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ISSN 2292-9754

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07.25.2014


32.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय हर तरह से प्रयास कर रहा है। वह इसमें कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखना चाहता है। मेहनत, चापलूसी व रणनीति वह सभी हथकंडे अपना रहा है। वह आस्तिक है। भगवान पर उसकी बहुत आस्था है। जब उसका बुरा वक्त चलता है, तब तो उनकी शरण में ज़रूर जाता है। क्या संयोग है इस बार अभी तक मैं उनके दरबार में नहीं जा सका हूँ! विजय ने अपने-आप से कहा।

इधर काफी दिनों से वैष्णो देवी मां, बजरंग बली और साईं बाबा के दरबार में उसने मत्था नहीं टेका है। कुछ दिन पहले उसने साईं बाबा के मंदिर शिरडी जाने का प्रोग्राम बनाया भी था, लेकिन व्यस्तता की वजह से नहीं जा सका था। अगले रविवार, यानी मंत्री जी के आने के पहले उसने एक बार शिरडी जाने का मन बनाया। साईं बाबा की महिमा अपरंपार है। सुनते हैं कि वहाँ जो कोई भी गया है, उसे कुछ न कुछ मनचाहा ज़रूर मिल जाता है। बाबा के दरबार से कोई भी निराश होकर नहीं लौटता है। वे लोग बड़़े भाग्यशाली होते हैं, जिन्हें साईं बाबा अपने दरबार में बुलाते हैं। पहले केवल शिरडी में उनका एक मंदिर था और अब दुनिया के कोने-कोने में उनका मंदिर है। उनके भक्तों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है।

बाबा के दरबार में जाने पर मन में ऐसी श्रद्धा जगती है कि आदमी अपने-आपको हमेशा बाबा के चरणों में न्योछावर करने के लिए तैयार हो जाता है। मेरे एक दोस्त ने बताया था कि कोई एक राजा था, जो व्यस्तता की वजह से शिरडी जाकर भी उनके मंदिर नहीं जा सका था। संध्या समय मंदिर में भजन-कीर्तन शुरू हुआ, तो आप ही आप वह वहाँ पहुँच गया। उसे मन ही मन अहसास हुआ कि बाबा स्वयं उसे मंदिर जाने के लिए कह रहे हों! वहाँ बाबा की मूर्ति को देखते ही वह भाव-विभोर हो गया। हाथ में करताल लेकर वह औरों के साथ भजन गाने लगा।

बाबा के भक्त मानते हैं कि दैवीय शक्ति से युक्त हो कर साईं धरती पर अवतरित हुए थे। उनमें कोई भगवान विष्णु, तो कोई शिव या बजरंग बल पैगम्बर मोहम्मद साहब का रूप देखता है। इसलिए साई बाबा सभी धर्मों और सम्प्रदायों के आराध्य हैं। उनकी महिमा ऐसी है कि कुछ लोगों को आज भी उनके अपने आसपास मौजूद होने का आभास होता है। साई बाबा देवता हैं। पहली बार मैंने उनके बारे में अपने दोस्त से सुना था- वह हर बृहस्पतिवार को लोधी रोड स्थित बाबा के मंदिर में जाता था। वह कहता था कि कलियुग में लोगों के कल्याण का एकमात्र सहारा साई बाबा हैं। उसी ने बताया कि बाबा का नाम ‘र्साईं’ महालाशापति ने दिया था। कहानी है कि बाबा काफी दिनों बाद शिरडी किसी की बारात में आए थे। महालाशापति ने बाबा को पहचान लिया। उन्हें देखते ही वे साष्टांग दंडवत हो गए और उन्हें संबोधित करते हुए कहा - आओ साईं आओ। उसी समय से सभी लोग बाबा को साईं बाबा कहकर पुकारने लगे!

पहली बार बाबा 18-19 वर्ष की अवस्था में उस स्थान पर आए थे। वे एक नीम के पेड़़ के नीचे रहा करते थे। दूर-दूर से लोग उन्हें देखने आया करते थे। कहते हैं कि बाबा के चेहरे पर गजब का तेज था, जिससे खिंचे हुए लोग उनका दर्शन पाने के लिए चले आते थे। उनको देखते ही लोगों के दिलो-दिमाग पर छाया अंधेरा तुरंत दूर हो जाता था। उनके दर्शन से लोग अभिभूत हो जाते थे। जो लोग अपनी परेशानियों से दुखी रहते, बाबा का केवल दर्शन करने भर से उनकी परेशानियाँ छू-मंतर हो जाती थीं। कई लोग उनकी परीक्षा लेने की मंशा से उनके पास जाते, लेकिन वहाँ पहुँचते ही वह भाव मन से हट जाता! उल्टे मन में श्रद्धा के भाव पैदा हो जाते। अटूट श्रद्धा के भाव।

क्या है बाबा की कृपा? इसका बखान या वर्णन नहीं किया जा सकता है। जो कोई भी उनके दरबार में गया है, यही बोलता है। आप कहीं भी रहें, उनकी उपस्थिति की आत्म अनुभूति कर सकते हैं। ऐसी अनुभूति, जिसके बाद आदमी के अंदर की सारी अपेक्षाएँ, इच्छाएँ खत्म हो जाती हैं, लोग खुद को साईंबाबा के हवाले कर देते हैं।
यह सब सोचते-सोचते विजय ने शिरडी जाना तय कर लिया। हम केवल दो-तीन दिन में वहाँ से लौटकर आ सकते हैं। इसलिए हमें अब देर नहीं करनी चाहिए। उनके पास जाना बहुत ज़रूरी है। मुझे अपनी डोर उनके हाथों में सौंप देना है। अब हमें कुछ अच्छा काम करना है। क्यों न इसकी शुरुआत साईं बाबा के दर्शन से किया जाए। ओम साईं राम।

मैं अभी वीणा से बात करता हूँ। शायद वह घर से रविवार को लौट रही है। क्यों न उसी दिन शाम को या अगले दिन की टिकट ले लूं।

उसने तुरंत वीणा को फोन मिलाया और पूछा - "वीणा तुम कैसी हो? तुम्हारे यहाँ का क्या हालचाल है? सब कुछ ठीक है न!"

वीणा ने जवाब दिया, "हाँ सब ठीक है। क्या कोई खास बात है? इतनी देर रात फोन कर रहे हो। तुम तो अक्सर शाम में फोन किया करते थे।"

"नहीं, नहीं कोई बात नहीं है। सब ठीक है। यह पूछना था कि क्या हमलोग रविवार की शाम में शिरडी के लिए निकल सकते हैं या दूसरे दिन का टिकट बुक करा लें? हमें साईं बाबा का दर्शन करना है।"

वीणा ने रविवार का ही टिकट लेने को कहा।

विजय ने तुरंत नेट पर शिरडी के लिए दो टिकट बुक कर लिया।


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