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ISSN 2292-9754

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07.25.2014


33.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय के चेहरे से घबराहट गायब थी। वह अब आश्वस्त लग रहा था। विजय की व्यस्तता की वजह से मनीष भी कुछ दिनों से उससे बात नहीं कर सका था। आज ऑफिस आते ही उसकी मुलाकात विजय से हो गई। इन दिनों मनीष के मन में जो कुछ भी विचार आया था, वह उससे चर्चा करने लगा।

पहले दिन उसने आम आदमी के नज़रिये को विजय के सामने रखा था। आज उसने समाज में रहने वाले कई तरह के लोगों और महिलाओं के विषय में चर्चा की।

"आम आदमी की परेशानियों का अंत नहीं है। विकास के सफर में लोगों की एक समस्या सुलझती भी नहीं है कि दूसरी सामने आ जाती है। विकास के जिस प्रकार स्वरूप और मायने बदलते हैं उसी प्रकार समस्यायें भी अलग-अलग रूप से दस्तक देने लगती हैं। क्या ऐसा नहीं है", मनीष ने पूछते हुए अपनी बात आगे बढ़ाई। "सर, दिल्ली देश की राजधानी है। प्राचीन काल से अब तक दिल्ली में कहते हैं। सात बार शहर की स्थापना की गई। निश्चित तौर पर हर बार शहर स्थापित करने के क्रम में लोगों की परेशानियों को ध्यान में रखा गया होगा। ऐसा नहीं है कि शहर को बसाने वाले उसे नजरअंदाज कर देते होंगे। लोगों की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को निश्चित तौर पर ध्यान में रखा गया होगा। इस शहर के इतिहास के बारे में हमें अधिक मालूम नहीं है, लेकिन पिछले एक सौ साल का ही हम जायजा लें, तो स्थिति साफ हो जाती है। 1911 में जार्ज पंचम का स्वागत करने के लिये जो भवन बनाया गया वह अभी राष्ट्रपति भवन है। फिर इसके इर्द गिर्द शहर को बसाया गया। अब देखिए कनॉट प्लेस यानी सी पी 1930 के आसपास बनाया गया था। इसका नामकरण महारानी विक्टोरिया की सातवीं संतान प्रिंस ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर किया गया।

यह महत्वपूर्ण शॉपिंग प्लेस दशकों तक रहा, लेकिन अब मॉल्स के आ जाने से इसका महत्व घट रहा है। इसके आसपास काफी रौनक होती थी। इमारत के नीचे में दूकान होती थी और ऊपर में रहने का आवास। शायद ही अब कोई वहाँ रहता है! आसपास का इलाका पूरा कामॅर्शियल हो गया है।

नई दिल्ली के नाम से स्थापित शहर महज पचास सालों में पुराना हो गया। अब एनसीआर का विकास हो रहा है। शहर के विकास में कई आयाम जुड़े। यहाँ सबसे पहले खुले होटल इम्पीरिअल को आज कोई नहीं जानता है। खासकर 1982 में एशियन गेम्स के समय दिल्ली का काफी विस्तार हुआ। प्रगति मैदान और कई नामी-गिरामी जगहों का निर्माण किया गया। शहर को वर्ल्ड क्लास बनाने की कोशिश की गई। अब 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स की वजह से इसे फिर से खूबसूरत बनाया जा रहा है। दुनिया के कई मशहूर शहरों के तर्ज पर इसे वर्ल्ड क्लास बनाने की कोशिश की जा रही है।
सर, आप देखिए, कॉमनवेल्थ गेम की तैयारी के सिलसिले में सड़क, फलाईओवर, होटल जैसे निर्माण कार्यों और यमुना पर कंस्ट्रक्शन की वजह से लोगों को कितनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
दिल्ली में फलाईओवर जब बनना शुरू हुआ तो लोगों ने सोचा कि अब ट्रैफिक की समस्या नही होगीं। लेकिन आज फलाईओवरों के साथ-साथ मेट्रो रेल भी शुरू हो गई। फिर भी कई समस्याएँ आज भी बरकरार हैं। यह मात्र एक उदाहरण है।

हमारे कहने का मतलब है कि आने वाली पीढ़ी की खुशहाली के लिये वर्तमान पीढ़ी को कई तरह की परेशानियों से होकर गुजरना पड़ता है। क्या ऐसा संभव है कि वर्तमान पीढ़ी के बिना त्याग किए अगली पीढ़ी की खुशहाली की जमीन तैयार हो। आम आदमी इच्छाओं का गुलाम है। सैकड़ों परेशानियों और अपेक्षाएँ इसी तरह बदलती रहती हैं। फिर भी जीवन चलता रहता है।"

"हाँ, मनीष तुम सही कह रहे हो। हमें विकास का प्रारूप तैयार करने में इन बातों का भी ध्यान रखना होगा।"


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