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ISSN 2292-9754

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07.26.2014


36.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मनीष ने जब से चार्टर बस से ऑफिस आना-जाना शुरू किया है, वह शाम में घर जल्दी वापस लौट आता है। उसके पास अब भरपूर समय है। पहले की तरह अब मारा-मारी नहीं है। घर आओ, खाना खाओ और सो जाओ। सुबह उठकर ऑफिस के लिए रवाना हो जाओ।

आज तो बड़ी जल्दी वह घर पहुँच गया। क्योंकि रास्ते में कहीं भी सड़क जाम नहीं मिला। राधा के साथ बातचीत करने के लिए भी आजकल मौका मिल रहा है। राधा को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि यह परिवर्तन कैसे संभव हुआ? क्यों वह अब जल्दी घर आ जाता है? वह सोच रही थी कि शायद पिछले सप्ताह हुआ झगड़ा कारगर हो गया है! उसकी वजह से ही मनीष घर जल्दी आ जाता हैं। संयोगवश मनीष ने झगड़े के दूसरे दिन से ही चार्टर बस से आना-जाना शुरू किया था। लिहाजा, राधा के मन में इस विचार का आना स्वाभाविक था। वह फिर से इस उपाय को अजमाना चाह रही है। चाय पीने के बाद राधा तुरंत उबल पड़ी। उसने मुंह तो मनीष के आते ही बनाना शुरू कर दिया था।

"क्या आपको अपने सिवा किसी और का ध्यान नहीं रहता" राधा बोली। चाय-खाना मिल जाता है बस और दूसरी चीज के बारे में सोचने की ज़रूरत क्या है? बैठ कर केवल टीवी देखते रहिए।

मनीष ने तुरंत टीवी बंद कर दिया। उसने सोचा कि शायद टीवी ही कलह का कारण है। उसे टीवी नहीं देखना चाहिए था। महिलाएँ चाहती हैं कि सामने वाला व्यक्ति पूरी तरह उसी पर ध्यान केन्द्रित रखे।

मनीष, "लो टीवी देखना बंद कर दिया। आओ बैठो अब हमलोग बातें करते हैं।"

राधा, क्या बात करेंगे, खाक। आप खुद मौज-मस्ती कीजिए। हम यहाँ बैठे-बैठे सड़ते रहें। आपको क्या है? पहले काम का बहाना बनाते थे। आजकल घर जल्दी आ जाते हैं। पहले कभी ऐसा नहीं होता था कि 9 बजे के पहले घर पहुँचे।

"क्यों?"

"हम यहाँ सबकुछ करने के लिए तो बैठे ही हैं। अपना जूता तो कम से कम उठा कर जगह पर रख दो। सब हम ही करें, खुद तो पढ़ाकू बनते हैं।"

मनीष को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। आखिर ये सब क्या हो रहा है? उसने पूछा कि आखिर क्या बात है?

"बताओ।"

"बात क्या होगी। जाइए मुझे अकेला छोड़ दीजिए। अभी सब्जी बनानी है।"

मनीष यह सोचकर वहाँ से हट जाता है कि चलो कुछ देर यहाँ नहीं रहने में ही भलाई है। वह मन ही मन सोचता है कि औरत के मन को समझना बड़ा कठिन है। कब किस बात पर नाराज हो जाए, इसका पता कर पाना असंभव है। राधा सब्जी काट रही है और कुछ-कुछ बुदबुदा भी रही है - एक दिन सिर्फ दिखावे के लिए डीवीडी लाने का नाटक कर दिया। उसके बाद कोई जिक्र तक नहीं किया। ठीक ही रानी कहती है, मर्दों को ठीक करना पड़ता है। वे स्वभाव से ही लापरवाह होते हैं।

मनीष सब कुछ सुन रहा था। वह आया और बोला, "बस इतनी सी बात, डीवीडी आ जाएगी। इसके लिए विवाद करने की क्या ज़रूरत है? कल रविवार है। हम चलकर खरीद लेंगे।"

"नहीं, हमको नहीं लेना है।" राधा बोली लेकिन आवाज में कुछ नरमी थी।

मनीष अब अच्छी तरह समझ गया कि गुस्से की वजह कुछ और नहीं, बल्कि डीवीडी ही है। मेरा टीवी देखना और किताब पढ़ना शायद इसे पसंद नहीं है। उसने तुरंत कहा, "ठीक है आ जाएगी। क्यों नाराज हो रही हो।"

फिर भी राधा नहीं मानी-"रहने दीजिए, हमें आपकी डीवीडी नहीं चाहिए, हम खुद नौकरी कर लेंगे, पैसे कमाकर खरीद लेंगे।"

"अच्छा अब तुम नौकरी करो्गी।" मनीष ने पूछा।

"हाँ करूँगी, ज़रूर करूँगी। एक एक सामान के लिए आपके सामने गिड़गिड़ाना पड़ता है। मैं उन औरतों में नहीं हूँ, जो बैठे-बैठे केबल रोटी तोड़ना जानती हैं। मैं खुद अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करूँगी।"

"ठीक है भाई, तुम नौकरी कर लेना और हमारा सामान भी खरीद देना।"

मनीष की इस बात को सुनकर राधा खुश हो गई। वह एक तीर से दो निशाना साध रही थी। एक तो अपने पैसे से डीवीडी खरीदने की और दूसरी वह नौकरी करने के बारे मनीष की राय भी जान लेना चाह रही थी। उसे जवाब मिल चुका था।

राधा बोली, "ठीक है चलिए हटिए यहाँ से। जाइए अभी टीवी देखिए। आज न्यूज में काफी मसाला है। यहाँ की राजनीति में काफी उथल पुथल हो चुका है। हम भी आते हैं। पता नहीं आजकल क्या हो रहा है। मुझे तो समझ में नहीं आता है कि ये दिल्ली है कैसी? यहाँ से अच्छा तो अपना गाँव ही था।


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