अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.26.2014


34.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय से बातचीत करने के बाद मनीष अपनी सीट से लगे कम्प्यूटर पर आकर बैठ जाता है। काफी दिनों बाद आज वह कम्प्यूटर पर बैठा है। वह अपने दोस्त से चैट करने का प्रयास करता है। कुछ देर कोशिश करने के बाद वह उससे कनेक्ट हो जाता है।

मनीष, "आप कैसे हो? मैं तुमसे बहुत दिनों से बात करना चाह रहा था, लेकिन व्यस्तता की वजह से नहीं कर सका।"

पंकज, "हाँ, मैं ठीक हूँ। मैं भी पिछले कई दिनों से तुमसे बात करना चाह रहा था।"

मनीष, "क्या पिछली बार जब हमलोग चैट कर रहे थे तो बिजली चली गई थी?"

पंकज, "ओ नहीं यार, बिजली नहीं गई थी। अगर चैट करना बंद नहीं करता, तो मेरी नौकरी ज़रूर चली जाती। आजकल ऑफिस में बहुत कड़ाई है। मंदी की मार यहाँ जबर्दस्त है।"

मनीष ने आश्चर्य से फिर पूछा, "नौकरी चली जाती? मैं समझा नहीं कि तुम क्या कह रहे हो।"

पंकज, "अरे बात यह थी कि मेरे बॉस सामने आकर खड़े हो गये थे। वैसी स्थिति में मैं क्या करता? हड़बड़ाकर मैंने तुरंत चैटिंग बंद कर दी। कुछ ही दिन पहले ऑफिस में ये सर्कुलर आया था कि ऑफिस में काम करने वाले कम्प्यूटर पर चैटिंग या किसी प्रकार का अपना पर्सनल काम नहीं करेंगे।"

मनीष, "अच्छा यह बात है। इसका मतलब बिजली नहीं गई थी।"

पंकज, "हाँ, बिजली नहीं गई थी। यहाँ बिजली नहीं जाती है। मैं तो बिजली से परेशान हो गया हूँ। हर जगह ऑफिस में एसी, बस में एसी, घर में एसी। सभी जगह एसी। प्राकृतिक वातावरण से कहीं कोई नाता नहीं। पूरा जीवन मशीनीकृत हो गया है।"

मनीष, "यह तो अच्छी बात है न! कितना अच्छा लगता होगा। मेरे घर पर तो पंखा ही लगा हुआ है। काश! एसी रहता तो कुछ और बात होती।
पंकज ने उत्तर में लिखा, "इसमें कौन-सी अच्छी बात है? यहाँ मैं परेशान हो गया हूँ। क्या करूँ?"

मनीष, "मैं तो सोचता हूँ कि तुम अच्छा जीवन जी रहे हो। पैसा कमा रहे हो। एसी में रह रहे हो, फिर भी तुम ये कैसी बात कर रहे हो.... कि तुम परेशान हो। पंकज तुम्हारी बातों से निराशा की बू बा रही है। आखिर क्यों? बताओ।"

पंकज, "हाँ यार, तुम्हीं से अपनी बात शेयर कर रहा हूँ। यह सब ठीक है कि पैसे हैं, सुख सुविधाएँ हैं लेकिन......यहाँ एक भी आदमी अपना नहीं है।"

मनीष, "लेकिन हम लोग तो पैसे के लिए तरसते रहते हैं, पंकज।"

पंकज ने लिखा, "यह सही है। जब कोई चीज नहीं रहती है, तो उसकी बहुत अघिक ज़रूरत महसूस होती है। कहावत है न! दूर का ढोल सुहावन। जब लोग अपने देश में रहते हैं तो सोचते हैं कि पैसे कमाने के लिए विदेश जाएँ। लेकिन वहाँ जाने के बाद ही सही स्थिति का पता चलता है। आदमी एक सामाजिक प्राणी है। हम लोग अपने लोगों से मिले बगैर या बात किये बिना नहीं रह सकते हैं। हमें अपने जैसे लोगों से बने समाज की ज़रूरत महसूस होने लगती है।

मनीष को अब बात समझ में आने लगी। उसने लिखा- हाँ, तुम सही कह रहे हो। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन हर आदमी को ज़रूरतों के हिसाब से काम करना पड़ता है और कमाना पड़ता है।

पंकज, "हाँ मनीष, इसी वजह से तो मैं यहाँ काम कर रहा हूँ। सोचता हूँ कि यहाँ एक साल और काम करूँ। उसके बाद भारत आकर कुछ अपना काम शुरू करूँगा।"

"इसमें कोई बुराई नहीं है। यहाँ आ जाओ अच्छा ही रहेगा" मनीष बेमन से यह लिख रहा है। क्योंकि वह केवल पंकज का हौसला बढ़ाना चाहता है। पंकज ने आगे लिखा, "देखो क्या होता है? मेरी नौकरी बचती है या नहीं। यहाँ हर दिन नौकरियाँ जा रही है। लोग अपनी नौकरी बचाने के लिए पता नहीं क्या-क्या कर रहे हैं? 12-12 घंटे काम करने के बावजूद इसका पता नहीं है कि कल नौकरी रहेगी या नहीं। स्थिति काफी नाजुक बनी हुई है।"

मनीष, "क्या यह आर्थिक मंदी की मार है? तुम सॉफ्टवेयर या बैंकिंग एजेन्सी में तो नहीं हो, फिर तुम क्यों घबरा रहे हो। मैंने अखबार में पढ़ा था कि सॉफ्टवेयर नौकरियों में 4-5 हज़ार की छंटनी हो रही है। कर्मचारी बेहाल है !वे करें तो क्या करें।"

पंकज, "हाँ मनीष तुम सही कर रहे हो। लेकिन ऐसा नहीं है कि एक इंडस्ट्री में लोगों की छंटनी हो रही है, तो दूसरा प्रभावित नहीं होगा। ऐसा संभव नहीं है। दरअसल सभी कंपनियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। मैं होटल इंडस्ट्री में काम करता हूँ। इसलिए असर पड़ना स्वाभाविक है।"

पंकज, "अच्छा बताओ कि घर परिवार में सब ठीक है? छोड़ो इन बेकार की बातों को।"

मनीष, "हाँ, ठीक है, सभी लोग ठीक हैं। सब कुछ ठीक चल रहा है। हाल के दिनों में तुम्हारा यहाँ आने का कोई इरादा है?"

पंकज, "नहीं अभी तो ऐसी कोई योजना नहीं है। मैं तुम्हें बताऊँगा, मनीष। ठीक है अब मैं अगले सप्ताह किसी दिन बात करूँगा।"


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें