति नियंत्रित समाज’! मौजूदा समय में पुरानी ढांचागत राजनीति की परिकल्पना करना कठिन है, क्योंकि भारतीय समाज का मूलभूत स्वरूप, संरचना, अपेक्षाएँ व व्यवहार काफी बदल चुका है। बदलाव के कई कारण हैं, लेकिन मुख्य रूप से हमें जो विचार करना है वह है समाज में बदलाव की ज़रूरत।

भारतीय समाज मूल रूप से जोड़ना सिखाता है, लेकिन प्रतिस्पर्धा की दौड़ में यह प्रकृति कमजोर पड़ती जा रही है। हालांकि सोच-विचार के आधार पर कुछ हद तक यह मौजूद है, लेकिन व्यवहार में गौण हो चुका है। इसके दो मुख्य कारण हो सकते हैं। एक आगे बढ़ने की प्रवृत्ति और दूसरा समाज में जोड़नेवाले के लिए किसी प्रकार के पुरस्कार की कमी।

दो दशक पहले तक गलत करनेवालों को समाज से बहिष्कृत करने का व्यावहारिक विधान था। गाँव-देहात में ऐसे लोगों से संबंध तोड़ लिया जाता था। गाँववासी उनके साथ बैठकर खाना-पीना बंद कर देते थे। वह व्यक्ति अपने पापों की आग में अकेला जलता रहता था। फिर कुछ दिनों, महीनों, वर्षों के बाद दोषी व्यक्ति द्वारा अपराध कबूलने के बाद उसे समाज में दोबारा जगह मिलती थी। हालांकि इसमें भी कई कमियाँ थीं, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर लोगों को खुद सुधरने का मौका दिया जाता था। यह प्रक्रिया उन्हें गलत करने से रोकती थी।

आज हालात बदल चुके हैं। लोग गाँव छोड़कर अपना जीवनयापन के लिए शहर की ओर रुख करने लगे हैं। उन्हें अब न तो उस समाज से लगाव रह गया है और ना ही कोई मतलब। शहर में वह अपना नया संसार बसा लेता है। शायद उसके किसी नेक काम पर अब न तो समाज उसे पुरस्कृत करता है और ना ही तिरस्कृत।

समाज की शक्ति अब सिर्फ चुनाव में ही देखी जा सकती है। चुनाव के दौरान समाज के लोग गोलबंद हो जाते हैं और अपनी जाति या धर्म के आधार पर मत देते हैं। लिहाजा चुनाव में उम्मीदवार की जीत का पैमाना उसका काम नहीं, बल्कि जाति या सम्प्रदाय बनता है।

यदि हम प्रजातंत्र में विश्वास करते है तो इसकी बुराइयों को भी दूर करना होगा। तभी हम सफल हो सकते है, वरना हमारा भविष्य खतरे में है। हम क्यों न ऐसे भारत का निर्माण करें, जिससे यहाँ रहनेवाले सभी लोगों को हर क्षेत्र में समान अवसर मिले। कागज पर नहीं, बल्कि यथार्थ में ऐसा होना चाहिए।"

वीणा इन सभी बातों को गौर से सुन रही थी। उसने विजय को बीच में टोकना उचित नहीं समझा। उसे अपनी पति की बातों पर आश्चर्य हो रहा था और खुशी भी। अब तक अपने पति में उसने केवल पैसा कमाने की भूख ही देखी था। उसने प्रश्न किया, "क्या, इधर तुम नई-नई किताबें पढ़ रहे हो? लगता है छुट्टियों का भरपूर उपयोग तुमने किया है।"

विजय को काफी दिनों बाद अपने लिए कुछ अच्छा सुनने को मिल रहा था। कुछ दिनों से लगातार उसे मंत्री जी की डांट ही मिल रही थी जिससे हमेशा वह नर्वस रहता था। यह सुनकर तुरंत उसने राज खोल दिया और उसने वीणा से मंत्री जी के बारे में बातें करना शुरू कर दिया।

"अरे क्या बताऊँ, नए मंत्रीजी ने परेशान कर रखा है। बोलते हैं देश के विकास के बारे में कुछ नई योजना बनाओ। उसका एक खाका तैयार कर मुझे दो। कुछ लिखकर दो। केवल जबान चलाने की ज़रूरत नहीं है। लिखने से काम नहीं चलेगा। वह खडूस है लेकिन संवेदनशील है।

मैं तुम्हें यह बताना ही भूल गया। दो चार दिन पहले वह कह रहा था कि मंत्रालय के सभी स्टाफ को घर पर बुलाऊंगा। उसकी योजना है कि इसी दौरान वह सभी लोगों से स्पष्ट कह देगा कि अब तक जो काम करने का ढंग था, ‘चलता है की प्रवृत्ति’ उसे छोड़ दे। सभी आउट ऑफ बॉक्स सोचें और नये आइडियाज दें। जोश के साथ काम करें।

पता नहीं वीणा, हमारे साथ क्या होता है? मंत्री मुझे अपने स्टाफ में रखता है या फिर बाहर ही कहीं जाना पड़ेगा। अब देखो न दिल्ली से बाहर जाने में कितनी परेशानी है! तुम्हारी जॉब यहाँ है, बच्चे पढ़ रहे हैं। कई सारी परेशानियाँ एक साथ आ जाएगी।"

अब वीणा सारी बात अच्छी तरह समझ चुकी थी। उसे विजय की परेशानी और शिरडी जाने की वजह भी मालूम हो गयी।


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