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ISSN 2292-9754

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07.26.2014


38.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय की पत्नी वीणा एक महीने की छुट्टियाँ बिताकर आज पटना से दिल्ली लौट आई। वे दोनों आपस में घर-परिवार की बातें कर रहे हैं, लेकिन विजय उन बातों को छोड़ सीधे राजनीति और बिहार के विकास की बातें करने लगता है।

"क्या बिहार में सचमुच विकास दिखना शुरू हो गया है? इस बार तुम एक साल बाद पटना गई थी, क्या तुम्हें कुछ परिवर्तन नजर आया?"

"हाँ, बिहार में विकास हो रहा है। लेकिन इसे हम बहुत बढ़िया नहीं कह सकते हैं। पूरी तरह से बदलने में समय लगेगा। माहौल एक बड़ी चीज होती है। वह बदल चुका है। आम आदमी की सोच में भी तब्दीली देखने को मिल रही है। लॉ एँड आर्डर, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है। कॉलेज का रिजल्ट समय पर निकल रहा है। परीक्षा और सेशन में भी सुधार हो रहा है।" विजय ने टोकते हुए पूछा, "क्या शिक्षा में सुधार हो रहा है? पिछले दिनों तो शिक्षकों पर लाठियाँ बरसाने की खबर हम यहाँ सुन रहे थे।"

"अरे, यह अलग बात है, क्या नीतिश कुमार की जान ले लोगे?" वीणा बोली, " देखने का अपना-अपना नजरिया है, जिन लोगों को नौकरी चाहिए वह अपनी लड़ाई तो लड़ेंगे ही, अब सरकार भी क्या कर सकती है?"

"सरकार क्यों नहीं कुछ कर सकती है? सरकार नहीं करेगी, तो कौन करेगा?" विजय ने कहा।

"अच्छा, अब तुम भी उन लोगों जैसी बातें करने लगे हो जो कहते हैं कि लालू यादव ने 15 वर्षों के दौरान निचले तबके के लोगों को आवाज दी थी ऐसा करके लोकतंत्र को मजबूत किया था।"

"तो क्या उसने आवाज नहीं दी? आवाज तो आमलागों को ज़रूर मिली। लोगों ने अपने काम के लिए सरकारी बाबुओं के सामने जाकर कहना शुरू कर दिया था। काम नहीं करने पर उनसे पूछने की हिम्मत भी करने लगे थे।"

विजय ने इस विषय को आगे बढ़ाते हुए कहा, "क्या इसके पहले किसी की हिम्मत होती थी कि कोई सामने जाकर बात करे। जनता बाबुओं को माई-बाप कहकर पुकारती थी।"

वीणा बोली-अच्छा, तुम तो एक महीने में पूरी तरह बदल गए। बाबू गिरी के खिलाफ भी बोल रहे हो।

"नहीं-नहीं मैं सच्चाई बयान कर रहा हूँ, वीणा। तुम देखती होगी, आम लोगों और ब्यूरोक्रेट्स के बीच खाई थी। लेकिन अब यह दूरी कम होने लगी है।"

"नहीं, तुम गलतफहमी में हो। वहाँ जाओ फिर पता चलेगा। पहले लालू राज चलाते थे और अब बाबू सरकार चला रहे हैं। यहाँ तक कि मंत्रियों की सिफारिश पर भी गौर नहीं किया जाता। नीतीश कुमार ने कुछ हद तक व्यवस्था ठीक कर दी है। वहाँ अभी किसी की नहीं चल रही है। यहाँ तक कि भाजपा वालों को भी नीतिश ने किनारा कर दिया है। सिंगल मैन शो चल रहा है बिहार में और उन्हें जनता का सपोर्ट भी मिल रहा है।"

"बहरहाल, तुम तो बोल रही थी कि पटना में कोई खास विकास नजर नहीं आया?"

"नहीं, मेरा कहने का मतलब यह नहीं था। मेरा कहना है कि ट्रैफिक जैसी असुविधा वहाँ भी आ गई है। सड़क पर घंटों जाम लगा रहता है। कंकड़बाग से रेलवे स्टेशन तक पहुँचने में काफी समय लग जाता है। राज्य के विकास के बारे में सबको मिलजुलकर सोचना होगा। बिहार में कई प्राचीन शहर हैं। लेकिन वह जवाहरलाल नेहरू अर्बन रिन्यूवल मिशन यानी जेएनयूआरएम में शामिल नहीं है। इसमें तो प्रशासन का ही दोष माना जा सकता है। इसके लिए प्रयास ज़रूरी है।"

विजय ने टोका, "मेरा भी यही मानना है। सभी लोग इस दिशा में मिलजुल कर इसके लिए काम करें, तभी बिहार का कायाकल्प हो सकता है। एक आदमी के जिम्मे का काम नहीं है। इसमें दूरदर्शिता की ज़रूरत है। यही अवसर है जब बिहार की खोई प्रतिष्ठा स्थापित की जा सकती है। वहाँ एनआरआई को बुलाने की ज़रूरत नहीं है। वहाँ उन लोगों को बुलाने की ज़रूरत है, जिन्होंने देश के अन्य राज्यों में जाकर विकट परिस्थितियों में भी सफलता हासिल की है। उन लोगों को रोल मॉडल के रूप में जनता के सामने पेेश करना चाहिए। जनता को काफी उम्मीदें हैं नीतिश कुमार से। वे आर्थिक सूचकांक नहीं समझती हैं। उन्हें नौकरी चाहिए। वह नीतीश कुमार को देना होगा। लाठी बरसाना ठीक नहीं है। रोजगार के अवसर सृजित करें। दूसरे राज्यों से बिहारी लोगों के ले जाने से आम आदमी को प्रोत्साहन मिलेगा और अपना रोजगार शुरू करने का तजुर्बा भी। एनआरआई कभी नहीं विनिवेश करेगा, उन्हें अपने एक रुपये की जगह 100 रुपये का रिटर्न चाहिए।"

"हाँ, विजय तुम ठीक कह रहे हो, मुझे भी ऐसा लगता है। रोजगार की बहुत ज़रूरत है। हर दिन वहाँ मुझसे कोई न कोई रोजगार मांगने आता था या कहता था कि पैरवी कर दीजिए। एक आदमी को पापा ने तुम्हारे पास भेजा भी था। क्या हुआ उसका? कुछ हुआ उसका? वह बहुत प्रतिभाशाली।"

"अरे नहीं, वीणा। कुछ नहीं हो पाया है। वह तो एक दिन के बाद आया भी नहीं। मैं तो उसे ढूंढ ही रहा था। उसे बुलवाओ। उससे बात करनी है। क्या तुम्हारे पास उसका मोबाइल नंबर है?"

"हाँ, ज़रूर होगा, मैं बात कर लेती हूँ। उसे पापा भी जानते हैं।"

"अच्छा, चलो अब बाद में बातें होंगी। कल शिरडी के लिए रवाना भी होना है।" विजय ने कहा।
"क्या तुम शिरडी के लिए टिकट ले चुके हो? लेकिन इतनी जल्दी क्यों?"

विजय ने यह कहकर बात काट दी कि बच्चों की छुट्टियाँ खत्म हो जाती। इसलिए जल्दबाजी में टिकट बुक कर लिया। असली बात उसने वीणा से नहीं बताई।


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