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ISSN 2292-9754

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07.26.2014


35.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विकास के लिए दिल्ली की यात्रा ना सिर्फ प्रोजेक्ट वर्क के लिए लाभदायक रही, बल्कि इस बार राजनीति पर विजय के साथ जो चर्चा हुई वह भी उसके लिये एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। राजनीति पर उसकी ना तो अब तक किसी से चर्चा हुई थी और ना ही इसमें उसकी कोई दिलचस्पी थी। उसके लिये राजनीति सिर्फ समय बर्बाद करने का साधन मात्र था। लेकिन उसकी पुरानी धारणा ध्वस्त हो गई थी। विजय से मंत्री जी के बारे में कई अच्छी बातें सुनने को मिलीं। मसलन वे दिनभर लोगों से मिलते-जुलते रहते हैं। उनकी समस्याओं का निपटारा भी करते हैं। मन में उनके ऊपर भरोसा पैदा होने लगा था।

विकास पहले सोचा करता था कि मंत्रियों को सभी कुछ बना-बनाया मिल जाता है। वे सभा और गोष्ठियों में जाकर सिर्फ बकबक कर देते है। उन्हें काम करने की कोई ज़रूरत ही नहीं पड़ती है। लेकिन विजय ने उसे अपना नजरिया बदलने के लिऐ मजबूर कर दिया। मंत्रियों को कम से कम सुबह 5 बजे से रात 9 बजे तक काम करना पड़ता है। अधिकारियों वाली बात यहाँ नहीं है कि उनकी 9 से 5 की जॉब है। मंत्रलय में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए समय सीमा 8 घंटे है लेकिन मंत्री कार्यालय से जुड़े लोगों के लिये कोई समय निर्धारित नहीं होता। मंत्री जी अपने विभागीय कार्यालय आते हैं तो 10 से 12 घंटे काम करना पड़ता है। विजय ने दो मंत्रियों का उदाहरण भी दिया, जो अपने काम के प्रति बहुत वफादार थे।

दूसरी बात जो उसे मालूम हुई कि प्राइवेट सेक्टर में पैसा आपकी सफलता और पद से जुड़ा है। मंत्रलय में पैसा काम से जुड़ा है। मंत्रलय में पैसे के पीछे नहीं भागा जाता है। पैसा खुद ब खुद उसके पीछे भागता है। अगर आप काम करते हैं, तो पैसा बना सकते हैं। यहाँ पैसे के लिए आपको सोचना नही पड़ता है। हर काम से कमाई जुड़ी है।

तीसरी बात जिसके लिये प्राइवेट सेक्टर वाले को ऊपर माना जाता है... वह है काम की डिलिवरी। अब मंत्रालय के कार्यों में भी इसकी शुरूआत हो चुकी है। पहले जिस काम को पूरा करने में वर्षों समय लग जाते थे उसे अब बहुत जल्दी निपटाने की कोशिश की जाती है।

नंदन निलेकनी को यूआईडी का चेयरमैन बनाना इसका ही प्रमाण है कि सरकार दूरगामी प्रभाव वाले काम के प्रति गंभीर है। यह काफी अहम बात है।

इसी तर्ज पर स्वास्थ्य, शिक्षा और कई दूसरी रोजमर्रा की ज़रूरतों वाले विमागों में कारपोरेट प्रोफेशनल्स की सेवा लेने की ज़रूरत है। मेरा मानना है टाटा कंस्लटिंग सविर्सेज यानी टीसीएस जैसी संस्थाएँ इसी तरह के प्रोजेक्ट लेती हैं और उसे समय पर पूरा करती हैं।

सरकारी कर्मचारी काम नहीं करते हैं, क्योंकि उन्हें नौकरी खोने का डर नहीं होता है। वह एक बार नौकरी में आ गए, तो अपने आप को बादशाह मानने लगते हैं क्योंकि उन्हें कोई निकाल नहीं सकता है। लिहाजा वे काम ही नहीं करते हैं। अगर प्राइवेट प्रोफेशनल्स का इस्तेमाल किया जाए तो काम की डिलीवरी और गुणवत्ता दोनों में तेजी आ जाएगी। हम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर काम में तेजी ला सकते हैं। लेकिन सरकार का फोकस ही गलत है।
सरकार अच्छे अच्छे इंजीनियर, डॉक्टर तैयार करती है और उन्हें धन-कुबेरों के हाथ में खिलौना बनने के लिए छोड़ देती है। सरकार को चाहिए कि उन्हें कुछ समय के लिए सरकारी नौकरी करना अनिवार्य कर दे। सरकार तकनीक विकास के लिए हर संभव प्रयास करती है। करोड़ों रुपये खर्च करती है, लेकिन जब सरकारी कार्यों में उसे अमल में लाना चाहती है तो असफल हो जाती है। प्राइवेट कंपनियों के पास हर तरह के आधुनिक उपकरण होते हैं। प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनियाँ आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित होती हैं तो सरकारी पीडब्लूडी में मूलभूत ज़रूरी उपकरणों का भी अभाव होता है। हाल के दिनों में जिस सड़क निर्माण का काम प्राइवेट कंपनियों को बनाने के लिए दिया गया, उसे समय पर पूरा कर लिया गया। वहीं सरकारी कंपनियाँ इसमें पूरी तरह विफल हो गई।

अगर सरकारी इंजीनियर देश में सड़क निर्माण के कार्य को ईमानदारी पूर्वक करें तो देश की कोई भी सड़क जर्जर अवस्था में नहीं होगी।

सरकारी कर्मचारी या अधिकारी ईमानदारी से काम करें, यह सब बहुत हद तक नेतृत्व की इच्छाशक्ति और दृष्टि पर भी निर्भर करता है। विजय कह रहा था कि इसबार कड़क यानी ईमानदार मंत्री आ गया है इसलिए उसे काम करने में नानी याद आ रही है। सच है कि ईमानदारी को अगर हम अपना धर्म बना लें, तो दुनिया की कोई भी शक्ति भारत को विकसित देश बनने से रोक नहीं सकती है।


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