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ISSN 2292-9754

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07.26.2014


37.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

सुबह के करीब 10 बजे हैं। दिन रविवार है। अरुण अपने वायदे के अनुसार विजय से मिलने उसके घर पहुँच गया है। उसके आते ही विजय ने यह कहकर संबोधित किया..

"भाजपाई अरुण, कैसे हैं आप?"

"हाँ, मैं ठीक हूँ। आप बताइए... आप कैसे हैं? सब खैरियत हैं, ना?"

"सब कुछ ठीक नहीं कहा जा सकता है। अगर आपकी पार्टी भाजपा सत्ता में आ जाती, तो सब ठीक रहता। मेरी नौकरी तो कम से कम यहाँ बची रहती। अब तो पार्टी में आपकी अच्छी जान-पहचान हो चुकी है। खैर, एक बात बता दूं.....आप यह भूल जाएँ, अब अगले पाँच साल तक क्या, दस पंद्रह वर्षों तक भी भाजपा सत्ता में नहीं आ पाएगी।"

"क्यों? आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं? चुनाव में हारना-जीतना तो लगा रहता है।"

विजय, "आप ठीक कह रहे हैं। चुनाव में हारना-जीतना लगा रहता है लेकिन नेता सही होना चाहिए। सभी नेताओं ने अपनी कब्र खुद खोद ली। अपनी महत्वाकांक्षा की वजह से पार्टी को गर्त में घकेल दिया। क्या ऐसा नहीं है? आप ही बताओ। मैं क्या गलत बोल रहा हूँ?"

अरुण, "नहीं, भाजपा के पास नेताओं की कमी नहीं है। हरेक में क्षमता है। सभी काम कर रहे हैं। हाँ कांग्रेस के नेताओं की तरह उनके बेटों की कतार नहीं है। तुम जो सोच रहे हो, सर्वथा गलत है।"

विजय, "देखो अरुण, तुम मेरी बात नही मानोगे। नेता हैं लेकिन क्या उनका व्यवहार नेताओं की तरह है? सभी अपनी पार्टी के नेताओं को गलत ठहराने में लगे हैं। उनका अधिकांश समय एक दूसरे की टांग खींचने में बीतता है। दूसरी पार्टी के नेताओं से तो वे बाद में लड़ेंगे, पहले अपने लोगों में ही इतनी जंग छिड़ी हुई है कि पूछो मत। नेताओं का काम है जोड़ना, तोड़ना नहीं। उन्हें मिलकर सता के लिए संघर्ष करना चाहिए। संघर्ष में समर्पण का भाव भी होना चाहिए। वह आज कहीं भी और किसी में भी नहीं दिख रहा है। काश! वाजपेयी जी के जैसा कोई नेता होता तो पार्टी की स्थिति ऐसी नहीं होती, अरुण।"

"मैं समझ रहा हूँ, जो तुम कहना चाह रहे हो", अरुण ने कहा।

विजय ने टोकते हुए कहा, "वह अकेले ही सभी बड़े नेताओं को चुप करा देते थे। मीडिया भी उनकी बातों के आगे मजबूर थी। उनकी बातों में दम हुआ करता था। आज जो मीडिया छापता है, उसके सामने नेता मजबूर हो जाते हैं। पता नहीं, भाजपा को क्या हो गया है? क्या भाजपा अध्यक्ष को यह कहना ज़रूरी है कि हम हिन्दुत्व से नहीं हटे हैं। और नहीं हटेंगे। क्या भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी मीडिया के एजेण्डे से चला करेंगे? अपना एजेण्डा नहीं सेट करेंगे? वे हमेशा सुलह-सफाई की मुद्रा में दिखते है। यह सब देखकर दुख होता है। अरुण, तुम तो जानते हो, मैं भी पार्टी से सहानुभूति रखता हूँ, लेकिन अब एक मात्र भरोसा संघ पर है। चार सौ के लगभग संघ की संस्थाएँ काम कर रही हैं। देश के कोने-कोने में इसका जाल फैला हुआ है। इसके बावजूद क्या यह संभव है कि सूचना की कमी हो। जब सभी सूचनाएँ हैं, तो जो निर्णय लिया जा रहा है वे गलत क्यों साबित हो रहे हैं?"

"नहीं, ऐसा संभव नहीं है? संभव है कि सूचना गलत हो या फिर निर्णय। अंत में यह कहकर पल्ला झाड़ लेना कि हम अपनी बातों को आम लोगों तक पहुँचा नहीं पाएँ, वाकई दुखद है। इसलिए मैं कहता हूँ कि वर्तमान समय के जो नेता हैं, वे लोगों को समझने की बजाय अपनी ही पार्टी के नेताओं को समझने और समझाने में जुटे हैं और जुटे रहेंगे।"

"क्या तुम इससे सहमति रखते हो?" विजय ने पूछा।

अरुण सोचने लग़ जाता है। अंत में वह सिर हिलाकर हामी भर देता है क्योंकि वह नेता नहीं है।

अरुण, "विजय, तुम बताओ, क्या इसका कोई निदान है?"

विजय, "देखो निदान तो है। जब सभी नेता लड़-मर कर खत्म होने पर उतारू हैं तो संगठन को आगे आना होगा। कहने का मतलब यह है कि नेतृत्व ऐसे हाथ में हो, जो संगठनकर्ता हो। जो सबको एक साथ लेकर चलने में कामयाब हो। पार्टी में नेताओं की अलग-अलग टीम, अलग-अलग विचारक की जो परंपरा पनपी है, उसपर विराम लगाया जाए। पार्टी के दृष्टिकोण को जनता के सामने पेश किया जाए।
भाजपा पहले कांग्रेस से किस प्रकार अलग हुआ करती थी? सभी कार्यकर्ताओं के काम करने के तरीके से पता चलता था। किसी को पद का लोभ नहीं था। सभी वाजपेयी के नेतृत्व में पार्टी को मजबूती प्रदान करने के लिए हरदम तैयार रहते थे। सभी अपने दायित्व और कर्त्तव्य के प्रति स्पष्ट थे। अभी सबकुछ अस्पष्ट है। चारों ओर संशय का वातावरण दिख रहा है। इस प्रकार के अनिश्चितता के बादल को छंटना चाहिए और यह तभी हो पाएगा जब, नेतृत्वकर्ता मजबूत होगा। सभी को साथ लेकर चलने में ही उसकी शक्ति निहित होगी। वैसे अरुण लोकसभा में ही राष्ट्रीय नेतृत्व क्षमतावाले नेताओं की कमी हो गई है। वाजपेयी जी, सोमनाथ, चंद्रशेखर सरीखे नेताओं के नहीं रहने से, इस लोकसभा का स्वरूप बौना दिखता है।


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