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ISSN 2292-9754

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07.17.2014


30.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

अरुण ने अब तक जीवन में कई थपेड़े खाए थे। संस्था के चेयरमैन और सांसद के बीच हुई लेन देन की बातों से लेकर अपना एन जी ओ स्थापित करने तक उसने कई उतार-चढ़ाव देखे थे। उसने कई एनजीओ बदले। पहले एनजीओ में क्षुब्ध होकर एक महीने तक काम पर जाना छोड़ दिया था। लेन देन की बात ने उसे झकझोर दिया था। लोगों के उत्थान के लिए पैसा लेने वाले खुद के उत्थान में लगा रहे थे। यह बात उसके दिल को छू गई थी।

सबसे पहले तो इसे उजागर करने के लिए वह अपने दोस्त वरुण पत्रकार के पास गया था। किस प्रकार दोनों के घालमेल से एनजीओ का धंधा चल रहा है उसे विस्तार से बताया। वरुण ने भी रुचि लेकर उसकी बातों को सुना था। उसने भी अभी अभी पत्रकारिता में अपना कदम रखा था, लिहाजा उसे भी स्टोरी चाहिए थी। उसने अरुण को धन्यवाद दिया। अगले दिन वरुण ने एक अच्छी स्टोरी बनाई। उसने अपनी स्टोरी अपने बॉस को दिखाई। बॉस ने कहा अच्छी स्टोरी है। अभी इसे रिलीज नहीं करना है। हम इसे बाद में इस्तेमाल करेंगे। एक सप्ताह तक वरुण इंतजार करता रहा लेकिन स्टोरी नहीं छपी।

अरुण बार बार उससे पूछ रहा था। इसी वजह से वह भी अपनी रिपोर्ट को लेकर परेशान था। एक दिन उसने अपने बॅास से पूछ लिया कि क्या हुआ उस रिपोर्ट का। बॉस ने झिड़कते हुए कहा-क्या बहुत बड़ा रिपोर्टर बने हो? ...जितना कहा जाये उतना काम करो, वरना बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। वरुण को यह सुनकर बुरा लगा और उसने यह बात अपने दोस्त अरुण को बताई। वह भी मन मसोसकर रह गया। आपस में वे दोनों बातें करने लगे। क्या किया जाए दुनिया ही ऐसी है। सभी लोग अपना भला करने में लगे हुए हैं। वरुण ने अरुण को सुझाव दिया।

"देखो आदर्शवादी बातों को छोड़ो और जाकर अपना काम फिर से शुरू करो। अपना समय व्यर्थ में मत गंवाओ। ऊपर के लोग आपस में मिले रहते हैं। हम अगर उनके खिलाफ कुछ करेंगे तो हमें ही नुकसान होगा। क्या कभी बड़े लोगों का नुकसान हुआ है? बड़े-बड़े काम को अंजाम देकर भी वे लोग बेदाग निकल जाते हैं।" वरुण ने अपनी बात कही।

हाँ में हाँ, अरुण ने भी मिलाया। लेकिन उसका मन मान नहीं रहा था। ठीक है, हम अभी काम सीखते हैं और फिर बाद में जब इस काबिल हो जाएँगे तो अपना काम खुद ब खुद शुरू करेंगे। इन लोगों के साथ काम कर हम अपनी आत्मा को नहीं कुचलने देंगे। उन दोनों ने आपस में सहमति बनाई।

अरुण आखिर 15 दिनों के बाद ऑफिस पहुँचा तो वहाँ का माहौल बदला हुआ था। बॉस ने अरुण को धमकी भी दी। प्रेस का चस्का लग गया है, कहीं लेने के देने न पड़ जायें। उसे रेजिगनेशन लेटर लिखने के लिए कहा गया।

अब बात अरुण को समझ में आई, तो उसने तुरंत अपना रेजिगनेशन लिख कर दे दिया। आगे कई महीनों तक वह जॉब्स तलाश करता रहा फिर भी नहीं मिला। वह रोज घर से सुबह निकलता, बस पर धक्के खाता, ऑफिस में जाकर सी वी देता और शाम को निराश हो वापस चला आता। पाँच महीने तक यह सिलसिला जारी रहा। अंत में, विजय की दोस्ती काम आई। उसकी सिफारिश से ही उसे एक एनजीओ में जॉब मिल गया। वह मन लगाकर काम करने लगा। लेकिन आदर्शवादी बनने की बजाय इस बार यथार्थवादी बन कर अपना काम शुरू किया।

वह कुछ ही दिनों में सबका प्यारा बन गया। वह पुराने ऑफिस के अनुभव का भरपूर इस्तेमाल कर रहा था। उसके दोस्त जो वहाँ बने थे उनसे इसका गुर सीखा और आगे बढ़ता गया। किताबों में फंड रेजिंग के विभिन्न तरीके लिखे थे, वे कारगर नहीं थे। उसने 15 प्रतिशत कमीशन देने की बात अनुभव के थपेड़ों से सीखा था। किताब के 100 फार्मूले की बजाय यह ज्ञान अधिक कारगर साबित हो रहा था।

एक साल के दौरान उसने कई कंपनियों के बड़े-बड़े लोगों से संपर्क बना लिए थे। साथ ही उसने वे तरीके जो अक्सर समाज सेवी संस्थाएँ अपने उत्थान के लिए अपनाती थीं उसका भी उसे ज्ञान हो चुका था। उसने यह निर्णय लिया कि उसे अब खुद का एनजीओ स्थापित करना है। इन सभी में विजय का योगदान बहुत था। बगैर विजय के वह इन कामों को इतनी सरलता से पूरा नहीं कर सकता था। लिहाजा आज जब विजय परेशानी में है तो उसकी पूरी मदद करनी चाहिए, इसलिए वह देश के विकास की अवधारणाओं को कैसे तैयार किया जाए, इस पर विशेष सोच विचार कर रहा है ताकि रविवार को वह उसके घर जाए तो सबकुछ बता सके। उसे परेशानी से बाहर निकाला जा सके।


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